संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 17 मई : जो अंग्रेज हिन्दुस्तान छोड़ गए, उन्होंने एक मिसाल पेश की है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 17 मई : जो अंग्रेज हिन्दुस्तान छोड़ गए, उन्होंने एक मिसाल पेश की है
Date : 17-May-2019

ब्रिटेन की एक खबर है कि वहां नौसेना के दूसरे सबसे बड़े ओहदे पर काम कर रहे एक शानदार अफसर को नौसेना के एक सबसे प्रतिष्ठित विमानवाहक पोत से हटा दिया गया है क्योंकि उन्होंने सप्ताहांत पर निजी काम के लिए सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल कर लिया था। हालांकि उन्होंने कार में पेट्रोल अपनी जेब से डलवाया था, लेकिन जांच में इस इस्तेमाल को कुल मिलाकर गलत पाया गया, और इसलिए इस पद से हटा दिया गया कि वे अपने मातहत लोगों के साथ किस तरह कड़ाई से पेश आ सकेंगे अगर वे खुद ही सरकारी गाड़ी का निजी उपयोग कर बैठे हैं। इस मामले में उनको कोई चेतावनी भी नहीं दी गई थी, सीधे हटा दिया गया है। 

अब अगर अंग्रेजों के छोड़े हुए हिन्दुस्तान को देखें, तो यहां छोटे-छोटे से सरकारी अधिकारी अपनी पूरी ताकत लगाकर सरकारी साधन-सुविधा, और मातहत कर्मचारियों का बेजा इस्तेमाल करते हैं। एक-एक अफसर नियमों के खिलाफ कई-कई गाडिय़ां रखते हैं, अपने बंगलों पर अनगिनत कर्मचारियों की फौज घरेलू नौकरों की तरह इस्तेमाल करते हैं, कहीं शादी-ब्याह में जाने के लिए उस शहर में कोई मीटिंग या दौरा दिखा देते हैं। हाल के महीनों में छत्तीसगढ़ में पिछली रमन सरकार के कार्यकाल में अफसरों के ऐसे बेजा इस्तेमाल के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उनसे ऐसा लग रहा है कि अंग्रेज लौटे नहीं हैं, और अपने इस गुलाम देश को लूटने का काम जारी रखे हुए हैं। जिस अंदाज से नेताओं और अफसरों के कुनबे सरकारी बंगलों, गाडिय़ों, बिजली, हवाई टिकटों, महंगी होटलों, और हर सामान की सरकारी खरीदी को सत्ता की एक आम संस्कृति बना चुके हैं, वह भयानक है। इस गरीब देश में जहां जनता के पास रियायती अनाज बिना पेट भरने का रास्ता नहीं हैं, जहां पर सरकारी इलाज न मिले तो मौत के अलावा कोई चारा नहीं है, जहां दोपहर का भोजन देश के दसियों करोड़ स्कूली बच्चों का पेट भरता हो, वहां पर सरकारी फिजूलखर्ची और उस पर ऐशोआराम का कोई अंत नहीं है। 

दरअसल जितना खर्च नेता-अफसर अपने और अपने कुनबों पर करते हैं, वह सरकार का ठोस नुकसान तो है ही, उनका यह मिजाज भी जनता के पैसों की बर्बादी का एक ऐसा सिलसिला शुरू करता है जो कि ऊपर से नीचे उतरते जाता है, और फिर छोटे-छोटे नेता और छोटे-छोटे अफसर भी इस फिजूलखर्ची को अपना हक मान बैठते हैं। पिछले बरसों में कभी-कभी सरकारी ड्राइवरों ने उनको रात-दिन अफसरों के निजी कामकाज में जोत देने के खिलाफ आवाज उठाई थी, लेकिन वह दब गई और उसका कुछ हुआ नहीं। लेकिन पिछले बरस छत्तीसगढ़ में जिस तरह पुलिस कर्मचारियों के परिवारों ने सड़क पर आकर आंदोलन किया था, वैसा कोई आंदोलन बंगलों पर तैनात सरकारी कर्मचारी अगर करें तो ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। लोकतंत्र में सामंती अंदाज में जनता के पैसों का ऐसा बेजा इस्तेमाल हिन्दुस्तान में एक आम संस्कृति बन गया है, और इसे खत्म करना चाहिए। 

लोगों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में लगातार इस बारे में लिखते आए हैं कि बड़े सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोगों को अंधाधुंध बड़े मकान नहीं देने चाहिए, क्योंकि उनके रख-रखाव का खर्च सरकार पर आता है, और वहां सरकारी मुलाजिमों को जानवरों की तरह जोत दिया जाता है। नेताओं और अफसरों को सिर्फ पारिवारिक जरूरत जितने बड़े मकान मिलने चाहिए, और बहुत ही सीमित संख्या में सहायक कर्मचारी मिलने चाहिए। यह बात इंसान की गरिमा के खिलाफ भी है कि उन्हें घरेलू कामों में इस तरह से लगा दिया जाए, और नौकरी की बेबसी में वे अफसर-नेता कुनबों के कपड़े धोने, कुत्तों को घुमाने, बच्चों को नहलाने जैसे काम भी करने को मजबूर हों। चूंकि सरकारी कर्मचारियों के संगठन नेताओं और बड़े अफसरों से कोई टकराव नहीं लेते हैं, इसलिए यह सिलसिला बेलगाम चलते जा रहा है, बढ़ते जा रहा है। ब्रिटेन की इस ताजा खबर को लेकर लोगों को सोचना चाहिए कि किस तरह सूचना के अधिकार से, कैमरों और स्टिंग ऑपरेशनों से कर्मचारियों और गाडिय़ों का बेजा इस्तेमाल साबित किया जा सकता है, और उसकी भरपाई के लिए अदालत में जनहित याचिका लगाई जा सकती है। हिन्दुस्तान की सरकारों में अदालती डंडे से कम कोई चीज काम नहीं करती है, और सरकारें अगर यही जुबान समझती हैं, तो लोगों को इसी का इस्तेमाल करके जनता के पैसों को बचाना चाहिए, और छोटे सरकारी कर्मचारियों को इंसान जैसी जिंदगी वापिस दिलवानी चाहिए। 
-सुनील कुमार

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