संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 10 मई : कानून तोड़ते हुए कारखानों पर सरकार के कड़े तेवर क्यों नहीं?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 10 मई : कानून तोड़ते हुए कारखानों पर सरकार के कड़े तेवर क्यों नहीं?
Date : 10-May-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के शहर से सटे हुए औद्योगिक इलाके में पिछले तीन दिनों में दो बड़े कारखानों में हादसे हुए, और कई लोग बुरी तरह जख्मी हुए हैं, कुछ मौतें भी हुई हैं। यह तो राजधानी से लगे हुए कारखानों का हाल है, लेकिन इससे परे भी ऐसी ही हालत है, और पिछले एक साल में प्रदेश के सबसे बड़े कारखाने, केन्द्र सरकार के भिलाई इस्पात संयंत्र में एक से अधिक ऐसे बड़े-बड़े हादसे हुए हैं जिनमें बड़े-बड़े अफसरों की लापरवाही उजागर हुई है, और बड़ी संख्या में मौतों की वजह से इन अफसरों पर जुर्म कायम हुआ, इनकी गिरफ्तारी हुई, और बीएसपी के मुखिया को बदला भी गया। 

कुल मिलाकर उद्योगों में हालत यह है कि मजदूर कानूनों से लेकर औद्योगिक सुरक्षा तक, और औद्योगिक प्रदूषण से लेकर दूसरे नियम-कायदों तक सबको कुचलकर रख दिया गया है। दरअसल बड़े उद्योगों का चुनावी चंदे में बड़ा योगदान रहता है, और यह योगदान मुफ्त में तो किसी को मिलता नहीं है, सत्तारूढ़ पार्टी हो, या विपक्ष, या तो सरकार की मेहरबानी के लिए मिलता है, या फिर उद्योगों के अपराधों पर विपक्षी चुप्पी बनाए रखने के लिए विपक्षी दलों को मिलता है। चुनाव के वक्त नेता और पार्टियां पत्थर से तेल निकालने के अंदाज में उद्योगों से उगाही करते हैं, और फिर जनता के फेफड़े इनके हवाले कर देते हैं, मजदूरों के बदन इनके हवाले कर देते हैं, और पानी से लेकर आसमान तक को जहरीला बनाने की इजाजत इनको दे देते हैं। पिछले बरसों में लगातार यह देखने में आया कि सरकार की प्रदूषण रोकने की मशीनरी का इस्तेमाल नापसंद कारखानेदारों की बिजली काटने के लिए किया गया। कई बरस तक लगातार पिछली सरकार एक दारू कारोबारी की नापसंद पर उसके मुकाबले के एक दूसरे दारू कारोबारी का शराब कारखाना बंद करवाने का औजार बनी रही। सरकारी अमला ऐसे कारोबारी मुकाबले का चपरासी बना काम करते रहा। अब जब दो दिनों में राजधानी के बड़े कारखानों में दो हादसे हुए हैं, तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि बाकी कारखानों में भी औद्योगिक सुरक्षा के इंतजाम जांच लिए जाएं। 

साथ-साथ यह भी जरूरी है कि आबादी पर जहरीला धुआं उगलने वाले, खाली जगहों पर औद्योगिक कचरा फेंकने वाले कारखानों पर कड़ी कार्रवाई भी की जाए। वैसे भी विधानसभा और लोकसभा के चुनाव अब पांच बरस बाद ही आने हैं, ऐसे में सरकार को कड़ाई से कानून का पालन करवाना चाहिए। प्रदूषण निवारण मंडल सत्ता के तेवरों से चलने वाली एक बोगस संस्था बन चुकी है, और इसे फिर से असरदार संस्था बनाना चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ खनिजों पर आधारित कारखानों का प्रदेश है, और इन उद्योगों का एक मिजाज ही प्रदूषण फैलाने का रहता है। कोरबा से लेकर रायगढ़ तक, और रायपुर से लेकर भिलाई तक, चारों तरफ अंधाधुंध प्रदूषण है, मजदूर कानूनों और औद्योगिक सुरक्षा का दीवाला निकला हुआ है। छत्तीसगढ़ सरकार कई दूसरे मामलों में बड़े कड़े तेवर दिखा रही है, इस मामले में दिखाकर दिखाए तो जानें। 
-सुनील कुमार

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