संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 6 मई : फौज को सरहद पर या बैरकों  में ही रहने देना चाहिए,  चुनावी इस्तेमाल खतरनाक
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 6 मई : फौज को सरहद पर या बैरकों में ही रहने देना चाहिए, चुनावी इस्तेमाल खतरनाक
Date : 06-May-2019

पिछले कुछ दिनों में लोकसभा चुनाव प्रचार में हिन्दुस्तानी फौज का जिस तरह जिक्र किया गया, और वोटों के लिए फौज की कार्रवाई, या बहादुरी को दुहा गया, वह बहुत अफसोस की बात है। यह सिलसिला पुलवामा में हुए आतंकी हमले की चर्चा से शुरू हुआ, वहां शहीद होने वाले दर्जनों सैनिकों की शहादत पर वोट मांगना खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया, और इस बात को बढ़ाकर पाकिस्तान पर हुए सर्जिकल स्ट्राईक तक पहुंचाया। इस बीच चुनाव आयोग यह खोखली नसीहत देते रहा कि फौज का जिक्र वोटों के लिए न किया जाए, लेकिन उस नसीहत को कचरे की टोकरी में फेंकते हुए मोदी के मंत्री और एक भूतपूर्व फौजी राज्यवर्धन राठौर ने यहां तक कह दिया कि पूरी फौज भाजपा और मोदी के पीछे खड़ी हुई है। आम लोगों की इस पर प्रतिक्रिया सामने आई कि क्या अब रोड शो में फौज भी शामिल होगी? लेकिन सर्जिकल स्ट्राईक का लगातार चुनावी इस्तेमाल कांग्रेस को भी इस बात के लिए मजबूर कर दिया गया कि वह अपने दस बरस के कार्यकाल में पाकिस्तान पर की गई कई सर्जिकल स्ट्राईक को तारीखों और जगह के साथ जनता के सामने रखे, और कई भूतपूर्व फौजी आला अफसर सामने आए जिन्होंने कहा कि मोदी के पहले उन्होंने सर्जिकल स्ट्राईक की अगुवाई की थी, खुद हमला किया था। 

दरअसल फौज को महिमामंडित करना, और फौजी कार्रवाई के लिए अपने आपको महिमामंडित करना राष्ट्रवाद के उस बिखराए जा रहे सैलाब के साथ मेल खाता है जिसकी लहरों पर सवार होकर मोदी सरकार में दुबारा आने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। यह हिन्दुस्तान का पहला चुनाव है जिसमें फौज और फौजी कार्रवाई का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है, और जब मोदी के पहले के वक्त के सर्जिकल स्ट्राईक गिनाए जा रहे हैं, तो मोदी उन्हें अपनी आमसभाओं में वीडियो गेम कहते हुए न सिर्फ खारिज कर रहे हैं, बल्कि पिछले फौजी जनरलों के किए हुए काम को झूठा और अविश्वसनीय भी बता रहे हैं। हिन्दुस्तान जैसे मजबूत लोकतंत्र में फौज की गैरराजनीतिक भूमिका के लिए यह एक खतरनाक नौबत है कि आज की फौज को सच और कल की फौज को झूठा करार दिया जाए, फौज के नाम पर नेताओं द्वारा किए गए अलग-अलग कई किस्म के दावों के बीच सच को समझने की कोशिश को देश के साथ गद्दारी करार दिया जाए, और फौजी कार्रवाई को जनता के बीच इतने खुलासे के साथ उजागर करके वोट मांगे जाएं। लोगों को याद होगा कि कुछ समय पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक बयान दिया था कि पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक में न तो पाकिस्तान के कोई फौजी मारे गए, और न ही वहां के नागरिक मारे गए। उनकी अंग्रेजी में सिविलियन शब्द का इस्तेमाल हुआ था, और बाद में बारीकी से फर्क करने वाले कुछ लोगों ने उसे सिटीजन शब्द से अलग कहा। इस बारीकी से भी इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि सुषमा ने उस हमले में किसी भी पाकिस्तानी के न मरने की बात खुद होकर कही थी। अब अगर बाकी मोदी-मंत्रियों के मुताबिक और भाजपाध्यक्ष अमित शाह के मुताबिक अगर उस हमले में सैकड़ों लोग मारे गए थे, तो क्या वे तमाम सैकड़ों लोग पाकिस्तान से बाहर के थे? और अगर तमाम आतंकी गैरपाकिस्तानी हैं, तो फिर भारत का आतंक के पीछे पाकिस्तानियों का हाथ होने का दावा कमजोर होता है। कुल मिलाकर यह सिलसिला भारत के लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। यहां फौज का इस्तेमाल लुभावने प्रचार के लिए एक राजनीतिक हथियार की तरह किया जा रहा है। फौज के भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा आने से क्या होता है यह पाकिस्तान पिछली आधी सदी से भुगत ही रहा है। अभी कल ही वहां के एक नागरिक ने फौज के प्रवक्ता के बयान को राजनीतिक बताते हुए उसके खिलाफ अदालत जाने की बात सोशल मीडिया पर लिखी है। लेकिन हिन्दुस्तान में फौज का, झंडे का, राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान का, राजचिन्ह, गाय वगैरह का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है कि इन सबके एक खास किस्म के सम्मान से ही लोगों का देशप्रेम साबित हो सकेगा, वरना वे गद्दार कहलाएंगे। कुछ फौजी अफसर चुनाव के बीच ही जिस तरह से कश्मीर में आतंकियों को मारने को लेकर प्रेस कांफ्रेंस लेकर बयान जारी कर रहे हैं, वह भी कुछ अटपटी बात है। लोकतंत्र में फौज को सरहद पर या बैरकों में ही रहने देना चाहिए, उनका चुनावी इस्तेमाल बहुत खतरनाक है, नाजायज तो है ही।
-सुनील कुमार

Related Post

Comments