संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  15 मई : लोगों की खूबियों का इस्तेमाल न करना सरकार की बड़ी खामी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 मई : लोगों की खूबियों का इस्तेमाल न करना सरकार की बड़ी खामी
Date : 15-May-2019

अलग-अलग प्रदेशों से सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के बहुत से ऐसे अच्छे कामों की कहानियां हर कुछ दिनों में सामने आती हैं जिन्हें देखकर गहरी अंधेरी सुरंग के आखिर से एक रौशनी सी आती दिखती है। इनमें से कोई अपनी जिम्मेदारियों से परे जाकर पेड़ लगवाकर जंगल खड़ा करवा देते हैं, तो कोई बच्चों को पढ़ाने का ऐसा बीड़ा उठाते हैं जिससे सैकड़ों फुटपाथी बच्चों की जिंदगी एक नई राह पर लग जाती है। ऐसे सैकड़ों तरह के काम हैं, और सैकड़ों अफसर-कर्मचारी हैं जिनका सरकारी जिम्मा कुछ और है, लेकिन जिनका योगदान किसी और दायरे में बेमिसाल रहता है। 

सरकारें आमतौर पर एक संवेदनाशून्य मशीन की तरह रहती हैं, और उसके जिस पुर्जे को जिस जगह फिट कर दिया गया है, वहां से उसके हिलने-डुलने की गुंजाइश बड़ी कम रहती है। किसी की तमाम दिलचस्पी किताबों में हैं, उसके ज्ञान का भंडार दुनिया भर की किताबों से जुड़ा हुआ है, लेकिन वह पुलिस विभाग में खरीदी के ओहदे पर हैं। ऐसे में किताबों से जुड़ी तमाम दिलचस्पी और जानकारी सरकार और समाज के लिए फिजूल होकर रह जाती है। दूसरी तरफ जहां-जहां सरकारों को नौकरियों से परे लोगों को मनोनीत करने की गुंजाइश दिखती है, सरकारें अपनी मर्जी के ऐसे लोगों को उन कुर्सियों पर बिठा देती हैं जो राजनीति, और चुनावी वोट के हिसाब से फायदे के हों। खुद समाज भी ऐसा ही बर्ताव करता है। अभी-अभी एक प्रदेश में चेम्बर ऑफ कॉमर्स ने मुख्यमंत्री से मुलाकात किसी और मुद्दे पर की, और अपने एक जाति के सदस्य का नाम मुख्यमंत्री को दे दिया कि उसे उस जाति की भाषा से जुड़ी साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बनाया जाए। उसकी काबिलीयत एक व्यापारी की है, लेकिन समाज का वजन और सरकार की समझ मिलकर उसे एक साहित्य अकादमी का अध्यक्ष भी बना सकते हैं। 

सरकारों को जनकल्याण के लिए एक ऐसा लचीला नजरिया इस्तेमाल करना चाहिए जिससे कि सबसे अच्छा हुनर रखने वाले लोगों को उसकी जरूरत वाली जगहों पर बिठाया जा सके। अमरीका जैसे देश में कोई भी राष्ट्रपति अपनी पसंद के बहुत से लोगों को बहुत सी सरकारी कुर्सियों पर बिठाने का हक रखता है, और आमतौर पर यह माना जाता है कि राष्ट्रपति के चार बरस के कार्यकाल में ऐसे लोग उनको दिए गए काम को बेहतर तरीके से करके दिखाएंगे। सरकार में मनोनयन से भरी जाने वाली कुर्सियां, और सरकारी नौकरियों से पहले से भरी हुई कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों की खूबियों को देखकर अगर उन्हें उनके हुनर और उनकी पसंद के काम में झोंका जाए, तो बेहतर नतीजे मिल सकते हैं। लेकिन सरकार में होता क्या है इसकी एक बड़ी अच्छी मिसाल कुछ बरस पहले सामने आई। महाराष्ट्र से एक आईएएस अफसर डेपुटेशन पर छत्तीसगढ़ आया, और उसे यहां पर हाथकरघा-विकास के काम में लगाया गया। महाराष्ट्र में वह हाथकरघा-अफसर का काम करके तो आया था, लेकिन वहां पर उसके जिम्मे यह था कि सरकारी सेक्टर के जितने हाथकरघे नुकसान में चल रहे थे, उन सबको बंद करना। उसका तमाम तजुर्बा हाथकरघा बंद करवाने का था, उन्हें चलवाने का नहीं। और जाहिर है कि ऐसा काम देने पर नतीजा क्या निकलेगा। लोगों को उनके मिजाज के खिलाफ, उनकी समझ के खिलाफ, उनके हुनर के खिलाफ काम देकर सरकार और समाज की उत्पादकता कहीं नहीं पहुंच सकती। इसलिए जब-जब जहां-जहां से सफलता की कुछ कहानियां आती हैं, तो वैसे लोगों को सरकारी विभागों के दायरों से परे जाकर उनकी खूबी के काम में लगाना चाहिए। सरकार के भीतर सेवा-शर्तों, और नियम-कायदे का ऐसा लचीलापन रहना चाहिए कि लोग उनकी सहमति और उनकी इच्छा से उनकी खूबी वाले काम में लगाए जा सकें। आज सरकारों का काम करने का तरीका इससे ठीक उल्टा दिखाई देता है, और लोगों को अधिक कमाई, अधिक ताकत, या अधिक महत्व की जगह पर बिठाना या वहां से हटाना ही सरकार का बुनियादी रूख बन गया है। 
-सुनील कुमार

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