संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 मई : तो ही भारत का लोकतंत्र पटरी पर लौटेगा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 मई : तो ही भारत का लोकतंत्र पटरी पर लौटेगा
Date : 22-May-2019

कल दोपहर इसी वक्त तक हिन्दुस्तानी आम चुनाव के नतीजे आने शुरू हो जाएंगे, गिनती पूरी नहीं होगी, लेकिन अधिकतर सीटों पर पहला रूख जरूर दिखने लगेगा जिससे एक्जिट पोल की इज्जत भी तय होगी कि वे सही अंदाज लगा पाए हैं, या किसी वजह से उनका अंदाज गलत निकला, या सोच-समझकर एक गलत अंदाज सामने रखा गया था। दरअसल भारत की राजनीति साजिशों से इतनी भरी है कि एक जैसे दिखने वाले तमाम एक्जिट पोल को लेकर भी लोगों के मन में तरह-तरह के शक हैं कि क्या ये किसी एक पार्टी के पक्ष में रूझान दिखाने के लिए पूर्वाग्रह से भरे हुए हैं, या फिर कोई और बात है। कुछ अधिक सोचने वाले लोगों की कल्पना सट्टाबाजार और शेयर बाजार तक जाती है जो कि राजनीति से किसी भी मायने में साजिश के लिए कम ताकत नहीं रखते हैं। जिस तरह एक्जिट पोल के अगले दिन शेयर बाजार हजार पाइंट ऊपर चढ़ गया, और खरबों का नफा-नुकसान हो गया, उसे देखते हुए इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि शेयर बाजार चलाने वाले लोग ऐसी हसरत रखते हों कि एक्जिट पोल को प्रभावित करें। जो भी हो, अगले एक दिन में यह साफ हो जाएगा कि एक्जिट पोल जीता या हारा। 

पिछले किसी भी चुनाव में केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन का विपक्ष से इतना अधिक चुनावी-तनाव नहीं हुआ था जितना कि इस बार हुआ है। नतीजे चाहे जो हों, अगली संसद तो पक्ष और विपक्ष दोनों वाली रहेगी, और अगले पूरे पांच बरस देश के जरूरी मुद्दों पर या तो इसमें चर्चा हो सकेगी, या पिछले पांच बरस की तरह तनातनी जारी रहेगी, या और आगे बढ़ेगी। चुनाव के दौरान हवा में जितना जहर घुला है, उतना जहर भोपाल गैस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से वहां की हवा में भी नहीं घुला था। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कारखाने के स्टॉक में बचा हुआ जहरीला मिक नाम का रसायन खत्म करने के लिए और भी लंबे समय तक कार्रवाई करनी पड़ी थी। आज हिन्दुस्तान में नेताओं और पार्टियों के मन में एक-दूसरे के लिए ऐसा बहुत सा जहर बाकी है, और इसे खत्म करना आसान नहीं रहेगा। 

आज केन्द्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों और गठबंधनों की सरकारें हैं। इस आम चुनाव के पहले से केन्द्र और राज्यों के बीच एक तनातनी चली आ रही है जिसकी सबसे बड़ी मिसाल केन्द्र की मोदी, और बंगाल की ममता सरकार के बीच देखने मिली है। चूंकि संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ नहीं हो रहे हैं, और जो पार्टी या गठबंधन केन्द्र पर राज करेंगे, उनसे ठीक खिलाफ कई पार्टियां राज्यों में अलग-अलग वक्त के लिए जारी रहेंगी। इस चुनाव के बाद यह भी एक बड़ी चुनौती रहेगी कि भारत के संघीय ढांचे को ऐसी तनातनी के बीच कैसे बनाए रखा जाए, कैसे उसे असरदार रखा जाए, और कैसे दो राजधानियों की पार्टियां देश के हित में, देश के विकास के लिए ठीक से काम कर सकें। आज देश के बहुत से नेताओं के बीच बातचीत का रिश्ता भी नहीं बचा है। जितनी गालियां एक-दूसरे को इस चुनाव के दौरान दी गई हैं, वे कम नहीं हैं। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के हाथ में बहुत सी ऐसी टैक्स और जांच एजेंसियां हैं जिनका इस्तेमाल विपक्ष के नेताओं के खिलाफ हो सकता है, या कि होते रहने के आरोप लगते ही रहे हैं। 

आज हिन्दुस्तानी राजनीति में दरियादिली की उम्मीद करना बेकार है कि देश की संसदीय परंपराओं को बेहतर बनाने के लिए लोग काम करेंगे। ऐसी निराशा के बीच ही कुछ तबकों को तो यह कोशिश करनी ही चाहिए कि देश का संसदीय ढांचा, देश का संघीय ढांचा, और इस देश में केन्द्र-राज्य के परस्पर संबंध इतनी अधिक कड़वाहट से न भरे रहें कि तमाम राजनीति महज अविश्वास पर चलती रहे। हवा में धर्म को लेकर, जाति को लेकर, लोगों की देशभक्ति को लेकर जितने किस्म की हिंसक और गंदी बातें चुनाव के इन महीनों में घुल चुकी हैं, उनको भी दूर करने की जरूरत है, और अगले पांच बरस पूरे होने तक रहेगी। जो कोई भी इस देश की सत्ता चलाए, उसे चुनावी जहर से ऊपर उबरना चाहिए, और सत्ता पर ही बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वह विपक्ष को विश्वास में लेकर चले। जो भी गठबंधन सत्ता में आए उसके सामने ऐसी ढेरों मिसालें मौजूद हैं कि किसी सरकार को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। ऐसी मिसालों को सोचते-समझते हुए अगली सरकार काम करे, तो ही भारत का लोकतंत्र पटरी पर लौटेगा।
-सुनील कुमार

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