संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 मई : चुनाव आयोग की प्रशंसा करके प्रणब साबित कर रहे हैं कि वे भारतरत्न...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 मई : चुनाव आयोग की प्रशंसा करके प्रणब साबित कर रहे हैं कि वे भारतरत्न...
Date : 21-May-2019

पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं, और वे कभी आरएसएस मुख्यालय पहुंचकर सुर्खियां बन जाते हैं, तो कभी कोई और बयान देकर। मोदी सरकार ने जब इंदिरा के समय से कांग्रेस के एक स्तंभ रहे प्रणब को भारतरत्न दिया, तो लोग चौंके भी थे और मोदी की अचानक प्रणब मुखर्जी से निकटता खबरों में आई थी। अब दो दिन पहले कांगे्रस के कुछ नेता प्रणब से मिलने पहुंचे, तो वे फिर सुर्खियों में आए कि ममता बैनर्जी सहित कई गैरएनडीए, गैरयूपीए नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं, और क्या कांग्रेस उनसे सहयोग मांगने गई है? लेकिन कल उन्होंने दिल्ली के एक सार्वजनिक समारोह में चुनाव आयोग की खुलकर तारीफ की और लोकसभा का अभी चल रहा चुनाव कामयाबी से शानदार तरीके से करवाने की चर्चा की।

प्रणब मुखर्जी का यह बयान आज के वक्त खासा हैरान करता है। वे अब उम्र और ओहदे के उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां से आगे वे कहीं नहीं जा सकते। वे राष्ट्रपति रह चुके हैं, और भारतरत्न बन चुके हैं। इसके बाद भारत के संविधान में और लोकतांत्रिक परंपराओं में उनके लिए कुछ नहीं बचा है। यह जरूर हो सकता है कि देश की बहुत सी पार्टियां मिलकर उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश करें, और वे परंपराओं को तोड़कर इसे मंजूर कर लें। लेकिन ऐसे कोई आसार दिखते नहीं हैं, और एनडीए को उनकी कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में एनडीए विरोधी पार्टियों को चुनाव आयोग से जितनी बड़ी शिकायत रही है उसे देखते हुए प्रणब की यह तारीफ बहुत ही अटपटी और बेमौके की है।

आज चुनाव आयोग की विश्वसनीयता एकदम ही नीचे गिरी हुई है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने उसे जैसी फटकार लगाई है, वैसा कोई पुराना मामला याद नहीं पड़ता है। चुनाव आयोग इस चुनाव में अपने भारी पक्षपाती नजरिए के लिए अच्छी तरह दर्ज हो चुका है, और आयोग के ही एक आयुक्त ने उनकी असहमति दर्ज न करने को लेकर बैठकों में जाना बंद कर दिया है। इस बीच प्रणब का यह कहना कि कार्यपालिका तीनों आयुक्त नियुक्त करती है और वे अपना काम अच्छे से कर रहे हैं, आप उनकी आलोचना नहीं कर सकते, यह चुनाव आयोग का सही रवैया है। प्रणब मुखर्जी का यह प्रमाणपत्र बहुत ही बेमौके पर आया है, और साख खो चुकी संस्था की ऐसी स्तुति करने की उनकी क्या मजबूरी है, यह समझ से परे है। आज जब चुनाव आयोग के खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हुए हैं, जब आयोग मतभेद से बंट चुका है, तब ऐसी तारीफ बहुत ही अजीब है, और एक भूतपूर्व राष्ट्रपति की हैसियत से प्रणब मुखर्जी को साख खोए हुए आयोग की ऐसी हिमायत करनी नहीं चाहिए थी। भूतपूर्व राष्ट्रपति की हैसियत से न तो उन्हें चुनाव आयोग की आलोचना करनी थी, और न ही तारीफ। फिर भी अगर उनका मन बेचैन था, तो आयोग पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां देखते हुए उन्हें आयोग की आलोचना ही करनी थी जो कि जायज मानी जातीं। उनका बर्ताव बिल्कुल भी समय से परे है, हो सकता है उम्र उन पर हावी हो गई हो, या उम्र के इस पड़ाव पर आकर वे धार्मिक रूझान में उलझ गए हों, और उन्हें लग रहा हो कि मंदिर वहीं बनाएंगे। यह भी लगता है कि वे अपात्र होते हुए भी जिस तरह भारतरत्न बनाए गए, क्या वे उस उपकार का बदला चुकाने के लिए मोदी सरकार के हिमायती दिख रहे चुनाव आयोग की तारीफ को अपनी नैतिक जिम्मेदारी मान रहे हैं? यह याद रखने की जरूरत है कि मोदी सरकार यूपीए सरकारों पर जितने तरह के आरोप लगाकर 2014 में सत्ता में आई थी, उनमें से अधिकतर ऐसे फैसले थे जिनमें प्रणब मुखर्जी भागीदार थे। और ऐसे में उन्हें भारतरत्न बनाना अपने-आपमें गलत था। आज जब वे इस तरह के चुनाव आयोग को चरित्र प्रमाणपत्र दे रहे हैं, तो वे एक बार फिर साबित कर रहे हैं कि वे भारतरत्न के लायक नहीं थे।
-सुनील कुमार

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