संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 अप्रैल : कांग्रेस के अपने सांसदों  का अधिक होना किस काम का होगा अगर...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 अप्रैल : कांग्रेस के अपने सांसदों का अधिक होना किस काम का होगा अगर...
Date : 30-Apr-2019

इन दिनों हिंदुस्तान में जारी आम चुनाव इस मायने में बहुत दिलचस्प हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गठबंधन की जीत, और उनके फिर प्रधानमंत्री बनने का दावा करने वाले राजनीतिक विश्लेषकों के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जिन राज्यों में भाजपा-एनडीए की सीटें कम होते दिख रही हैं, उनकी भरपाई कैसे और कहां से होगी। उनका विश्लेषण बड़ा सरल और सहज है-जीतेगा तो मोदी ही।

अब ऐसे सरल विश्लेषण की कोई काट मुमकिन नहीं होती है क्योंकि अंधविश्वास का भला क्या जवाब हो सकता है? लेकिन मोदी से परे अगर देखें तो कांग्रेस पार्टी की सत्ता में वापिसी की उम्मीद एक और बड़ा अंधविश्वास लगती है क्योंकि देश के अलग-अलग प्रदेशों में कांग्रेस ने जिस अंदाज में अकेले चलने का फैसला लिया है, वह एक ऐसे अतिआत्मविश्वास से भरा हुआ लगता है जो शायद पूरा न हो सके। चुनावी नतीजे कई बार तमाम भविष्यवाणियों को खारिज करके जनता के एक अनोखे विवेक का सुबूत पेश करते हैं, इसलिए हम अभी जीत-हार पर नहीं जा रहे, महज रूख और तौर-तरीकों की बात कर रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी के बारे में आज ही किसी ने ट्वीट किया है कि वह दिल्ली में आम आदमी पार्टी से लड़ रही है, केरल में वामपंथियों से लड़ रही है, यूपी में एसपी-बीएसपी से लड़ रही है, बंगाल में लेफ्ट-तृणमूल से लड़ रही है, इसके बाद क्या राहुल गांधी में बीजेपी से लडऩे की ताकत और उसका वक्त बाकी है? यह सवाल एक हिसाब से जायज है क्योंकि कांग्रेस का रूख राहुल गांधी में एक अभूतपूर्व अंधविश्वास का दिख रहा है कि बिना व्यापक गठबंधन के भी वह बहुत सी सीटें जीत सकती है, इतनी अधिक सीटें जीत सकती है कि एनडीए-मोदी सत्ता से बाहर रहें, और कांग्रेस बाकी पार्टियों के बीच सबसे बड़ी और पहली पसंद रहे। सपने देखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब सपनों को सही देखने का मौका पांच बरस में एक बार मिलता है, तो सपनों के लायक खाट-बिस्तर का इंतजाम करने से परहेज नहीं करना चाहिए। 

भाजपा और एनडीए की गलतियां गिनाने के मौके दिन में चार बार आते हैं। आज कांगे्रस को तौला जाए जिसने कि बिहार के बेगूसराय में सीपीआई के कन्हैया कुमार को मोदी-एनडीए के खिलाफ एक बड़ा प्रतीक बनाने का मौका खो दिया है, और बिहार के स्थानीय समीकरणों को देखते हुए लालू की पार्टी को भी ऐसा बेहतर लग रहा होगा, लेकिन यह देश में दूरदर्शिता, दरियादिली, और उदार नजरिए के खिलाफ रूख है, और इसके दाम एक सीट के दाम से खासे अधिक चुकाए जा रहे हैं। कन्हैया कुमार की यह एक जीत संसद के भीतर और बाहर भाजपा-एनडीए के खिलाफ एक बड़ी फतह होती, लेकिन वह मौका गंवा दिया गया है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ खींचतान, मोलभाव इतने लंबे चले कि कांग्रेस ने वहां भी अपनी संभावनाएं खो दी हैं। दरअसल कांग्रेस का रूख कुछ ऐसा दिख रहा है कि देश में मोदी के खिलाफ, और राहुल के पक्ष में एक बड़ी लहर चल रही है, और कांग्रेस को औरों से हाथ मिलाकर चलने, कदम मिलाकर, कंधे जोड़कर चलने की कोई खास जरूरत है नहीं।

यह तो चुनावी नतीजे बताएंगे कि कांग्रेस का आत्मविश्वास सही था या उसकी आत्ममुग्धता आत्मघाती थी, लेकिन इन नतीजों से परे एक बात जो आज से कही जा सकती है वह यह कि कांग्रेस हाशिए पर से निकलकर पेज के बीचों-बीच आकर खड़ी है, और उसे अनदेखा करना, कम आंकना अब मुमकिन नहीं है। यह एक अलग बात है कि गठबंधन के इस युग में बाहुबलियों को भी पूरे देश की चुनौतियों को एक साथ देखते हुए साथी बनाने पड़ते हैं, साथ रखने पड़ते हैं, और कांग्रेस के हिस्से चुनाव के बाद यह मलाल भी आ सकता है कि वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनने के बावजूद पर्याप्त बड़े गठबंधन की मुखिया नहीं बन पा रही है। आज बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि कांग्रेस ने जगह-जगह क्षेत्रीय गठबंधन की जरूरतों को अपने निजी फायदे के अंदाज से अनदेखा किया है कि उसे खुद अधिक से अधिक सीटें मिल जाएं। लेकिन अगर भाजपा-एनडीए विरोधी गठबंधन भाजपा-एनडीए से बड़ा नहीं बन पाया, तो कांग्रेस के निजी सांसद अधिक होना भी किस काम का रहेगा? हो सकता है कि भाजपा विरोधी पार्टियों से परे अकेले चलती हुई कांग्रेस कुल मिलाकर भाजपा का नफा ही कर जाए। खैर, कांग्रेस ने अपने भविष्य के बारे में बेहतर सोचा होगा यही माना जा सकता है, और नतीजों का इंतजार किया जा सकता है।
-सुनील कुमार

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