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संपादकीय दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 18 मई : सूत न कपास, कांग्रेस  की ओर से लठ्ठमलठ्ठा
संपादकीय दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 18 मई : सूत न कपास, कांग्रेस की ओर से लठ्ठमलठ्ठा
Date : 18-May-2019

पिछले दो दिनों में कांग्रेस की तीन खबरें कुछ तो आज के राजनीतिक हालात के बारे में बताती हैं, और कुछ कांग्रेस पार्टी के अपने हाल के बारे में। बिना सिलसिलेवार इन खबरों को देखें तो एक खबर है कि सोनिया गांधी 23 मई को विपक्षी पार्टियों के नेताओं को एक बैठक के लिए न्यौता भेज चुकी हैं, जो कि जाहिर है कि मोदी और एनडीए के खिलाफ एक संभावित मोर्चे या गठबंधन को लेकर है। लेकिन परसों कांग्रेस के एक बड़े नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कांग्रेस इस बात के खिलाफ नहीं हैं कि किसी क्षेत्रीय दल का नेता प्रधानमंत्री बने। और कल कांग्रेस ने यह साफ किया कि बयान का यह मतलब नहीं था, और जाहिर तौर पर किसी गठबंधन में जो सबसे बड़ी पार्टी होती है, उसके मुखिया को ही प्रधानमंत्री बनाना चाहिए। इन दो बयानों के बीच के कुछ घंटों में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने यह मतलब निकालना शुरू कर दिया कि कांग्रेस देश में कर्नाटक प्रदेश वाला फॉर्मूला लागू कर सकती है जिसमें उसने भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए अपने से छोटी पार्टी, जेडीएस, को मुख्यमंत्री का पद दिया। और ऐसा देश में अगर होता है, तो वह पहली बार नहीं होगा, देश-प्रदेश में ऐसा पहले भी हुआ है जो सबसे बड़ी पार्टी न भी हो, उसका नेता भी सरकार का मुखिया बनाया गया है। 

लेकिन कांग्रेस की जो बात परेशान कर रही है, वह यह है कि चुनावी नतीजों के आने के कुल पांच दिन पहले एक ऐसी गैरजरूरी चर्चा छेड़ी जाती है जिसे छेडऩा कोई मजबूरी नहीं थी, और फिर उसे छेडक़र उसका खंडन किया जाता है, वह भी तब जब चार दिन बाद सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं से मिलने ही वाली हैं। कुछ लोग ऐसा मान सकते हैं कि यह सोनिया की बैठक के पहले हवा के रूख को भांपने की एक राजनीतिक चतुराई रही होगी कि ऐसा बयान दिया जाए, खंडन किया जाए, और उस पर लोगों की प्रतिक्रिया देखी जाए। अगर यह सोच-समझकर किया गया है, तो यह बहुत ही नासमझी का तरीका है। और अगर यह लापरवाही में किया गया है तो कोई भी पार्टी ऐसी लापरवाही का नुकसान मुश्किल से ही बर्दाश्त करेगी। आज जब नरेन्द्र मोदी नाम की एक लहर या आंधी की आशंका के खिलाफ ऐसी तैयारी चल रही है, तो कुछ बोलने का काम तब होना चाहिए था जब सोनिया विपक्ष के बाकी नेताओं के मन की बात सुनने का काम कर चुकी होतीं। जब सुनने का मौका है, सुनने की जरूरत है, तब बेमौके बोलना, बिना जरूरत बोलना, यह समझदारी की बात तो बिल्कुल नहीं है। 

आज की संसद में कांग्रेस कुल 44 सदस्यों वाली पार्टी बनकर रह गई है, और उसकी आगे की संभावनाएं अगले हफ्ते बेहतर हो सकती हैं, लेकिन फिर भी इतनी बेहतर शायद न हों कि कांग्रेस बाकी विपक्षी पार्टियों से मीडिया के मार्फत बात करके भी सरकार बना ले। पिछले आधे बरस को अगर देखें, तो जब देश की बहुत सी पार्टियां तरह-तरह के गठबंधन बना रही थीं, कांग्रेस ने जाने किस जोड़-घटाने के तहत एक के बाद दूसरा प्रदेश बिना गठबंधन अकेले लडऩा तय किया। उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा के साथ किसी तालमेल की कोशिश कम से कम मीडिया में नहीं आई, बंगाल में कांग्रेस न ममता के साथ रही, न वामपंथियों के साथ, केरल में कांग्रेस वामपंथियों के खिलाफ भी लड़ी, और उन्हें नाराज करने की हद तक लड़ी। ऐसा और भी कई प्रदेशों में हुआ जो कि दिल्ली में जाकर खत्म हुआ, और अरविंद केजरीवाल के साथ कोई तालमेल नहीं हुआ, न दिल्ली में, न पंजाब में। एक पार्टी की हैसियत से यह कांग्रेस का हक भी है और उसकी जिम्मेदारी भी है कि किसी प्रदेश में वह ऐसा अपमानजनक समझौता, गठबंधन, या तालमेल न करे जो कि उस प्रदेश में पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोडक़र रख दे और उस प्रदेश में पार्टी को जमीन से खत्म ही कर दे। यह बात तो ठीक है, लेकिन एक दूसरी बात यह भी है कि जब मामला संसद में एनडीए के खिलाफ यूपीए या किसी नए गठबंधन के आंकड़े खड़े करने का हो, तो कांग्रेस को क्षेत्रीय गठबंधन के बारे में अधिक सोचना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस अकेले चलने की नीति पर टिकी हुई, या अड़ी हुई दिखती रही। यूपीए के पिछले साथियों के साथ वह जरूर है, लेकिन बहुत से राज्यों में उसने जीत की संभावनाएं तभी खो दीं, जब उसने उन राज्यों में कोई तालमेल नहीं किया। 

कर्नाटक में कांग्रेस यह देख चुकी है कि अगर उसे भाजपा को रोकना है तो उसे अपने से कम विधायकों वाली पार्टी को भी मुखिया बनाना पड़ेगा, और उसके मातहत काम करना पड़ेगा। आज मोदी और एनडीए के खिलाफ जितनी पार्टियां हैं, उन सबको यह समझने की जरूरत है कि चुनावी नतीजों के बाद अगर ऐसी नौबत आती है कि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के मुकाबले दूसरी पार्टियों या दूसरे गठबंधनों को एकजुट होना पड़े, तो उस वक्त बातचीत के रिश्ते बनाए रखने के लिए आज कांग्रेस को गैरजरूरी बातचीत नहीं करनी चाहिए। आज कांग्रेस की हसरत अपनी अगुवाई में एक सरकार की हो सकती है, लेकिन हकीकत यह है कि अगर किसी की भी अगुवाई में मोदी-शाह को सत्ता से बाहर रखा जा सकता है, तो भी वह राहुल गांधी की एक कामयाबी ही कहलाएगी। आज कांग्रेस और राहुल का भविष्य महज इसमें नहीं है कि राहुल प्रधानमंत्री बने, मोदी दुबारा प्रधानमंत्री न बने, यह भी कांग्रेस और राहुल की छोटी कामयाबी नहीं होगी। इसलिए कांग्रेस के बड़बोले नेताओं को आज प्रधानमंत्री के ओहदे पर दावेदारी के बजाय एक संसदीय-लोकतांत्रिक दरियादिली की बात करनी चाहिए। ऐसे माहौल में राहुल के पीएम बनने की बात पार्टी के भीतर एक कामयाब चापलूसी तो हो सकती है, लेकिन अगर कांग्रेस दूसरी पार्टियों का दिल नहीं जीत पाएगी, तो यह चापलूसी धरी रह जाएगी। कांग्रेस हाईकमान या सोनिया गांधी के लिए बेहतर यही होगा कि अपनी पार्टी के तमाम नेताओं को यह हिदायत दें कि वे अगली सरकार, गठबंधन और प्रधानमंत्री पद के बारे में कुछ भी न बोलें।

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