विचार / लेख

लोकतंत्र के पर्व का अनोखा समापन
लोकतंत्र के पर्व का अनोखा समापन
Date : 20-May-2019

प्रकाश दुबे

प्रज्ञा सिंह ने मुखौटे को पलभर में फेंका। उन्होंने प्रमाणित किया कि चुनाव की खातिर कोई समझौता नहीं किया है। सोशल मीडिया, भाषणों और कुछ किताबों में अपशब्दों सहित गांधी- निंदा कुछ सिरफिरे लोगों की सोच मान कर खारिज मत करो। महात्मा गांधी की हत्या के बाद थोडे से कट्टरवादी जश्न मना सके होंगे। सात दशक बाद गांधी-हत्या को सही ठहराने वाले अधिक मुखर हैं। संगठित हैं। निर्भय हैं। न्योता देकर लोकसभा चुनाव लडऩे उन्हें बुलाया जाता है। गांधी की 150 वीं जन्मशताब्दी पर सरकारी तौर पर जश्न मनाने का ऐलान करने वाले नेता ने रणनीति का हिस्सा बता कर इसे न्यायोचित ठहराया।
 असहयोग आंदोलन में जनता ने थाने में आग लगा दी। फिरंगी सरकार की पुलिस की हत्या को हिंसा मानकर गांधी ने आंदोलन वापस लिया। इसके बावजूद दो साल सजा भोगी। गांधी के नश्वर शरीर को नष्ट करने वाली तीन गोलियां अहिंसा का विचार अब तक नहीं मिटा पाईं। अहिंसा का सम्मान 2019 तक विश्वव्यापी हो चुका है। गांधी ने आलोचना का सम्मान करना सिखाया था। प्रज्ञा ने हत्यारे को देशभक्त बताकर असहमति को कुचलने के मालेगांव कांड में अपने इकबालिया बयान की पुष्टि की है। न तो नाथूराम ने स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सेदारी की थी और न प्रज्ञा ने देश को बनाने में कोई भूमिका अदा की। नाथूराम गोडसे और  बाद में उनके भाई गोपाल गोडसे ने गांधी हत्या पर बार बार लिखा। 
1977 में जनता शासन की जीत के बाद गोपाल ने देश में कई जगह अपने विचार का प्रचार किया उन दिनों मधु लिमये मुखर थे। गांधीवादी सत्ता में थे। गोपाल को अपेक्षित यश नहीं मिला। गोडसे भाइयों के कथन और दृष्टिकोण पर आधारित गांधी-वध आणि मी, गांधी हत्या और मैं  नाटक का मंचन हुआ। ( हत्या और वध के अंतर को समझें।) प्रधानमंत्री मन से प्रज्ञा को माफ करें या न करें। राजधर्म की सीख कब किसने मानी है?  साधन-शुचिता की बात करने वाला गांधी कार्यसूची से बाहर होता जा रहा है। इसके कारणों पर चाहें तो प्रधानमंत्री विचार करें। 
 लोकसभा चुनाव के दौरान महापुरुषों और देश के पिछले कर्णधारों के विरुद्ध कसी गई फब्तियों का हिसाब निर्वाचन आयोग के पास है। वे जानें और उनका गणित जाने। निर्वाचन आयोग के वर्तमान पदाधिकारी अपने कामकाज की समीक्षा करने के लिए सभी जीवित पूर्व आयुुक्तों को निमंत्रित करने की पहल कर सकते हैं।  17 वीं लोकसभा का चुनाव मतदाताओं को देश-विदेश, स्वधर्म परधर्म, स्वजाति-अन्य जाति में बांटने के खुल्लमखुल्ला प्रयासों के बीच संपन्न हो रहा है। मोहनदास करम चंद गांधी ने 11 मई 1947 को अपील की कि  ब्रिटिश हुकूमत  को रवाना करने के लिए साथ मिलकर रहें। इस वाक्य के बाद उस दिन मौन धारण किया। एक जून 1947 को उन्होंने कहा-सब के सब अपनी जगह पर अपने धर्म का पालन करें तो हिंदुस्तान जैसा मैं आपको कहता हूं ऐसा बन सकता है उसमें मुझको तनिक भी शंका नहीं है।  
 गांधी आज़ादी से पहले ये बातें कह रहे थे क्यों कि वे नए देश में आज़ादी की चुनौतियों तथा खतरों को भांप रहे थे। उनके सपनों से अलग देश बनाने का अधिकार रखने वाले अहिंसा, साधन-शुचिता जैसे अड़ंगों से कुपित हैं। उनके लिए गोडसे हत्यारा नहीं नायक है। 
 मतदान का अंतिम चरण 19 मई को पूरा हो गया। गोडसे के हिमायती उस समय नाथूराम का जन्मदिन मना रहे होंगे। भारत के लोकतांत्रिक पर्व का समापन  गोडसे के जन्मदिन पर?  महज संयोग होना भी वर्ष 2019 के भारतीय लोकतंत्र पर जबर्दस्त टिप्पणी है। सुनियोजित है? फिर योजनाकार परदे में मुंह छुपाकर अपनी जीत पर न हंसे।  प्रज्ञा की तरह खुलकर  अपने विचार से जुड़े लोगों का अभिनंदन स्वीकार करे।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 

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