संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 4 मई : मुसीबत आ जाए, उसके पहले  की तैयारी कोई ओडिशा से सीखे
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 4 मई : मुसीबत आ जाए, उसके पहले की तैयारी कोई ओडिशा से सीखे
Date : 04-May-2019

बुरी बातों, खमियों, गलतियों, और गलत कामों पर तो लिखना होते ही रहता है लेकिन कुछ अच्छा होने पर उस पर लिखना कुछ कम हो पाता है। ऐसे में जब ओडिशा में कल तूफान आया, और वहां की सरकार बिना कोई हल्ला किए, पांच-दस लाख लोगों को उनके घरों से हटाकर सुरक्षित शेल्टरों में रखा, और हिफाजत के साथ-साथ उनके खाने-पीने और इलाज का भी इंतजाम किया, तो उस तरफ लोगों का ध्यान नहीं गया, और छह मौतों की तरफ ध्यान गया। लोगों को यह याद रखने की जरूरत है कि बीस बरस पहले जब इसी ओडिशा में एक बड़ा तूफान आया था तो दस हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी। हो सकता है कि वह तूफान अधिक जानलेवा रहा हो, लेकिन उससे सबक लेकर पिछले पन्द्रह बरसों की नवीन पटनायक सरकार ने ओडिशा में जो इंतजाम किए, उन्हीं का नतीजा रहा कि मौतें हजारों के बजाय कुल आधा दर्जन हुईं। जबकि तूफान से हुई तबाही का नजारा सामने है। 

देश के मीडिया में कुछ जगहों पर नवीन पटनायक सरकार की तारीफ हो रही है कि उन्होंने मौसम की भविष्यवाणी देखते हुए बचाव का इंतजाम किया, और पिछले पांच बरसों का हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा तूफान अधिक इंसानों को नहीं ले जा पाया। देश में सबसे गरीब लोगों का यह प्रदेश जो कि भगवान जगन्नाथ का घर भी है, वहां पर तूफान का इतिहास दो हजार साल से अधिक पुराना दर्ज किया हुआ है, और छोटे-मोटे तूफान वहां पर आते ही रहते हैं। लोगों को याद होगा कि ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक देश के सबसे कम चर्चित मुख्यमंत्री हैं, उनके बारे में कोई खबरें नहीं आती हैं, वे देश में कहीं आते-जाते नहीं हैं, और ओडिशा सरकार खबरों में सबसे कम रहने वाली प्रदेश सरकार है। लेकिन जाहिर है कि ऐसी सरकार ने परले दर्जे की बकवास और कामयाबी के बड़े-बड़े दावों के बजाय जमीन पर काम करने पर ज्यादा भरोसा किया, और ऐसी बड़ी प्राकृतिक विपदा के लिए प्रदेश को तैयार करके रखा, अपने लोगों की जिंदगियां बचाईं। 

देश के सभी प्रदेशों को, और प्राकृतिक विपदाओं के खतरे में जीने वाले शहरों को भी आपदा प्रबंधन का ऐसा ही इंतजाम रखना चाहिए। ऐसा इंतजाम कभी भी तबाही जैसी बड़ी खबर नहीं बन सकता, लेकिन जिम्मेदार सरकार, नेता-अफसर उसकी परवाह किए बिना अपना बुनियादी काम जारी रख सकते हैं, उन्हें रखना चाहिए। कुदरत कई मौकों पर उम्मीद से बहुत अधिक खफा साबित होती है, जैसे कि कुछ बरस पहले उत्तराखंड में हुई थी जहां केदारनाथ के हजारों तीर्थयात्री गायब हुए, और सैकड़ों का अब तक कोई पता नहीं है। हिन्दुस्तान में कई जगहों पर भूकंप और बाढ़ से भी भारी तबाही होती है, और समुद्री तूफान भी कई तटीय राज्यों पर हमले करता है। जिन राज्यों में प्राकृतिक विपदा कम रहती है, वहां भी कई मानवनिर्मित हादसे हो सकते हैं, जैसे भोपाल गैस त्रासदी। इसलिए हर राज्य के पास, हर शहर के पास संभावित खतरों की अपनी अलग-अलग लिस्ट हो सकती है, जिनमें बड़े ट्रेन हादसे हो सकते हैं, कारखानों के हादसे, बोट डूबने के हादसे हो सकते हैं। ऐसी तमाम नौबतों के लिए अगर सरकारें और शहर उसी तरह तैयार रहें जैसे कि ओडिशा इस बार के तूफान के लिए तैयार था, तो जन-धन का नुकसान बहुत घट सकता है। अधिक आशंका के मुकाबले कम नुकसान होना लोगों को न दिखता है, न मीडिया में उस तरह से आता है। इस पर लिखना भी बहुत से लोगों को विचारोत्तेजक नहीं लगेगा, लेकिन हर बात उत्तेजित करने के लिए तो हो नहीं सकती, बहुत सी बातें ठंडे दिल से काम करने के लिए होनी चाहिए। आपदा प्रबंधन के भी पहले आपदा प्रबंधन की योजना सबसे अधिक मायने रखती है क्योंकि अगर वही नहीं बनी हैं, तो फिर आपदा आ जाने पर उसके प्रबंधन के दौरान नुकसान को कम रखना नामुमकिन भी हो सकता है। लेकिन अगर योजना समय रहते बने, तो जिस तरह ओडिशा में बीस बरस पहले के तूफान में दस हजार से अधिक लोग मारे गए थे, और इस बार मौतों का आंकड़ा दहाई तक भी नहीं पहुंचने दिया गया, वह न सिर्फ काबिलेतारीफ बात है बल्कि वह दूसरे लोगों के लिए सीखने की भी एक बात है। 
-सुनील कुमार 

Related Post

Comments