विशेष रिपोर्ट

मनरेगा-डीएमएफ मजूरी बरसों से न मिली, साल भर से काम नहीं, रूक रही हैं शादियां

Posted Date : 30-Apr-2019



1 मई मजदूर दिवस 

चंद्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 30 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
कोरिया जिले के दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की लंबित मजदूरी नहीं मिल रही है। कई मजदूरों के खाते होल्ड पर हंै, जिसके कारण उनकी बेटियों की शादी नहीं हो पा रही है। डीएमएफ और मनरेगा के तहत हुए कार्यों का भुगतान एक साल से लंबित है। कई मनरेगा मजदूरों को साल भर से  काम  नहीं मिला है।

मजदूरों के खाते पर होल्ड के संबंध में लीड बैक मैनेजर श्री नायक कहते हंै कि केवायसी नहीं होने के कारण खाते पर आटोमैटिक होल्ड लग चुका है, ऐसे में खाता धारक को स्वयं बैंक जाना होगा, तभी होल्ड हटेगा, कुछ लोगों का होल्ड हटा है।  वहीं मर्सरा में मजदूरी के संबंध में सप्लायर संदीप जायसवाल का कहना है कि मर्सरा का काम डीएमएफ मद से करवाया जा रहा है। उक्त कार्य के भुगतान का बिल बीते एक साल से  लंबित है। यह सही है कि ग्रामीणों की मजदूरी मनरेगा  भुगतान नहीं होने के कारण फंसी हुई है। 

इस संबंध में  छग प्रदेश आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री डॉ विनय शंकर सिंह का कहना है कि गांव गांव में होल्ड खातों को लेकर जन जागरण चलाया जाएगा। पूर्व सरकार की कार्यप्रणाली में कई खामियां थी अब मजदूरों के हितों का ध्यान रखते हुए उनकी समस्याओं के निदान की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। वहीं भाजपा के जिला महामंत्री देवेन्द्र तिवारी का कहना है कि मनरेगा का भुगतान काफी दिनों से लंबित है, इसके लिए प्रशासनिक प्रयास के साथ कांग्रेस की सरकार को भी मामले में संजीदगी दिखाने की जरूरत है। इस दिशा में वे भी सार्थक पहल करेंगे।

जानकारी के अनुसार कोरिया जिले में मजदूरों के खाते  होल्ड पर हंै, उन्हें बैंक  जाना होगा ये कोई उन्हें बताने वाला नहीं है।  मनरेगा की मजदूरी सालों से लटकी है, डीएमएफ के तहत कराए गए कार्यो की मजदूरी भी एक साल से अटकी हुई है। डीएमएफ और मनरेगा के तहत कराए कार्यो में  कुछ ठेकेदारों का सामग्री भुगतान तो कर दिया गया है, परन्तु मनरेगा का भुगतान नहीं हो पा रहा है।

इधर, ग्राम पंचायतों में रोजगार सहायकों के आगे प्रशासन बेबस है। ग्राम नेरूआ के कई मजदूरों को काम इसलिए नहीं मिला क्योकि उन्होंने रोजगार सहायक से काम करने की डिमांड की। अब अफसरों से इसकी कई शिकायत के बाद भी रोजगार सहायक को  हटाया नहीं गया है। यही हाल ग्राम कोरमो, बडगांवखुर्द, बरौता, सहित ज्यादातर भरतपुर तहसील के कई ग्राम पंचायत ऐसे है जहां मजदूरों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। चूंकि रोजगार सहायक ही मनरेगा में मजदूरों के काम की डिमांड भेजते है, ऐसे में हर ग्राम पंचातय में उनके चहेतों मजदूरों को  डिमांड भेजकर उन्हें ही काम पर रखते हैं।

बेटियों की शादियां रुकीं
इन दिनों विवाह  का सीजन है।  जिले के भरतपुर तहसील के दर्जनों ग्राम पंचायत के मजदूरों के खाते  बीते एक साल से होल्ड पर हैं जिसके कारण वे  आर्थिक तंगी से गुजर रहे हंै।  बेटियों की शादी रुक गई है। ग्राम पंचायत खमरौद निवासी रामकली अपनी बेटी प्रेमवती का विवाह नहीं कर पा रही है, बीते 2 वर्ष से उसका खाता  होल्ड पर है।   खाते में पैसा होते हुए भी  वह मजबूर है। ग्राम गिधेर के परशुराम मोहरनिया की बेटी का विवाह भी इसी कारण से रूका हुआ है। ग्राम नेरूआ के दया सिंह नाहर और ग्राम बरौता की गीता पति भनि की बेटी का विवाह भी इसी कारण रूका हुआ है। इसके अलावा, उदयभान, सुरजपाल सिंह, धरमू, श्यामवती, इतवरिया, लक्ष्मनिया, माहबली सहित भरतपुर तहसील के लगभग हर ग्राम पंचायत की यही कहानी है। 

अब मजदूरी के लिए परेशान
विकासखंड भरतपुर के ग्राम पंचायत मर्सरा ग्रामीण आत्माराम, ठाकुर प्रसाद यादव, कैलाश, शंकर, छोटेलाल, राममन यादव, माया देवी, गोपीचंद्र, राकेश, भोली, सुनील, भारती, लगनधारी यादव, लक्ष्मीनारायण ने बताया कि उनकी मांग पर 40 लाख रू कच्ची डेम का साईड रिटर्निंगवाल, आरसीसी नाली, पाईप लाईन एवं वेस्ट वियर निर्माण का कार्य स्वीकृत किया गया था। इस कार्य के लिए ग्रामीण यांत्रिकी सेवा को निर्माण एजेंसी नियुक्त किया गया था। जिसके द्वारा फरवरी 2018 में कार्य प्रारंभ किया गया। जिसमें उक्त ग्रामीण मजदूरों ने कार्य किया इसके साथ ही ट्रैक्टर भी काम पर लगाये गये थे। ठेकेदार द्वारा 10-15 लाख रूपये का कार्य कराने के बाद डीएमएफ की राशि नहीं मिलने के कारण कार्य को बंद कर दिया। ऐसे में बीते 1 साल से ज्यादा समय से कार्य में लगे सभी मजदूरों को उनकी बकाया मजदूरी के साथ ट्रैक्टर का भाड़ा भी नहीं मिला है। 

जंगल गिट्टी पीओआर ग्रामीणों ने भरा 
ग्राम पंचायत मर्सरा में कच्ची डेम पर अधूरे निर्माण में जिस गिट्टी का उपयोग किया गया, गिट्टी तोडऩे  में लगी मजदूर गुलबसिया, बिग्गी बाई, श्यामवती बताती है उन्होंने गिट्टी तोडक़र 50 चट्टा निर्माण कार्य मेंं दिया, जबकि जंगल में गिट्टी तोड़वाने के लिए गांव के चंद्रा यादव, शंकर यादवा और जय प्रकाश के नाम पर वन विभाग ने पीओआर काटा और उन्होंने विभाग को 10 हजार रू दंड भी दिया, परन्तु उनकी मजदूरी अब तक नहीं मिली है।

बांद का काम रुका
वर्ष 1985 में मर्सरा गांव के रामदास और चतुरगुन यादव ने नाले के पानी को रोका और डीजल पंप के सहारे गेहूं की फसल उगाने लगे। वर्ष 1996 में ग्रामीण आगे आए और इस बांध को बड़ा रूप दिया, तब ग्रामीणों ने खुद से पहले 60 हजार और फिर 40 हजार चंदा कर बांध की मरम्मत की। वर्ष 2012-13 में तत्कालीन डीएफओ के मेचियो ने ग्रामीणों की हौसला अफजाई की और उन्हें नहर बनाने में सरकारी मदद की। उसके बाद आई बारिश में बांध फूट गया, तत्कालीन कलेक्टर ने बांध की मरम्मत के लिए 20 लाख रू दिए, और बांध की पिचिंग के लिए ढाई लाख रू भी मिले। आज भी  मजदूर रामदास और चतुरगुन कहतेे हैं  कि  हमारी मांग पर कलेक्टर ने 40 लाख रू दे दिए, परन्तु अब हम सब मजदूरी को लेकर परेशान है और काम भी बंद  है।

 

 




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