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दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 अप्रैल : खराब लोग खारिज किए जाएं, और बेहतर लोग बढ़ावा पाएं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 अप्रैल : खराब लोग खारिज किए जाएं, और बेहतर लोग बढ़ावा पाएं
Date : 29-Apr-2019

देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी ने अभी एक वीडियो-बयान में मुंबई के एक कांग्रेस उम्मीदवार, मिलिंद देवड़ा का समर्थन किया। उन्हें आमतौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करीबी माना जाता है, लेकिन हो सकता है कि मिलिंद में उन्हें अधिक संभावनाएं दिखी हों, और यह एक चतुर कारोबारी का दोनों नावों पर पांव रखने का एक तरीका भी हो। भारतीय राजनीतिक-कारोबार के इतिहास में यह बड़ी अच्छी तरह दर्ज है कि इन दोनों के पिता के बीच बड़ा घरोबा रहा है। धीरू भाई अंबानी को देश में कांग्रेस सरकार की नीतियों को ढालकर सबसे अधिक फायदा पाने का श्रेय जाता है, और मुरली देवड़ा को मुंबई में कांगे्रस का सबसे बड़ा चंदा-इंतजामअली माना जाता था। इसलिए दूसरी पीढ़ी के बीच भी अगर ऐसा ही रिश्ता बना रहता है तो वह बड़ा स्वाभाविक कारोबारी गठबंधन ही रहेगा। लेकिन ऐसे गठबंधन और सत्ता-कारोबार के लेन-देन पर लिखने को नया कुछ नहीं है, आज यहां लिखने का मकसद एक दूसरी घटना से पैदा हुआ। पंजाब में बसे हुए एक रिटायर्ड डिप्लोमेट के सी सिंह ने ट्विटर पर कांगे्रस उम्मीदवार मनीष तिवारी के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है कि वे इस चुनाव में किसी पार्टी का समर्थन नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे सबसे अच्छे नेताओं का समर्थन कर रहे हैं। क्योंकि देश की संसद को उनकी जरूरत है, फिर चाहे वे किसी भी पार्टी के हों। सोशल मीडिया पर कुछ और लोग भी हैं जो देश भर के कुछ चुनिंदा लोगों को वोट देने की अपील कर रहे हैं, और ऐसे उम्मीदवार अलग-अलग पार्टियों के हैं, या निर्दलीय भी हैं।

हिंदुस्तान में कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जिसे डाले गए वोटों में से औसतन तीस-चालीस फीसदी से अधिक मिलें। ऐसे में यह जाहिर रहता है कि संसद में बहुत सी पार्टियों के लोग जाएंगे ही। ऐसा लोकतंत्र के अपने भले के लिए है क्योंकि एक दानवाकार संसदीय बाहुबल पाए हुए राजीव गांधी की सरकार के बूटतले शाहबानो का कुचलना देश के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है, और वैसा ही दानवाकार बाहुबल पाए हुए नरेन्द्र मोदी सरकार की नोटबंदी भी लोगों ने देखी है जो कि देश के लोगों पर केंद्र सरकार का सबसे बड़ा सर्जिकल स्ट्राइक रहा है। ऐसे में कुछ लोग तो ऐसे जरूर हो सकते हैं जिनकी प्रतिबद्धता किसी पार्टी के लिए है, और ऐसे धार्मिक लोगों को नास्तिक बनाने की किसी को सोचना नहीं चाहिए। लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि हर चुनाव में कभी पार्टी देखकर, कभी उम्मीदवार देखकर, और कभी देश-प्रदेश के मुद्दे देखकर वोट डालते हैं। दरअसल यही तबका देश की या प्रदेश की सरकार तय करने वाला रहता है क्योंकि दोनों ओर के प्रतिबद्ध वोट तो तकरीबन पार्टियों के साथ बने रहते हैं। खुले दिमाग वाला, बिना पूर्वाग्रह वाला, बिना पार्टी-प्रतिबद्धता वाला यह तबका बिना झिझक या आत्मग्लानि के हर बार अपना उम्मीदवार तय करता है। इसलिए इस तबके की अगर बात करें तो वह दिल-दिमाग से आजाद है, और वह हर बार नए-नए उम्मीदवार को या नई-नई पार्टी को वोट दे सकता है।

एक वक्त था जब लोग अटल बिहारी वाजपेयी को जनसंघ या भाजपा से बेहतर मानते थे और कहते थे कि वे एक खराब पार्टी में एक अच्छे  इंसान हैं। इसीलिए आधी-चौथाई सदी तक अटलजी जनसंघ और भाजपा के पोस्टर-बॉय बने रहे, और उनकी रौशनी दिए से अधिक रही, और उनकी खुशबू कमल से अधिक। बहुत से लोग जो आमतौर पर जनसंघ-भाजपा को वोट नहीं देते, वे भी अटलजी को वोट दे देते थे। अब ऐसे में एक रास्ता यह दिखाई पड़ता है कि सबसे अच्छे उम्मीदवार को वोट देकर संसद को अच्छे लोगों से भरा जाए, फिर वे चाहे किसी भी पार्टी के हों। दूसरी तरफ पार्टी और विचारधारा के प्रति निष्ठा रखने वाले लोगों को यह बात कभी नहीं सुहा सकती और वे पार्टी के निशान पर ही वोट देंगे, भले उन्हें इस बात का पूरा एहसास हो कि उनका वोट भी जमानत बचाने में मददगार नहीं होगा।

आज के माहौल में बहुत से लोग कन्हैया कुमार को वोट देने की बात लिख रहे हैं फिर चाहे वे कम्युनिस्ट उम्मीदवार हों। भोपाल में दिग्विजय सिंह ने बयान दिया है कि वे अपने प्रचार के लिए कन्हैया कुमार को बुलाएंगे, जबकि यह बात अच्छी तरह दर्ज है कि बेगूसराय में कन्हैया के खिलाफ कांगे्रस-राजद गठबंधन का उम्मीदवार है, और पूरे बंगाल में कांगे्रस वाममोर्चे के खिलाफ लड़ ही रही है, पूरे केरल में भी यही नजारा है। लेकिन भोपाल को जिस तरह राष्ट्रवाद के नाम पर एक घोर साम्प्रदायिकता का मोर्चा बना दिया गया है, उसे देखते हुए यह बात पूरी तरह अटपटी नहीं लगती कि कन्हैया कुमार एक व्यापक सैद्धांतिक हित को देखते हुए साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ दिग्विजय सिंह का प्रचार करने भोपाल आएं। इससे यह बात भी लगती है कि देश में जगह-जगह अलग-अलग पार्टियों के बेहतर इंसानों को छांटकर उनका समर्थन करने की ऐसी असंगठित या संगठित कोशिश हो सकती है जो कहीं दिल्ली में स्कूलों को आसमान तक पहुंचाने वाली एक महिला को संसद तक पहुंचाए, या कहीं किसी और काबिल विशेषज्ञ को जीतने में मदद करे। जो प्रतिबद्ध हैं वे बने रहें, लेकिन जो किसी सोच के साथ सात फेरे न ले चुके हैं, वे लोग ऐसी कोशिश कर सकते हैं कि खराब लोग खारिज किए जाएं, और बेहतर लोग बढ़ावा पाएं।
-सुनील कुमार

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