संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 9 मई : लाखों बरस के अहसान का चुकारा महज सौ बरस में !
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 9 मई : लाखों बरस के अहसान का चुकारा महज सौ बरस में !
Date : 09-May-2019

चुनाव करीब आने से हिन्दुस्तान में मौजूदा सरकार की नाकामयाबी के बहुत से आंकड़े सामने आते ही हैं। इनमें से एक आंकड़ा गंगा की सफाई का है जिसके बारे में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सहित दूसरी विशेषज्ञ संस्थाओं का कहना है कि इन पांच बरसों में गंगा की सफाई नहीं के बराबर हुई है। यह मौका गंगा सफाई मंत्री उमा भारती की उस सार्वजनिक कसम को याद करने का भी है जिसमें उन्होंने अपने कार्यकाल में गंगा की सफाई न होने पर जलसमाधि लेने की घोषणा की थी। खैर, वे काम चाहे न कर पाई हों, उन्हें जलसमाधि का उलाहना देना आत्महत्या के लिए उकसाना होगा, इसलिए हम वह काम बिल्कुल करना नहीं चाहते हैं। राजनीति में लोग कई तरह की बातें करते हैं, कई लोग कहते हैं कि उनका किया फलां काम कामयाब न हो तो उन्हें खम्भे से टांग दिया जाए। लेकिन ऐसी बातों को भूल जाना ही ठीक रहता है। राजनीति तो होती ही झूठ बोलने के लिए है, वोटर तो होते ही धोखा खाने के लिए हैं, और इसे अधिक गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। अब गंभीरता से लेने पर तो मन में यह सवाल भी उठ सकता है कि देश में कालाधन खत्म करने के लिए हजार रूपए के नोट बंद किए गए थे, तो फिर दो हजार के नोट क्यों शुरू किए गए? लेकिन ऐसे बेकार के सवालात मन में नहीं आने देना चाहिए क्योंकि जीना तो इसी देश में है, और बेचैनी इतनी क्यों बढ़ाई जाए कि वह बेकाबू हो जाए? आखिर देश के आधा दर्जन राज्यों के बस्तर जैसे जंगल के इलाकों में जो नक्सल-हिंसा चल रही है, वह बेकाबू-बेचैनी का ही तो नतीजा है। इसलिए लोगों को अपनी बेचैनी काबू में रखनी चाहिए, वायदों का चाहे जो हो वोट डालना चाहिए। 

जहां तक गंगा की सफाई का सवाल है, तो गंगा को साफ करने के नाम पर पिछले बरसों में जितने, और जैसे-जैसे नेताओं ने इस मासूम नदी में डुबकी लगाई है, उसी से यह साफ हो जा रहा था कि गंगा ऐसे में साफ नहीं होगी, बल्कि और गंदी ही होती चली जाएगी। जैसे-जैसे लोग अपने पाप का बोझ लेकर गंगा में डुबकी लगाकर उस गधे की तरह हल्का होकर निकलते हैं जिसने पीठ पर लदी नमक की बोरी का बोझ हल्का करने के लिए पानी में डुबकी लगा ली थी, वैसे पापियों के कुकर्म धोते-धोते राम तेरी गंगा मैली तो हो ही जानी थी। अब इसके साफ न होने में हैरानी क्यों होनी चाहिए? हैरानी इस बात पर होनी चाहिए कि लोग इसे साफ करने की कसम क्यों खाते हैं? कुछ लोग आदतन कसम खाने वाले होते हैं, और वे कभी सोनिया के प्रधानमंत्री बनने या संसद में पहुंचने पर भी सिर मुंडाने की कसम खाए हुए रहते हैं, और बचपन की यह बुरी आदत आसानी से जाती नहीं है।

लेकिन एक बार फिर नदी के गंदे होने की तरफ लौटें, तो यह बात साफ होती है कि दुनिया में जो करोड़ों किस्म के जीव-जन्तु हैं, उनमें इंसान नाम के प्राणी ही सबसे अधिक नाशुकरे हैं, अहसानफरामोश हैं। दुनिया का इतिहास जब लिखा गया, तो उसमें हर जगह यह बात लिखी गई कि मानव सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई। इंसान नदी के किनारे ही फसल उगाते हुए बड़े हुए, मछलियां मारकर खाते हुए बड़े हुए, नावों में दूर-दूर तक जाकर दुनिया को देखते रहे। सारी सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुईं, और इंसान की सारी असभ्यता से नदियों का विकास खत्म हुआ। ऐसा भी नहीं कि नदियों को इंसान के हाथों किसी विकास की जरूरत थी। वे तो इंसानों के आने के पहले से, उसके पुरखों, बंदरों के वक्त से, बंदरों के भी और पहले से मौजूद थीं। उन्हें बचने या बढऩे के लिए किसी की जरूरत नहीं थी। वे धरती का एक हिस्सा थीं, और इंसानी नस्ल न भी आई होती, तो भी नदियां लाखों बरस पहले की तरह आज भी जिंदा रहतीं, उनकी लहरें अठखेलियां भरती रहतीं। लेकिन जिन नदियों से इंसान ने बस लिया ही लिया, लाखों बरस तक जिनको दुहा, उन नदियों को पिछले सौ बरस के भीतर ही इंसानों ने इस कदर तबाह कर दिया कि उनकी हालत अब देखने लायक भी नहीं रह गई। गंगा अब पाप धो नहीं सकती, चमड़ी की बीमारी दे जरूर सकती है। कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि दो से तीन लाख साल पहले इंसान आए थे, और इन लाखों बरस नदियों ने इंसानों को आज का इंसान बनने में मदद की, सभ्यता और टेक्नालॉजी को बढ़ाने में मदद की, इंसानी जरूरतों को पूरा किया, और पिछले महज एक सौ बरस में शहरी गंदगी और कारखानों से निकलता जहर नदियों में डालकर इंसान ने इतने लाख बरस के अहसानों पर पेशाब कर दी। नदियों को इंसान अगर अकेला ही छोड़ देते, तो वे लाखों बरस पहले की तरह साफ-सुथरी बहती रहतीं। लेकिन यह इंसान का आम मिजाज है कि जिस थाली में वे खाते हैं, उसी में छेद भी कर देते हैं, थूक भी देते हैं। इसलिए लाखों बरस के नदियों के अहसान के मुकाबले इंसान ने उनमें शहरी गंदगी के नालों को सीधा खोल दिया, और कारखानों की गंदगी को भी नदियों में सीधा डाल दिया। नदियों के किनारे, नदियों की मदद से सभ्यता विकसित हुई, और पिछले सौ बरस में इस असभ्य और बेईमान नस्ल ने नदियों को तबाह भी कर दिया। अब इनका इस्तेमाल बेईमानी की कसम खाने के लिए भी होता है, और तस्वीरें खिंचवाकर वोट पाने के लिए भी। शहरी गंदगी और औद्योगिक गंदगी के साथ-साथ राजनीतिक नीयत की गंदगी भी इसे और अधिक बर्बाद करते चल रही है। 
-सुनील कुमार

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