संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 अप्रैल : बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के बाद भी बड़े-बड़े लोग पूरे बचे हुए...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 अप्रैल : बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के बाद भी बड़े-बड़े लोग पूरे बचे हुए...
Date : 28-Apr-2019

छत्तीसगढ़ में पन्द्रह बरस की भाजपा सरकार के जाने, और कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार के आने के साथ ही कई विभागों के ऐसे मामलों की जांच शुरू हुई है जिस पर जांच की मांग कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए भी की थी। कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में भी इन विभागों में बहुत बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, और ऐसे में यह जायज और जरूरी ही था कि सत्ता में आने पर कांग्रेस अपनी मांग और अपने वायदे के मुताबिक इन विभागों की जांच करवाए। पहली नजर में कांग्रेस ने जिन विभागों के जिन मामलों की जांच शुरू करवाई है, जुर्म दर्ज करवाया है, और विशेष जांच दल बनाए हैं, उन सबमें भ्रष्टाचार दिखता है। पिछली सरकार के रहते हुए भी कुछ चर्चित विभागों में बड़े संगठित और योजनाबद्ध भ्रष्टाचार की बात इतनी जानकारियों के साथ सामने आती थीं कि लोगों को उन पर भरोसा था। और कांग्रेस की चुनावी जीत में थोड़ा बहुत योगदान इस जनधारणा का भी था कि रमन सरकार भ्रष्ट है।

अब जब राजधानी के सबसे बड़े सरकारी सुपरस्पेशलिटी डीकेएस हॉस्पिटल के कायाकल्प में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च में बड़ी गड़बड़ी सामने आ रही है तो इस अस्पताल के इंचार्ज बनाए गए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता शक के घेरे में हैं। वे अब तक पुलिस पूछताछ से बचकर चल रहे हैं, और हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत पा चुके हैं, लेकिन पूछताछ महज वक्ती बात है जो कि आज नहीं तो कल हो ही जाएगी। अब इस जुड़े हुए कुछ बुनियाद सवाल उठते हैं जिन पर सरकार को डॉ. पुनीत गुप्ता से परे भी जवाब लेना होगा। सरकारी कामकाज में मंत्रियों का जिम्मा एक सीमा तक होता है, और उसके बाद विभागीय अफसर जिम्मेदार होते हैं। डीकेएस अस्पताल को जिस मनमाने तरीके से नया किया गया, क्या उसके लिए डॉ. पुनीत गुप्ता को सरकार में बैठे आला अफसरों ने अधिकार दिए थे? यह रियायत दी थी कि वे नियमों की अनदेखी करके भी बिना किसी प्रक्रिया के इस अस्पताल को अपनी मर्जी से ढाल सकते हैं? और जब इस अस्पताल को लेकर पहले भी लगातार स्वास्थ्य-सामाजिक कार्यकर्ता सरकार के पास भ्रष्टाचार की शिकायतें लेकर जाते रहते थे, तब उस समय के बड़े अफसरों ने क्या किया? क्या शिकायतों की अनदेखी करना अपनी जिम्मेदारी की अनदेखी करना नहीं था? सरकार अगर डीकेएस अस्पताल के भ्रष्टाचार के गुनहगार तय करना चाहती है, तो स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार बड़े अफसरों की जिम्मेदारी तय किए बिना यह करना जायज नहीं होगा।

ठीक ऐसा ही हाल आबकारी विभाग का है जहां पर एक मंझले दर्जे के संविदा अधिकारी पर छापेमारी हो रही है कि उसने हजारों करोड़ का नाजायज फायदा कुछ चुनिंदा लोगों को पहुंचाया और सरकार को चूना लगाया। परले दर्जे के भ्रष्ट अफसर होने की साख वाले इस आदमी को रिटायर होने के बाद सरकार में बैठे किन लोगों ने नौ-नौ बार संविदा नियुक्ति दी इसकी भी जांच होनी चाहिए, और जिस तरह से इस एक संविदा-अफसर ने सरकार की एक सबसे बड़ी कमाई वाले विभाग को हांका है, वह न तो तत्कालीन आबकारी मंत्री की मर्जी के बिना हो सकता था, और न ही यह भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री की जानकारी के बिना हो रहा था। आबकारी विभाग, और शराब कारोबार के लिए बनाए गए निगम संगठित भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा नमूना बन गए थे, और आज उस बड़े ढांचे में बीच के एक पुर्जे को घेरकर अगर यह माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार की सजा दी जाएगी, तो यह एक खुशफहमी से अधिक कुछ नहीं।

तीसरा चर्चित मामला नागरिक आपूर्ति निगम का है जिसमें फिर एक बहुत बड़ा संगठित भ्रष्टाचार चल रहा था, उस पर पिछली सरकार के चलते ही छापा पड़ा, दस्तावेज जब्त हुए, वैध-अवैध टेलीफोन टैपिंग हुई, गिरफ्तारियां हुईं, करोड़ों की नगदी जब्त हुई, और कांग्रेस पार्टी तबसे लेकर अब तक रमन सिंह के अफसरों और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार की तोहमत लगाते आई है। लेकिन आज इस मामले की जांच उतने ही नए शक से घिर गई है जितने शक से पिछले सरकार के वक्त इसी भ्रष्टाचार की जांच शक से घिरी हुई थी। अब तक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से लेकर मीडिया तक में आए बयानों को देखा जाए, तो यह बात लगती है कि कुछ चुनिंदा लोग घिर रहे हैं, और कुछ चुनिंदा लोग घेरे से बाहर निकल रहे हैं। जिस आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने नान का मामला पकड़ा था, उसके तत्कालीन मुखिया और राज्य के सबसे विवादास्पद आईपीएस अफसर मुकेश गुप्ता ने नई सरकार की जांच को अदालत में कड़ी चुनौती दी है, और अदालत ने सरकार पर कई किस्म की बंदिशें भी लगाई हैं। 

इन तीन मामलों को देखें तो यह बात लगती है कि इन तीनों के गुनहगार ठहराए जा रहे लोगों के ऊपर के अफसरों और मंत्रियों की जिम्मेदारी पर अब तक कोई चर्चा नहीं हो रही है। बड़े जुर्म और बड़े भ्रष्टाचार पर इंसाफ के लिए सरकार का मौजूदा रूख नाकाफी है, और इस सरकार को पिछली सरकार के और बड़े लोगों तक पहुंचना होगा, वरना जिम्मेदारी नीचे के स्तर तक ही आकर रूक जाएगी। इन तीनों भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी विभागीय सचिवों, विभागीय मंत्रियों, और मुख्यमंत्री तक पहुंचे बिना नहीं रूख सकती। ये तीनों भ्रष्टाचार इन तीनों स्तर के लोगों की जानकारी, सहमति, और भागीदारी के बिना हुए नहीं दिखते हैं, और इसलिए सरकार को जांच का दायरा बढ़ाना चाहिए। कानून में साजिश में भागीदार लोगों के लिए 120-बी जैसी धारा रखी गई है, और बहुत जाहिर तौर पर यह दिख रहा है कि यह जिन लोगों पर लागू होनी चाहिए, वे सारे बड़े लोग अब तक बचे हुए हैं। इस देश में बोफोर्स के चौथाई सदी बाद भी यह तोप महज चुनावी मुद्दा बनी रही, और उसका कोई भ्रष्टाचार किसी सजा तक नहीं पहुंच सका। इस दौरान कई गैर कांगे्रस सरकारें भी केंद्र पर काबिज रहीं, लेकिन बात बनी नहीं। छत्तीसगढ़ में भी ये चर्चित भ्रष्टाचार महज खबर बनकर न रह जाएं, या महज कुछ छोटे लोगों को सजा दिलाकर दब न जाएं।
-सुनील कुमार

Related Post

Comments