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नतीजे मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को झटका दे सकते हैं?
नतीजे मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को झटका दे सकते हैं?
Date : 22-May-2019

नीलेश द्विवेदी, हेमंत कुमार पाण्डेय और पुलकित भारद्वाज
 
अभी बीते अप्रैल के महीने में जब चुनाव प्रचार जोरों पर था तो मध्य प्रदेश के भोपाल में एक दिलचस्प वाकया हुआ। भोपाल संसदीय सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी दिग्विजय सिंह उस रोज एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। अपने भाषण के दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की वादाखि़लाफ़ी का मसला उठाया। उन्होंने कहा, ‘भाजपा ने 2014 के चुनाव से पहले वादा किया था कि उसकी सरकार बनी तो वह विदेश में मौजूद देश का काला धन वापस लाएगी। इससे देश के हर नागरिक के बैंक खाते में 15 लाख रुपए आएंगे।’ फिर उन्होंने सामने बैठे लोगों से सीधा सवाल किया, ‘किसी के खाते में 15 लाख रुपए आए क्या? आए हों तो हाथ खड़ा करे।’

इसके बाद जो हुआ उसकी किसी को शायद उम्मीद नहीं रही होगी। दिग्विजय सिंह के सवाल के जवाब में सामने बैठे युवक ने हाथ उठाया तो उसे मंच पर बुला लिया गया। दिग्विजय ने उससे कहा, ‘यहां आओ, अपना बैंक ख़ाता लाओ। हम तुम्हारा नागरिक अभिनंदन करेंगे कि तुम्हारे ख़ाते में 15 लाख रुपए आए हैं।’ इस पर उस युवक ने मंच पर ही माइक अपनी तरफ करके जवाब दिया, ‘मोदी जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की। आतंकियों को मारा। अपने 15 लाख तो पट गए।’ इतना सुनते ही मंच पर बैठे एक अन्य नेता ने लगभग धकियाते हुए उस युवक को नीचे उतार दिया। वहीं दिग्विजय सवाल करते रह गए, ‘तुम्हें 15 लाख मिले या नहीं? रोजगार मिला या नहीं।’
राजधानी के वरिष्ठ पत्रकार शिवअनुराग पटैरया इस वाकय़े को याद करते हुए इसे आम चुनाव के लिए आए एक्जिट पोलों से जोड़ते हैं। इनमें मध्य प्रदेश की 23 से 27 सीटें भाजपा के खाते में जाने की बात है। सभी एक्जिट पोलों के औसत के हिसाब से भी देखें तो 25 सीटें भाजपा को मिल रही हैं। मिलेंगी कितनी यह तो 23 मई को ही पता चलेगा, लेकिन पटैरया को इन अनुमानों पर अचरज नहीं है। वे कहते हैं, ‘इस चुनाव की जो सबसे खास बात रही वह ये कि इसमें पहली, दूसरी और तीसरी बार के युवा मतदाताओं ने बढ़-चढक़र हिस्सा लिया है। और उन्हें मतदान केंद्र तक लाने में जिस कारक ने सबसे अहम भूमिका निभाई वह है- सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक।’
पटैरया आगे जोड़ते हैं, ‘मैं चुनाव कवरेज के दौरान बड़ी तादाद में युवाओं से मिला। उनसे बात की। इस दौरान उनमें इस बात को लेकर लगभग एकराय दिखी कि पाकिस्तान में घुसकर सैन्य कार्रवाई या लड़ाकू विमानों से बमबारी करने का फैसला सिर्फ नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री ही ले सकता है। इसलिए उनके हाथ मजबूत करने के लिए वोट देना है। फिर भले स्थानीय प्रत्याशी कोई, कैसा भी हो। इन मतदाताओं के लिए दूसरे तमाम मुद्दे पीछे रह गए लगते हैं। उन्हें इससे भी ज़्यादा फर्क नहीं कि सर्जिकल स्ट्राइक या एयर स्ट्राइक में कितने आतंकी मारे गए। उनके लिए मायने ये रखता है कि भारत ने पाकिस्तान में घुसकर उसे सबक सिखाया है। 
नतीजों के लिए यही निर्णायक हो सकता है।’
एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार अनुराग उपाध्याय भी कुछ यही बात कहते हैं। वे बताते हैं, ‘मध्य प्रदेश में सभी सीटों पर लगभग 10 फीसदी तक मतदान बढ़ा है। यही अपने आप में प्रमाण है कि मतदाताओं ने इस बार निर्णायक मत दिया है। तिस पर युवाओं में सर्जिकल स्ट्राइक जैसे साहसिक फैसलों की वजह से नरेंद्र मोदी के समर्थन में जो उत्साह दिखा है उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसे देखते हुए मुझे तो तब भी ज़्यादा अचरज नहीं होगा अगर भाजपा मध्य प्रदेश में 27 से एकाध ज़्यादा सीट भी जीत जाए।’ हालांकि उनके मुताबिक यह तथ्य भी नकारा नहीं जा सकता कि एक्जिट पोल के अनुमान पूर्व में कई मर्तबा गलत भी साबित हुए हैं।
अधिकतर एग्जिट पोलों में राजस्थान में कांग्रेस को 25 में से सिर्फ तीन सीटें मिलने की बात कही गई है। एक एग्जिट पोल तो कांग्रेस का खाता तक खुलने की भी भविष्यवाणी कर रहा है। लेकिन प्रदेश की राजनीति से जुड़े कई जानकार इन आंकड़ों से असहमत दिखते हैं। उनके मुताबिक यह तो ठीक है कि कांग्रेस उतना बेहतर प्रदर्शन न कर सके जिसकी उम्मीद किसी सत्ताधारी पार्टी से की जाती है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि वह दो या तीन सीटों पर सिमट जाएगी।
वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी इस बारे में कहते हैं, ‘यह कोई बड़ा नियोजित षडयंत्र जान पड़ता है। चार महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 200 में से 100 सीटें मिली थीं। उस हिसाब से भी देखें तो लोकसभा चुनाव में 13 सीटें कांग्रेस के पाले में जानी चाहिए।’ वे आगे कहते हैं, ‘जिन मुद्दों को लेकर जनता ने चार महीने पहले कांग्रेस को चुना था, वो तो आज भी जस के तस हैं। तो कोई जादू थोड़े ही हुआ है जो लोगों ने अपना रूख बदल लिया।’
हालांकि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह विधानसभा चुनाव से पहले और सरकार बनने के बाद भी कांग्रेस में आपसी सिर फुटव्वल देखने को मिली है, उसके अनुसार तो कांग्रेस का प्रदर्शन तुलनात्मक तौर पर गिरना स्वभाविक है। लेकिन इस बात से वे भी इन्कार नहीं करते कि पांच सीटों- टोंक- सवाई माधोपुर, करौली-धौलपुर, सीकर, जोधपुर और नागौर पर कांग्रेस बेहतर स्थिति में है, वहीं अन्य छह- दौसा, गंगानगर, अलवर, भरतपुर, जैसलमेर-बाड़मेर और जयपुर ग्रामीण में पार्टी कड़ी टक्कर देती दिख रही है। प्रदेश में टिकट से लेकर वोट देने तक में निर्णायक साबित होने वाले जातिगत समीकरण उनकी इस बात के पक्ष में दिखते हैं।
वहीं कुछ और जानकार कहते हैं कि यदि कांग्रेस में अंदरूनी रस्साकशी है तो पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से तनातनी की खबरें भी किसी से छिपी नहीं है। सूत्रों के मुताबिक जिस तरह लोकसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया से राजे को दरकिनार किया गया है, उससे उनके समर्थकों में गहरी नाराजगी है। इन सूत्रों का यह भी दावा है कि अंदरखाने कई प्रमुख सीटों पर इन समर्थकों ने पार्टी शीर्ष नेतृत्व के चहेते प्रत्याशियों को हराने में कसर नहीं छोड़ी है।
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार संदीप पुरोहित राजस्थान से जुड़े एग्जिट पोल पर संदेह जताते हुए कहते हैं, ‘यह (एग्जिट पोल) भी एक तरह का बड़ा व्यवसाय है, जिसे अलग-अलग उद्देश्यों के साथ संचालित किया जाता है। इसलिए एग्जिट पोल पर भरोसा करने की बजाय नतीजों का इंतजार करना चाहिए।’
लेकिन प्रदेश में जानकारों का एक तबका ऐसा भी है जो इन पोलों से ‘शर्तिया’ सहमति जताता है। इसके मुताबिक अगर राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी इतना जबरदस्त प्रदर्शन कर पाई तो इसका मतलब होगा कि वह राजशाही इतिहास वाले राजस्थान में पुलवामा हमले को भुना पाने में पूरी तरह सफल रही है। एक अन्य वरिष्ठ राजनीतिकार इस बारे में कहते हैं, ‘एग्जिट पोल्स पर यकीन करने के लिए सिर्फ एक राजनीतिक नारा आधार के तौर पर याद आता है जो विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में ख़ूब कहा-सुना गया था। वो था- मोदी तुमसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं!’
बीते साल 11 दिसंबर को राजस्थान और मध्य प्रदेश की तुलना में छत्तीसगढ़ के जनादेश ने कांग्रेस नेतृत्व के चेहरे पर सबसे पहले मुस्कान बिखेरी थी। विधानसभा चुनाव 2018 के नतीजों ने अधिकांश पूर्वानुमानों को गलत साबित किया था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस ने 15 वर्षों से सत्ता पर काबिज भाजपा को करारी मात दी थी जो 90 में से 68 सीटें जीती थी। भाजपा केवल 15 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद माना गया कि लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस बड़ी जीत दर्ज करेगी।
हालांकि, रविवार को जारी एग्जिट पोल्स के नतीजों में ऐसा नहीं दिखता। इनके मुताबिक भाजपा को राज्य की सात और कांग्रेस को चार लोकसभा सीटें मिलती दिख रही हैं। साल 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने 11 में से 10 सीटों पर कब्जा किया था। विधानसभा चुनाव-2018 के नतीजों को देखते हुए माना जा रहा था कि कांग्रेस इस आंकड़े को अपने पक्ष में उलट सकती है। लेकिन, एग्जिट पोल्स की मानें तो पार्टी को उम्मीद के उलट बड़ा झटका लग सकता है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि विधानसभा की तरह ही लोकसभा चुनाव के नतीजे भी एग्जिट पोल्स को गलत साबित करेंगे। क्या वास्तव में ऐसा होगा? जानकारों के मुताबिक इसका जवाब इतना आसान नहीं है। इसकी कई वजहें हैं। इन्हें एक-एक कर देखते हैं।
कइयों के मुताबिक पहली वजह तो एग्जिट पोल की प्रणाली है। इसके तहत मतदान के बाद संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के वोटरों से कई सवाल पूछे जाते हैं और उनके जवाब से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि उन्होंने अपना वोट किस पार्टी को दिया। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की बात करें तो यहां की अधिकांश आबादी गांवों में बसती है। इनमें भी अधिकांश आदिवासी और दलित होते हैं, जो राजनीतिक प्रतिक्रिया देने को लेकर अधिक सहज नहीं होते। वहीं, अधिकांश मामलों में दूरदराज के इलाकों में सर्वेकर्ता पहुंच भी नहीं पाते। माना जाता है कि इसके चलते सर्वे में अलग-अलग तबकों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता।
इस तरह के सर्वे में हिस्सा लेने वाले एक कर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर सत्याग्रह को बताया, ‘इस तरह के सर्वे के लिए अधिकतर सैंपल शहरी इलाकों से ही लिए जाते हैं। यदि किसी गांव या दूरदराज के इलाके में जाने की बात हो तो इससे बचा जाता है और फॉर्म में सवालों के जवाब खुद ही भर दिए जाते हैं।’ इस कर्मी की बातों से साफ होता है कि कोई चुनावी नतीजा यदि एग्जिट पोल से मेल खाता है तो इसे एक संयोग भी माना जा सकता है।
उधर, सत्ताधारी कांग्रेस को विश्वास है कि विधानसभा चुनाव में किए गए अधिकांश वादे उसने निभाए हैं। उसका मानना है कि केवल छह महीनों में ही जनता उससे अपना मुंह नहीं फेर सकती। पार्टी नेतृत्व का यह विश्वास कितना मजबूत है यह इससे भी पता चलता है कि कांग्रेस अध्यक्ष विधानसभा चुनाव के उलट इस बार राज्य में न के बराबर सक्रिय रहे हैं।
वहीं, अगर भाजपा की बात की जाए तो अन्य राज्यों की तरह ही छत्तीसगढ़ में भी पार्टी के उम्मीदवारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगे हैं। भाजपा ने राज्य के अपने सभी 10 सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया है। इस कदम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि मौजूदा सांसदों से जनता की नाराजगी की वजह से पार्टी को नुकसान न उठाना पड़े। चुनावी प्रचार अभियान के दौरान बालाकोट एयर स्ट्राइक सहित अन्य मुद्दों के जरिए मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश की गई। वहीं, उज्ज्वला योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना सहित अन्य केंद्रीय योजनाओं को बतौर मोदी सरकार की उपलब्धि पेश किया गया।
पार्टी को विश्वास है कि इस तरह के चुनावी अभियान और नरेंद्र मोदी को धुरी बनाकर वह छत्तीसगढ़ में पहले की तरह चुनावी सफलता हासिल करने में कामयाब रहेगी। इससे पहले अब तक हुए आम चुनावों (2004, 2009 और 2014) में पार्टी ने 11 में से 10 सीटों पर कब्जा किया है। अब लोकसभा चुनाव 2019 के एग्जिट पोल्स को नतीजे भी भाजपा की उम्मीद को बल देते हुए दिख रहे हैं। हालांकि, जनता की मुहर किसकी उम्मीद पर लगेगी यह 23 मई को चुनावी नतीजे ही तय करेंगे।

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