विचार / लेख

 देश और दुनिया इस हफ्ते
देश और दुनिया इस हफ्ते
Date : 21-May-2019

प्रकाश दुबे
श्रद्धांजलि

तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष नर चंद्राबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी बचा पाएंगे या नहीं? फैसला 23 मई को होगा। इस रुके हुए फैसले के कारण पार्टी के अधिवेशन की तैयारी अधर में अटकी है। बाबू ने पार्टी संगठन और मुख्यमंत्री पद दोनों ससुर नंदमूरि तारक रामाराव से छीने थे। इसके बावजूद पूरी निष्ठा के साथ एनटीआर के जन्मदिन पर 28 मई को पार्टी अधिवेशन और श्रद्धांजलि कार्यक्रम होते रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के नतीजों से बाबू की दिल्ली में मुलाकातें तय होंगी। दांव-पेंच चले जाएंगे। अधिवेशन टालने से भी बखेड़ा हो सकता है। कार्यकर्ता असमंजस में हैं। पार्टी अधिवेशन को महानाडु कहा जाता है जिसमें भावी रणनीति के प्रस्ताव पारित होते हैं।
घर के अंदर गोरखधंधा  
योगी आदित्यनाथ की चिंता अपार है। नाथ संप्रदाय के मुखिया और गोरखपुर मठ के कर्ताधर्ता होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में 11 दिन गोरखनाथ की नगरी को देने पड़े। उत्तर प्रदेश के हर लोकसभा क्षेत्र में दो बार फेरी लगाने का कार्यक्रम बना था। योगी को मतदाताओं को केन्द्र तक पहुंचाने की चिंता समझी जा सकती है। बरसों पहले सपा के इसी उम्मीदवार से टकराकर योगी बाबा का पसीना छूट गया था। मात्र सात हजार वोट से घिसटते हुए जीते थे। हिंदू वाहिनी बाबा आदित्यनाथ का गुटका संगठन है। कहने को गैरराजनीतिक। भाजपा ने मर्जी के लोगों को उम्मीदवार नहीं बनाया तो योगी बाबा ने 2012 के विधानसभा चुनाव में हिंदू वाहिनी के उम्मीदवार उतार दिए थे। इस चुनाव में हरीश द्विवेदी हिंदू वाहिनी के एकमात्र कार्यकर्ता हैं  जिन्हें बाबा बस्ती से लोकसभा की उम्मीदवारी दिला पाए। उनकी और गोरखपुर में थोपे गए रवि किशन दोनों की हालत समान है।
फिर भी मुमकिन है
स्टाक एक्सचेंज में दर्ज होने यानी लिस्टिंग के लिए कंपनियां कैसे कैसे हाथ-पैर मारती हैं, यह मालूम है। नियम का पालन न करने वालों पर कार्रवाई होती है। अब तक धारणा यही रही कि कुछ छोटी मछलियां ही जाल में फंसती हैं। राष्ट्रीय स्टाक एक्सचेंज की पड़ताल में इस बार कुछ नामी-गिरामी नाम दमके। गौतम अडानी को ही लो। कई जगह से इस बात की बधाई ले रहे थे कि प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया को गौतम भाई आस्ट्रेलिया ले गए। वहां बंदरबाह बनाने में जुटे हैं। जबकि एनएसई ने अडानी पोर्ट्स एंड इकानामिक जोन पर जुर्माना ठोंक दिया। साढ़े चार लाख रुपए यूं तो बहुत छोटी रकम है। लेकिन सजा तो सजा है। गौतम, बेगम कैसे हों? क्योंकि मोदी है तब भी ऐसा होना मुमकिन है।
बड़ा हुआ, तो क्यों न हुआ
हरदणहल्ली डोडेगौड़ा देवेगौड़ा ने, अरे भई पूर्व प्रधानमंत्री तथा जनता दल एस के अध्यक्ष, यदि सिद्धरामैया को पार्टी से नहीं निकाला होता तो बेटे कुमारस्वामी की मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी न करा पाते। इसलिए बाप-बेटे की उनसे कम पटती है। कुमारस्वामी ने मल्लिकार्जुन खरगे की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए कहा कि उनको बहुत पहले कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए थे। कुमार सोच रहे थे कि लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता खरगे को उकसा रहे हैं। निशाने पर तो सिद्धरामैया थे। चुटकी का हिसाब बराबर करने में सिद्धरामैया देर नहीं लगाते। उन्होंने कहा-कांग्रेस ने क्या किया क्या नहीं? इससे पहले यह तो सोचो कि रेवण्णा को कब का मुख्यमंत्री बन जाना था? रेवण्णा कुमार के अग्रज हैं। बड़े होते हुए थी बेचारे कुमारस्वामी मंत्रिमंडल में मंत्री बनकर चुप हैं। (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 

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