संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 मई : निकम्मे वोटरों को धिक्कारने  का काम जरूर करना चाहिए
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 मई : निकम्मे वोटरों को धिक्कारने का काम जरूर करना चाहिए
Date : 19-May-2019

वैसे तो आज जब यह अखबार छपेगा तब तक 2019 के आम चुनाव का आखिरी वोट डलने को होगा, लेकिन वोटों की चर्चा इसलिए भी होनी चाहिए कि वोट न डालने वाले लोग कुछ आत्मग्लानि में तो रहें। देश भर से आने वाली खबरें बड़ा हौसला बंधाती हैं कि अंधेरी लंबी सुरंग के आखिरी सिरे पर रौशनी की एक किरण दिखने की उम्मीद लिए हुए एक 105 और 110 बरस के लोग भी दूसरों के कंधों पर और गोद में वोट डालने पहुंचते हैं। हिमाचल के एक वोटर ऐसे हैं जो कि पहले चुनाव से लेकर अब तक हर चुनाव में वोट डालते आए हैं। बिहार के पटना में दो ऐसी लड़कियां हैं जिनका बाकी धड़ तो अलग है, लेकिन जिनके सिर बचपन से ही जुड़े हुए हैं। अब ऐसी तकलीफदेह जिंदगी का अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं रह जाता कि जुड़े हुए सिरों के साथ वे आखिर कर क्या सकती हैं? लेकिन जब वोट देने की बारी आई तो पिछले चुनाव में इन दोनों बहनों को एक मानकर इनका एक ही वोटर कार्ड बना था। इस बार इन्होंने कोशिश करके अलग-अलग दो कार्ड हासिल किए, और सिर से जुड़े-जुड़े ये बहनें अभी वोट डालने पहुंच रही होंगी। 

लेकिन अलग-अलग सिरों वाले बहुत से लोग साधन और सुविधा रहते हुए भी घर बैठे रहे, और यही नतीजा रहा कि 30-40 फीसदी वोट नहीं डाले गए हैं। इनमें बहुत से तो ऐसे वोट हैं जो कि शहरी इलाकों में हैं, जहां खतरा नहीं है, जहां दिक्कत नहीं है। नक्सल बारूदी सुरंगों पर से चलकर वोट डालने जाते हुए आदिवासियों को देखें तो लगता है कि वोट की समझ उन्हें शहरियों के मुकाबले अधिक है। जहां नक्सलियों ने वोट न डालने के फतवे जारी किए थे, जहां आए दिन बेकसूरों की नक्सल-हत्या होती है, वहां भी लोग वोट डालने उमड़ पड़े थे। लेकिन 30-40 फीसदी लोग वोट डालने नहीं पहुंचे जो कि एक फिक्र की बात भी है, और लोकतंत्र का बड़ा नुकसान भी है क्योंकि वोटों का फैसला महज कुछ फीसदी से हो जाता है, और उससे कई गुना वोटर घर बैठे रह जाते हैं। ऐसे में इन लोगों को आत्मग्लानि में डालना भी जरूरी है। 

भारत में बीच-बीच में एक बहस चालू होती है कि मतदान को अनिवार्य बनाना चाहिए ताकि जो लोग वोट नहीं डालते उनको सरकारी सुविधाएं न मिलें। लेकिन आजादी के हिमायती लोगों का यह भी मानना रहता है कि वोट न डालने की आजादी लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा रहना चाहिए। कोई पांच बरस पहले वोटर के सामने एक नया विकल्प रखा गया था, नोटा। इसका मतलब था नन ऑफ द अबोव, यानी इनमें से कोई नहीं। और नोटा की यह बटन वोटिंग मशीन पर आखिर में रखी जाती थी कि सारे वोटरों के नाम, सारी पार्टियों के नाम देख लेने के बाद भी अगर कोई पसंद न आए तो लोग नोटा को वोट दे दें जो कि सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का एक रूख रहेगा। और लोग जगह-जगह इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं। लेकिन इससे आगे बढ़कर कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सांसद या विधायक को चुन लेने के बाद भी उसे वापिस बुलाने का अधिकार भी रहना चाहिए ताकि जनता का एक बड़ा तबका अगर निराश हो जाए तो एक जनमत संग्रह से उन्हें वापस बुलाया जा सके। खैर, यह एक अलग बात है आज तो चर्चा उन लोगों की हो रही है जो चुनने के लिए वोट डालने नहीं जा रहे, और उनसे यह उम्मीद कैसे की जाए कि वे चुने हुए को वापिस बुलाने के लिए वोट डालने की जहमत करेंगे। 

लेकिन जो लोग वोट डालने नहीं जाते हैं, उन्हें उनके आसपास के वोट डालने वाले किस तरह कोंच सकते हैं, इस पर चर्चा अभी से इसलिए होनी चाहिए कि ऐन चुनाव के वक्त वोट डालने या न डालने की सोच एक पखवाड़े में बदलती नहीं है। अब इसी हफ्ते हर सीट के, हर बूथ के वोट आ जाएंगे, और जिम्मेदार वोटरों को चाहिए कि वे अपने इलाकों की जीत-हार पर बोलने वाले लोगों को याद दिलाए कि इन नतीजों में वोट न डालकर भी उन्होंने कैसा योगदान दिया है। वोट न डालने वाले अपनी गैरजिम्मेदारी के बारे में झूठ नहीं बोलते हैं। और जिम्मेदार वोटरों की यह भी जिम्मेदारी है कि वे अपने आसपास के लोगों को भी धकेलकर पोलिंग बूथ ले जाएं, इस बार नहीं हो पाया है तो अगले किसी चुनाव में ले जाएं। चुनाव कई किस्म के होते हैं, संसद के, विधानसभा के, और पंचायत-म्युनिसिपल के। अगला चुनाव कोई न कोई तो आएगा, और तब तक निकम्मे वोटरों को धिक्कारने का काम जरूर करना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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