संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 3 मई : एक रहस्य जिसे खुलने में  अभी तीन हफ्ते बाकी हैं..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 3 मई : एक रहस्य जिसे खुलने में अभी तीन हफ्ते बाकी हैं..
Date : 03-May-2019

हिन्दुस्तानी राजनीति में एक हिसाब से एक सबसे ही अनोखा किरदार है डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी का। घनघोर हमलावर हिन्दुत्व के झंडाबरदार, साम्प्रदायिक और नफरती बातों के बड़े शौकीन। विदेशों में पढ़े हुए, और विदेशों में पढ़ाए हुए। काबिलीयत से वकील, और देश के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक अकेले लडऩे के शौकीन, और कई लोगों को भ्रष्टाचार में अदालत के कटघरे तक घसीटने वाले, या जेल भेजने वाले। लेकिन इसके साथ-साथ उनकी एक बहुत बड़ी खूबी यह भी है कि जिस भारतीय जनता पार्टी के वे सांसद हैं, उसी के सबसे बड़े लोगों के खिलाफ बोलने में वे हिचकते नहीं हैं। पूरे पांच बरस उन्होंने मोदी सरकार के एक सबसे वजनदार मंत्री, देश के वित्तमंत्री अरूण जेटली के खिलाफ उतना ही हमलावर अभियान छेड़े रखा जितना हमलावर उन्होंने सोनिया गांधी के कुनबे के खिलाफ चला रखा है। अभी एक ताजा इंटरव्यू में उन्होंने जितना खुलकर मोदी-शाह के खिलाफ भी कहा है, जिस तरह भाजपा के लिए नुकसानदेह बातें पूरी बेफिक्री से कही हैं, वह देखने-सुनने लायक है। भाजपा के भीतर आज भला और किसकी यह हिम्मत हो सकती थी जो यह कहे कि पार्टी की सीटें बहुत बुरी तरह कम होने जा रही हैं, पार्टी बाहर के और साथियों की मोहताज रहेगी, और हो सकता है कि ऐसे साथी मोदी को मुखिया मंजूर न करें, तो मोदी दुबारा पीएम न बन पाएं। 

सुब्रमण्यम स्वामी का राजनीतिक इतिहास आपातकाल के वक्त से चर्चित है जब वे फरारी के बीच संसद के भीतर पहुंच गए थे, और वहां बयान देकर फिर फरार हो गए थे। तब से लेकर अब तक वे रामसेतु से लेकर राम मंदिर तक के लिए एक कट्टर और धर्मान्ध, घोर मुस्लिमविरोधी हिन्दू नेता की तरह लगे हुए हैं, और मुस्लिमों के लिए नफरत की अपनी बातों के चलते वे प्रतिष्ठित अमरीकी विश्वविद्यालय हार्वर्ड में पढ़ाने का मौका भी छोड़ चुके हैं। सोनिया-राहुल को नेशनल हेरल्ड केस में जमानत लेने के लिए मजबूर करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा को खासी नागवार गुजरने वाली बातें कहने में पल भर भी नहीं लगाते हैं, और घर के भीतर इतने दुश्मन खड़े करते हुए भी उन्हें लगातार चुनाव जीतने, या राज्यसभा में मनोनीत न होने के खतरे से डर नहीं लगता है।

इस ताजा इंटरव्यू में सुब्रमण्यम स्वामी ने जो कहा है उस पर भाजपा के भीतर भी एक चुपचाप सोच जारी है। बीच-बीच में पार्टी के बाहर के कुछ लोगों ने यह बात सामने रखी थी कि अगर इस बार के चुनावी नतीजों में मोदी उम्मीद के मुताबिक कामयाब नहीं होते हैं, तो संघ परिवार उनकी जगह नितिन गडकरी जैसे किसी और को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना सकती है जो कि एनडीए के बाकी साथियों को अधिक मंजूर भी होगा। अभी चुनावी नतीजों में बीस दिन बाकी हैं, और ये दिन देश के एक हिस्से में चुनाव प्रचार के जरूर हैं, लेकिन देश के करीब तीन चौथाई हिस्से में वोट निपट गए हैं, और अब जनता इंतजार कर रही है कि नतीजों में कौन निपटेंगे। इसी के साथ-साथ यह अटकल भी जारी है कि मोदी नहीं तो कौन? चुनाव प्रचार में तो इस बात का मतलब कुछ और है, देश में मोदी नहीं तो कौन का मतलब मोदी का राहुल जैसा कोई विकल्प। लेकिन दूसरी तरफ एनडीए के भीतर मोदी नहीं तो कौन का एक दूसरा मतलब होता है। जाहिर तौर पर एनडीए की सबसे बड़ी भागीदार पार्टी भाजपा का मुखिया ही एनडीए का मुखिया होगा लेकिन यह बात भी जाहिर है कि मोदी के इन पांच बरसों में भाजपा और बाकी एनडीए, दोनों के ही बाकी तमाम नेता भुनगों की तरह बना दिए गए हैं, और किसी की कोई हस्ती नहीं हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे बागी तेवरों वाले लोग कम ही हैं, लेकिन यह बात जाहिर है कि अगर भाजपा मोदी-शाह की अगुवाई में जनाधार खोती है, तो एनडीए सबसे बड़ा गठबंधन होने के बावजूद, भाजपा एनडीए की मुखिया होने के बावजूद किसी और लीडर के नाम पर सोचा-विचारा जा सकता है। जरूरत से अधिक ताकतवर होना, और ताकत का जरूरत से अधिक इस्तेमाल करना, ये दोनों ही बातें भारत जैसे निर्वाचित लोकतंत्र में ऐसी ताकत के खिलाफ प्रतिउत्पादक हो जाती हैं। आज मोदी के साथ ये दोनों ही बातें एक ऐतिहासिक सीमा तक जुड़ गई हैं, और लोगों ने ऐसी ताकत पहली देखी-सुनी नहीं थी, इसलिए सहयोगी दलों के साथी नेताओं का सहमना स्वाभाविक है, और यह बात जनाधार खोने की हालत में मोदी के खिलाफ जा सकती है। सुब्रमण्यम स्वामी आरएसएस के जितने करीबी हैं, उसे देखते हुए यह बात अनायास नहीं लगती कि वे एक इंटरव्यू में इतने खुलासे से मोदी से परे की संभावना पर चर्चा करें, उसे एक विश्वसनीयता दें। लोगों को याद होगा कि पिछले महीनों में जब नितिन गडकरी ने ऐसे तेवर दिखाए थे, और ऐसे मासूम दिखते बयान दिए थे जो कि मोदी को चुनौती या मोदी का विकल्प भी माने जा रहे थे, तो भी ऐसा महसूस किया जा रहा था कि गडकरी संघ के कहे बोल रहे हैं। भाजपा और आरएसएस के संबंध और दोनों का एक-दूसरे पर काबू उतनी ही आसानी से समझा जा सकता है जितनी आसानी से एक घुप्प अंधेरे कमरे में किसी काली बिल्ली की मौजूदगी का एहसास किया जा सकता है। ऐसे में अब जब संघ के अधिक प्रभाव वाले हिन्दी इलाकों में वोट बाकी है, तब क्या मोदी से परे की संभावनाओं की चर्चा स्वामी के मुंह से छिड़वाकर संघ कोई संदेश देना चाहता है बाकी मतदाताओं को? यह समझना हमारे लिए आसान नहीं है लेकिन राजनीति की बिसात पर सीधे एक लकीर में चलने वाले हाथी और ऊंट कम होते हैं, आड़े-तिरछे ढाई घर चलने वाले घोड़े अधिक होते हैं। अब पहले गडकरी, और फिर स्वामी, ये दोनों कोई अनायास सिलसिला नहीं दिखते हैं, और ये दोनों ही भाजपा के एक काफी घटने वाले जनाधार की नौबत में संघ के रूख का इशारा करते दिख रहे हैं। लेकिन अगर एनडीए बहुमत में आ जाती है, और उसके भीतर भाजपा का आज का बहुमत बहुत गिरता नहीं है, तो फिर मौसम विभाग के हवा में उड़ते पजामों की तरह गडकरी-स्वामी हो सकता है कि अपने बयानों का कोई दाम चुकता करें। 
-सुनील कुमार

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