विचार / लेख

किस ऑपरेटिंग सिस्टम से चलेगा देश?
किस ऑपरेटिंग सिस्टम से चलेगा देश?
Date : 22-May-2019

सुदीप ठाकुर

देश को अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के रूप में ही दो ऐसे प्रधानमंत्री मिले, जिनका किसी भी रूप में कांग्रेस से कभी कोई नाता नहीं रहा। इसमें भी फर्क है। वाजपेयी को सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा था, जिससे भाजपा ने अपने तीन प्रमुख मुद्दों को हमेशा किनारे रखा, अयोध्या में मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का खात्मा।
राहुल गांधी ने 23 अगस्त, 2013 को सोशल मीडिया से संबंधित एक वर्कशॉप में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘यदि यह देश एक कंप्यूटर है, तो कांग्रेस पार्टी उसका डिफॉल्ट प्रोग्राम है...।’ उस समय वह कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे और उनकी पार्टी को अगले कुछ महीने बाद ही सबसे मुश्किल चुनाव का सामना करना था। 
यह कितना मुश्किल था इसकी थाह कांग्रेस की उस वर्कशॉप से कुछ महीने पहले आठ जून को मिली। उस दिन गोवा में हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 के आम चुनाव के लिए पार्टी की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित किया। इस घोषणा के कुछ देर बाद मोदी ने ट्वीट किया, ‘वरिष्ठ नेताओं ने मुझमें विश्वास जताया है। हम कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। आपके समर्थन और आशीर्वाद के लिए धन्यवाद।’  
यह जो कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण का नारा था, दरअसल यह देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के लिए कितनी बड़ी चुनौती था, इसका अंदाजा उस पार्टी के साथ ही शायद बहुत कम लोगों को था। अंदाजा नहीं था कि यह सिर्फ एक नारा है, बल्कि उस डिफॉल्ट प्रोग्राम को सीधे चुनौती है, जिसकी बात राहुल गांधी ने की थी। 2014 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को मिली 44 सीटें सिर्फ एक आंकड़ा नहीं था, यह सात दशक की देश की उस संसदीय प्रोग्रामिंग को चुनौती थी जिसके इर्द गिर्द देश चलता रहा। 
देश के 72 वर्ष के संसदीय जीवन में बीस से भी कम वर्षों तक कमान गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के हाथों में रही। हालांकि यह भी सच है कि देश के अब तक हुए 14 प्रधानमंत्रियों में से आठ गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए उनमें से छह का नाता अतीत में कांग्रेस से रहा। मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, एच डी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही कांग्रेस से की थी। 
देसाई को तो नेहरू के उत्तराधिकारी की तरह देखा जाता था। देसाई को नेहरू या लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद प्रधानमंत्री बना दिया जाता तो वह कांग्रेस नहीं छोड़ते। चौधरी चरण सिंह नेहरू युग में कांग्रेस के प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रपों में गिने जाते थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह तो 1989 का चुनाव लडऩे से कुछ समय पहले ही कांग्रेस छोडक़र निकले थे। चंद्रशेखर की युवा तुर्क की पहचान ही कांग्रेस में रहते बनी थी। देवगौड़ा तो कांग्रेस के विभाजन के बाद संगठन कांग्रेस में चले गए थे और जनता पार्टी के गठन के बाद ही उनका कांग्रेस से नाता टूटा था। इंद्र कुमार गुजराल इंदिरा गांधी की कैबिनेट के महत्वपूर्ण मंत्री थे।
चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा और गुजराल की सरकारें कांग्रेस के बाहरी समर्थन से ही चल रही थीं। 
यानी देश को अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के रूप में ही दो ऐसे प्रधानमंत्री मिले, जिनका किसी भी रूप में कांग्रेस से कभी कोई नाता नहीं रहा। इसमें भी फर्क है। वाजपेयी को सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा था, जिससे भाजपा ने अपने तीन प्रमुख मुद्दों को हमेशा किनारे रखा, अयोध्या में मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का खात्मा।
मोदी और अमित शाह ने कांग्रेस मुक्त भारत के केंद्रीय नारे के साथ जिस सत्तर साल के शासन को निशाना बनाया उसके गूढ़ अर्थ हैं।दरअसल वाजपेयी और मोदी को छोडक़र जो भी गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने थे, उनका कांग्रेस के साथ कोई बहुत बड़ा वैचारिक मतभेद नहीं था। बल्कि उनकी वैचारिक बुनावट कांग्रेस से ही बनी थी। उनकी सरकारों का संचालन इसी डिफॉल्ट सिस्टम से होता रहा। 
दरअसल 2014 में 282 सीटें जीतकर भाजपा और खासतौर से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को पहली बार एहसास हुआ कि वह कांग्रेस के प्रभाव से मुक्त सरकार बना सकते हैं। 16 मई, 2014 के बाद ऐसे मौके अक्सर आते रहे हैं, जब इस एहसास की तस्दीक होती रही। 
कंप्यूटर की भाषा में जिसे डिफॉल्ट प्रोग्राम कहा जाता है, उसका आशय ऑपरेटिंग सिस्टम से है, जो कि कंप्यूटर के हॉर्ड वेयर और सॉफ्ट वेयर दोनों को प्रबंधित करता है। वास्तव में हमारे देश का ऑपरेटिंग सिस्टम हमारा संविधान है, जिससे इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी ने छेड़छाड़ की कोशिश की थी। कांग्रेस की आज यह जो स्थिति हो गई है उसकी वजह यह भी है कि उसने अपने धत करमों को भी इसी ऑपरेटिंग सिस्टम से जोड़ लिया था।  तो लालकृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री न बन पाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि उनका नाम अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़ा है। यह घटना देश के इस डिफॉल्ट सिस्टम के अनिवार्य हिस्से धर्म निरपेक्षता पर सीधी चोट थी। 
स्थिति यहां तक आ गई है कि धर्म निरपेक्ष शब्द तक असंसदीय लगने लगा है। अभी रमजान का महीना चल रहा है, जरा याद कीजिए कि आपने राजनीतिक दलों द्वारा दी जाने वाली इफ्तार की दावत की तस्वीर पिछली बार कब देखी थी? माफ कीजिएगा एग्जिट पोल के जश्न में डूबे देश में यह सवाल खलल डाल सकता है। 
आम चुनाव के नतीजे आने में कुछ घंटे ही रह गए हैं। यह चुनाव बहुत कुछ तय करने वाला है। इससे पता चलेगा कि आठ जून, 2013 को इस देश का ऑपरेटिंग सिस्टम बदलने का जो अभियान शुरू किया गया था, वह अब कहां तक पहुंच चुका है। 
इसकी सबसे बड़ी परीक्षा अबसे तीन वर्ष बाद होगी, जब 2022 में 14-15 अगस्त की मध्य रात्रि को देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष पूरे होंगे। उस मध्य रात्रि को दिए जाने वाले भाषण से पता चलेगा कि यह देश 14-15 अगस्त मध्य रात्रि, 1947 से कितनी दूर चला गया है, जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने नियति से साक्षात्कार किया था! 
(लेखक अमर उजाला नई दिल्ली  के स्थानीय संपादक हैं।)

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