विचार / लेख

वैश्विक आतंकवाद : और बिगड़ रहे हैं हालात
वैश्विक आतंकवाद : और बिगड़ रहे हैं हालात
Date : 20-May-2019

राम पुनियानी

सिर्फ ‘जन-संहार के हथियार’ की अफवाह पर एक भरे-पूरे देश इराक को नेस्तनाबूद करने वाले अमरीका की तेल-भंडारों पर कब्जा जमाने की लपलपाहट को सब जानते हैं। अपनी इस हवस की खातिर पहले भी उसने कई खूंखार आतंकवादी संगठन खड़े किए हैं और अब वह नए सिरे से इसी हवस की खातिर आतंकवाद को फिर उछाल रहा है। संभव है, इस बार इसकी शुरुआत इन दिनों ईरान पर साधे जा रहे फौजी हमले से हो।  

वैश्विक आतंकवाद ने भयावह स्वरुप अख्तियार कर लिया है। नौ ग्यारह 2001 से हालात बिगडऩे शुरू हुए और यह सिलसिला अब भी जारी है। ‘ट्विन टावर्स’ पर हमले के बाद से आतंकवाद को एक धर्म विशेष से जोडऩे की कवायद शुरू हो गयी और अमेरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। साम्राज्यवादी अमेरिका के कच्चे तेल के संसाधनों पर कब्जा जमाने के प्रयास ने पश्चिम-एशिया में जबरदस्त उथल-पुथल मचा दी। आतंकवाद ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। इसके जवाब में प्रतिक्रियावादियों की कुत्सित हरकतें शुरू हो गईं। सन् 2011 में नॉर्वे के एक युवा अन्द्रेस बेहरिंग ब्रेविक ने अपनी मशीनगन से 86 व्यक्तियों की हत्या कर दी। श्वेतों की बहुसंख्या वाले देशों में प्रवासी मुसलमानों के प्रति भय के बातावरण और वैश्विक स्तर पर इस्लाम के प्रति नफरत के भाव ने एक-दूसरे को मजबूत किया और नतीजे में वैश्विक आतंकवाद ने अत्यंत भयावह रूप ले लिया।
श्रीलंका में 20 अप्रैल 2019 को तीन गिरजाघरों व दो पांच सितारा होटलों पर आत्मघाती आतंकियों द्वारा किये गए हमले में ईस्टर मना रहे 250 निर्दोष ईसाई मारे गए। इस हमले की जिम्मेदारी अंतरर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन ‘इस्लामिक स्टेट’ ने ली, परन्तु श्रीलंका सरकार का कहना है कि इसके पीछे एक स्थानीय अतिवादी इस्लामिक संगठन ‘तोहीत जमात’ का हाथ है। 
श्रीलंका के रक्षा मंत्री रुवान विजयवर्धने के अनुसार, यह हमला न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में मस्जिदों पर हुए हमले का बदला लेने के लिए किया गया था। न्यूजीलैंड में हुए हमले में 53 लोग मारे गए थे। वह हमला एक श्वेत श्रेष्ठतावादी ऑस्ट्रेलियाई प्रवासी द्वारा किया गया था। श्रीलंका में ‘तोहीत जमात’ को प्रतिबंधित कर दिया गया है।  श्रीलंका की इस त्रासद घटना के बाद मीडिया में एक बार फिर इस्लामिक आतंकवाद की चर्चा होने लगी और आतंकी हमलों के लिए इस्लाम को जिम्मेदार बताया जाने लगा। आतंकवाद पर कोई लेबल चस्पां करने से पहले हमें वर्तमान परिदृश्य और अतीत का गंभीरता से विश्लेषण करना होगा। कहानी की शुरुआत अमेरीका द्वारा तालिबान और मुजाहिदीन को खड़ा करने से होती है। इसके लिए पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किये गए, जिनमें सऊदी अरब में प्रचलित इस्लाम के वहाबी-सलाफी संस्करण के जरिये युवाओं को आतंकवाद की राह पर चलने के लिए प्रवृत्त किया गया। इस्लाम का यह संस्करण अति-कट्टरपंथी है और शरिया का विरोध करने वालों पर निशाना साधता रहता है।   पाकिस्तान में अमरीकी सहयोग और समर्थन से जो मदरसे स्थापित किये गए, उनमें जिहाद और काफिर जैसे शब्दों के अर्थ को तोड-मरोडक़र प्रस्तुत किया गया। इसका नतीजा था, अल कायदा। अमेरीका ने अफगानिस्तान में काबिज रुसी सेना से लडऩे के लिए कट्टर युवाओं की फौज तैयार करने की खातिर 800 करोड़ डॉलर और सात हजार टन युद्ध सामग्री उपलब्ध करवाई। यही थी, आतंकवाद की शुरुआत। वियतनाम युद्ध में पराजय से अमरीकी सेना का मनोबल काफी गिर गया था और इसलिए उसने अपनी सेना की बजाय, रूस से लडऩे के लिए एशियाई मुसलमानों की फौज का इस्तेमाल किया। अमेरिका का प्राथमिक और मुख्य लक्ष्य था पश्चिम-एशिया के तेल-भंडारों पर कब्जा करना।
मुजाहिदीन, तालिबान, अल कायदा, इस्लामिक स्टेट और उनकी स्थानीय शाखाओं ने जो कुछ किया और कर रहे हैं, वह मानवता के लिए बहुत बड़ी त्रासदी है। अमरीका ने ही इस्लाम के विरुद्ध विश्वव्यापी भय उत्पन्न किया, जिसकी समान और विपरीत प्रतिक्रिया के रूप में अन्द्रेस बेहरिंग ब्रेविक और ब्रेंटन टेरंट जैसे लोग सामने आये और पागलपन का चक्र पूरा हो गया। ऐसा लगता है कि दुनिया ने ‘खून का बदला खून’ का सिद्धांत अपना लिया है। युवाओं के दिमाग में जहर भर कर आतंकवाद के जिन्न को पैदा तो कर दिया गया, परन्तु अब उसे बोतल में बंद करना असंभव हो गया है।
 ब्रेविक और टेरंट जैसे लोग प्रवासी मुसलमानों को सभी मुसीबतों की जड़ बता रहे हैं। इस तरह की सतही समझ अन्य लोगों की भी होगी।आतंकी हिंसा के अलावा, नस्लीय हिंसा से भी हमारी दुनिया त्रस्त है। श्रीलंका में ‘बोधू बल सेना’ (बौद्ध शक्ति बल), मुसलमानों और ईसाईयों को निशाना बना रही है। श्रीलंका में ही तमिल  (हिन्दू) भी निशाने पर हैं। म्यांमार में आशिन विराथू नामक एक बौद्ध भिक्षु, हिंसा के इस्तेमाल की वकालत कर रहा है और रोहिंग्या मुसलमानों पर हमले करवा रहा है। आज दुनिया भर में सम्प्रदायवादी ताकतें, धर्म का लबादा ओढ़ कर अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हिंसा के इस्तेमाल को उचित बता रही हैं। त्रासदी यह है कि चूँकि उनकी भाषा पर धर्म का मुलम्मा चढ़ा होता है इसलिए इन ताकतों द्वारा फैलाई जा रही नफरत का शिकार पूरे समुदाय बन जाते हैं।
 

 

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