संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 2 मई : कड़वे प्रवचनों के खिलाफ,  कड़वी आलोचना पर जुर्माना!
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 2 मई : कड़वे प्रवचनों के खिलाफ, कड़वी आलोचना पर जुर्माना!
Date : 02-May-2019

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का एक ताजा फैसला कुछ हैरान करने वाला है, कुछ परेशान करने वाला है। कुछ बरस पहले हरियाणा की भाजपा सरकार ने विधानसभा में जैन मुनि तरूण सागर का प्रवचन करवाया था। इस प्रवचन को लेकर कुछ लोगों के मन में यह हैरानी भी हुई थी कि विधानसभा के सदन पर किसी एक धर्म के गुरू या मुनि का प्रवचन संसदीय परंपरा को कितना संपन्न करेगा, या आगे चलकर परेशानी खड़ी करेगा। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात और भी हुई थी कि आलोचना करने वाले लोगों ने तरूण सागर की कही हुई बातों को भी आपत्तिजनक माना था, और विधानसभा के भीतर ऐसी बातों को कहने के लिए आलोचना की थी। सार्वजनिक जीवन के दो चर्चित लोगों, मुम्बई के संगीतकार विशाल ददलानी, और कांग्रेस के एक मुखर प्रवक्ता तहसीन पूनावाला ने इस प्रवचन को लेकर ट्विटर पर बहुत सी आलोचनात्मक बातें लिखी थीं। बाद में तरूण सागर के कुछ अनुयायियों ने इसे लेकर हरियाणा पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि यह लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम था, और धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने का काम भी था। यह मामला अभी पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में सुलझा तो अदालत ने इन दोनों ही आरोपों से इन दोनों को बरी कर दिया, लेकिन फिर भी इनकी कही हुई बातों को लेकर इन पर दस-दस लाख रूपए का जुर्माना लगाया। अदालत का यह फैसला उन लोगों को बड़ा हैरान कर रहा है जो कानून की मामूली समझ रखते हैं, और जो यह नहीं समझ पा रहे हैं कि पुलिस रिपोर्ट और मुकदमे की धाराएं जब टिकी ही नहीं, जब दोनों बरी हो गए, तो उनकी कही बातों पर जुर्माना लगाना कितना सही है?
 
हाईकोर्ट ने इस मामले में अदालत को जैन मुनि तरूण सागर के अनुयायियों की भावनाओं को बेहतर तरीके से समझाने के लिए ऐसे ही एक जैन अनुयायी-वकील को इस मामले में न्यायमित्र नियुक्त किया था। और इस वकील संदीप जैन के सुझाव को अदालत ने माना कि इनके खिलाफ कुछ ऐसा प्रतीकात्मक किया जाना चाहिए ताकि वे बाद में किसी दूसरे जैन मुनि को आहत न करें। इस बात को मानते हुए अदालत ने दस-दस लाख का जुर्माना लगाया है जिसे कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चोट मान रहे हैं। यहां यह याद रखना जरूरी है कि विशाल ददलानी ने बाद में जैन मुनि तरूण सागर से मिलकर माफी मांग ली थी, और उन्होंने माफ कर भी दिया था। 

अब एक बुनियादी बात पर चर्चा जरूरी है। जो लोग जैन समाज के एक सबसे मुखर वक्ता तरूण सागर को जानते हैं, वे उनको इसीलिए मानते हैं कि वे बहुत खरा-खरा बोलते हैं, और खुद अपने प्रवचनों को कड़वे प्रवचन कहते हैं। उनके प्रवचनों की जो किताबें छपती हैं उनमें भी उनकी बातों को कटु प्रवचन या कड़वे प्रवचन कहा जाता है। वे कहते तो अपनी सोच के मुताबिक हैं, लेकिन खासी कड़वी जुबान में कहते हैं, और लोग उन्हें इसी बात के लिए तारीफ का हकदार भी मानते हैं। अब अगर उन्होंने हरियाणा विधानसभा के भीतर सदन में यह कहा कि धर्म और राजनीति का संबंध पति और पत्नी जैसा रहता है जिसमें बाद वाले को पहले वाले के नीचे ही काम करना चाहिए। उनकी इस बात को महिलाविरोधी मिसाल मानते हुए बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया पर यह लिखा था कि यह महिला को पुरूष के मातहत बताने की बात है, और विधानसभा के भीतर ऐसी बात ठीक नहीं है, विधानसभा के बाहर भी नहीं है। विधानसभा के भीतर के इस आयोजन की इस बात को लेकर भी आलोचना हुई थी कि एक दिगंबर जैन मुनि बिना कपड़ों के रहते हैं, और विधानसभा के भीतर उनका कार्यक्रम ठीक नहीं है। 

यह समझने की जरूरत है कि जैन मुनि तरूण सागर, जिनकी सारी की सारी पहचान ही खरी-खरी बातों को कड़वे अंदाज में बोलने की है, उनकी बातों की आलोचना पर पुलिस मुकदमा और अदालती जुर्माना क्या जायज है? सवाल यह उठता है कि जो व्यक्तित्व केवल कड़वी बातों की वजह से चर्चित है, क्या उसे और उसके अनुयायियों को अपने बारे में कुछ मामूली कड़वी बातें सुनने का बर्दाश्त नहीं रखना चाहिए? क्या यह बात कुछ उसी किस्म की नहीं हो गई कि एक व्यंग्यकार या एक व्यंग्य चित्रकार खुद तो दिन भर दूसरों पर तंज कसे, लेकिन उसके बारे में कोई तंज कस दे, तो वह अदालत चला जाए, या उसके पाठक अदालत चले जाएं? लोकतंत्र में लोगों को विचारों की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने का जितना हक है, उतना ही दूसरों को बर्दाश्त करने की उनकी जिम्मेदारी भी होती है। कहने के लिए तरूण सागर यह कह सकते हैं कि उन्होंने तो विशाल ददलानी को माफ कर दिया था, लेकिन हकीकत यह है कि उन्हें यह बात पुलिस और अदालत के लिए सार्वजनिक रूप से कहनी थी ताकि अदालत का रूख उनकी बात के हिसाब से बन सके। यह बात ठीक नहीं है कि कड़वे वचनों के लिए विख्यात व्यक्ति या उनके अनुयायी इतना कम बर्दाश्त रखें कि उन बातों पर भी अदालती जुर्माना हो जाए जिन्हें न तो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली माना गया, और न ही दो समुदायों के बीच शत्रुता खड़ी करने वाली। हाईकोर्ट ने किसी बहुत ही तकनीकी नजरिए से यह जुर्माना सुनाया है जो कि सुप्रीम कोर्ट में किसी किनारे टिक नहीं पाएगा। लेकिन यह सिलसिला ही गलत हुआ। पहली बात तो यह कि संसद या विधानसभा को धर्म से परे रखना चाहिए था। दूसरी बात यह कि जैन मुनि को खुद ही यह सोच लेना चाहिए था कि इससे कैसी संसदीय परंपरा बनेगी। तीसरी बात यह कि जैन मुनि की कही बातें महिला को दूसरे दर्जे का इंसान बताती ही हैं। और चौथी बात यह कि अनुयायियों ने जब मामला-मुकदमा शुरू किया, पुलिस रिपोर्ट शुरू की, तो कड़वे वचन कहने वाले तरूण सागर ने उसका विरोध नहीं किया। विरोध न करना उनका बुनियादी हक था, है, और रहेगा। लेकिन जो व्यक्ति बाकी तमाम लोगों की आलोचना करने को अपनी बुनियादी पहचान बना चुका है, उसे अपनी आलोचना का भी खुलकर स्वागत करना चाहिए था। हाईकोर्ट के जुर्माने के फैसले को जरूर चुनौती देनी चाहिए, हो सकता है कि जिन्हें जुर्माना सुनाया गया हो वे लोग चुनौती न दें, लेकिन ऐसे में यह जुर्माना एक मिसाल बनकर जिंदा रहेगा, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक में कोई न कोई अदालत के इस नजरिए को खारिज करने की अपील सुप्रीम कोर्ट में जरूर करें। 
-सुनील कुमार

Related Post

Comments