संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का विशेष संपादकीय, 23 मई :  मोदी का जादू बरकरार रहा, एनडीए की मजबूत वापिसी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का विशेष संपादकीय, 23 मई : मोदी का जादू बरकरार रहा, एनडीए की मजबूत वापिसी
Date : 23-May-2019

सुनील कुमार
जैसा कि चार दिन पहले के एक्जिट पोल ने बताया था, हिन्दुस्तानी वोटरों पर मोदी का जादू बरकरार है, और भाजपा की चुनाव जीतने की मशीन ने जो महारथ हासिल कर ली है, उसने एक बार फिर अपनी खूबी को साबित किया है। आज सुबह तक यह लग नहीं रहा था कि गिनती शुरू होने के तीन घंटों के भीतर देश में अगली मोदी सरकार की बुनियाद इतनी मजबूत हो जाएगी। अभी समंदर की लहरों के हर थपेड़े के साथ गिनती के आंकड़े किनारे लगते जा रहे हैं, और अब तक गिनती के रूझान से एनडीए की सरकार बन चुकी है, और बीजेपी अपने बहुमत की ओर बढ़ रही है। कांग्रेस और यूपीए के लिए एक मामूली तसल्ली की बात यह हो सकती थी कि उसने अपनी सीटें करीब-करीब दोगुनी कर ली हैं, लेकिन सुबह 11 बजे जब यह लिखा जा रहा है, उस वक्त कांग्रेस और यूपीए के नेता राहुल गांधी अपनी पारिवारिक सीट अमेठी पर स्मृति ईरानी से पीछे चल रहे हैं। अगर यह रूख जारी रहता है तो कांग्रेस के पास पिछले चुनाव के मुकाबले हाथ छाप और यूपीए की सीटों की बढ़ोत्तरी गिनाने के लिए भी साहस नहीं रहेगा। देश के रूख और रूझान की एक झलक देखनी हो तो हांडी का वह चावल भोपाल है जहां पर हिंदुत्व का सबसे आक्रामक गोडसेपूजक चेहरा चुनाव जीत रहा है, और दिग्विजय सिंह निपट चुके हैं। 

आज के चुनावी नतीजों को संपादकीय के इन दो कॉलमों में समेटना मुमकिन नहीं हैं, लेकिन फिर भी कुछ कतरा-कतरा बातों को छुएं, तो यह बात जाहिर है कि देश की जनता की नब्ज पर हाथ धरने से लेकर जनता की धडक़न को अपने मुताबिक ढालने तक का जो काम नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने किया है, वह पूरी तरह अभूतपूर्व और ऐतिहासिक है। मोदी सरकार की पांच बरस की तमाम नाकामयाबी पर चुनाव अभियान का ऐसा सर्जिकल स्ट्राईक डिजाइन किया गया कि विपक्ष के हाथ से तमाम नारे छिन गए। हमने पिछले महीनों में लगातार यहां पर यह बात लिखी कि किसी लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए जितने किस्म के कानूनी औजार गढ़े और इस्तेमाल किए जा सकते हैं, उन सबमें मोदी-शाह की जोड़ी ने रिकॉर्ड कायम किया है। इनसे परे भी कई किस्म के औजार न सिर्फ इन दोनों ने बल्कि बहुत सी पार्टियों और बहुत सी नेताओं ने इस्तेमाल किए होंगे, लेकिन हम उनकी चर्चा नहीं कर रहे हैं। अब जिस दिन देश का आखिरी हिस्सा वोट डाल रहा था, उस दिन 24 घंटे अगर लगातार मोदी की केदारनाथ यात्रा टीवी पर छाई हुई थी, तो उसमें न कुछ गैरकानूनी था, न अनैतिक, और न अलोकतांत्रिक। बीजेपी ने इस तरकीब को सोचा और इसका इस्तेमाल कर लिया। और यह पहला मौका नहीं था। पिछले बरस 12 मई को जब कर्नाटक वोट डाल रहा था, और चुनाव प्रचार दो दिन पहले बंद हो चुका था, तो नरेन्द्र मोदी दिन भर नेपाल के मंदिरों में घूमते रहे, और हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों पर वही चलते रहा। इस बार वे केदारनाथ की गुफा से आंखें और मुंह खोले बिना खबर बनते रहे, और किसी ने उनके विरोधियों को ऐसी किसी तरकीब से रोका नहीं था। 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़े दमखम से मोदी के खिलाफ चुनावी हमला आखिरी दिन तक जारी रखा, लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए की मुखिया के रूप में कांग्रेस पार्टी ने एक के बाद एक, कई गलतियां कीं। अभी दो दिन पहले ही इसी जगह पर हमने लिखा था-  ‘‘पिछले आधे बरस को अगर देखें, तो जब देश की बहुत सी पार्टियां तरह-तरह के गठबंधन बना रही थीं, कांग्रेस ने जाने किस जोड़-घटाने के तहत एक के बाद दूसरा प्रदेश बिना गठबंधन अकेले लडऩा तय किया। उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा के साथ किसी तालमेल की कोशिश कम से कम मीडिया में नहीं आई, बंगाल में कांग्रेस न ममता के साथ रही, न वामपंथियों के साथ, केरल में कांग्रेस वामपंथियों के खिलाफ भी लड़ी, और उन्हें नाराज करने की हद तक लड़ी। ऐसा और भी कई प्रदेशों में हुआ जो कि दिल्ली में जाकर खत्म हुआ, और अरविंद केजरीवाल के साथ कोई तालमेल नहीं हुआ, न दिल्ली में, न पंजाब में। एक पार्टी की हैसियत से यह कांग्रेस का हक भी है और उसकी जिम्मेदारी भी है कि किसी प्रदेश में वह ऐसा अपमानजनक समझौता, गठबंधन, या तालमेल न करे जो कि उस प्रदेश में पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोडक़र रख दे और उस प्रदेश में पार्टी को जमीन से खत्म ही कर दे। यह बात तो ठीक है, लेकिन एक दूसरी बात यह भी है कि जब मामला संसद में एनडीए के खिलाफ यूपीए या किसी नए गठबंधन के आंकड़े खड़े करने का हो, तो कांग्रेस को क्षेत्रीय गठबंधन के बारे में अधिक सोचना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस अकेले चलने की नीति पर टिकी हुई, या अड़ी हुई दिखती रही। यूपीए के पिछले साथियों के साथ वह जरूर है, लेकिन बहुत से राज्यों में उसने जीत की संभावनाएं तभी खो दीं, जब उसने उन राज्यों में कोई तालमेल नहीं किया।’’ 

दूसरी तरफ एनडीए के भीतर मोदी एक सबसे बड़े भागीदार शिवसेना की खुली बगावत पूरे पांच बरस तक झेलते रहे, जब उद्धव ठाकरे खुद और उनका अखबार सामना मोदी की एक-एक रीति-नीति के खिलाफ बोलते और लिखते रहे। इसके बावजूद जैसे-जैसे चुनाव करीब आया, भाजपा ने अपने तमाम साथियों के साथ तालमेल फिर कायम कर लिया, और यह उसके काम भी आया। 

लेकिन आज अगर कुछ ताजा बात करें, तो यह बात साफ है कि पांच बरसों के बहुत से गलत फैसलों के नुकसान के बावजूद भाजपा ने एक शानदार वापिसी की है, और शिवसेना जैसे उसके स्थाई आलोचक भागीदार ने भी उसका लोहा मान लिया है। भाजपा ने सात अलग-अलग तारीखों पर हुए मतदान को देखते हुए उन सीटों के मतदाताओं की नब्ज समझते हुए ठीक उसके पहले जिस तरह के मुद्दे उठाए, वह बारीक रणनीति देखने लायक थी। दूसरी तरफ देश भर में एनडीए के खिलाफ अभियान चला रही कांग्रेस पार्टी में ऐसे बारीक फेरबदल की न तैयारी थी, और न ही मानो उसे कोई फिक्र थी। ऐसा लगता है कि यूपीए और कांग्रेस में जो लोग भी सत्ता में अपने आने की संभावना देखते थे, उनको जनता के बीच मोदी के खिलाफ एक लहर की या तो उम्मीद थी, या महज हसरत थी। ये दोनों ही बातें गलत साबित हुईं, और भारत पर सरहद पार से जो आतंकी हमला मोदी सरकार की साख चौपट करने वाला होना चाहिए था उसी हमले पर एक जवाबी कार्रवाई करके मोदी ने पूरे देश में अपने पक्ष में एक लहर पैदा कर दी। देश को पाकिस्तान का खतरा दिखाया, अपने हाथों में देश को महफूज बताया, और देश के वोटरों के बीच अगर किसी एक मुद्दे ने सबसे अधिक काम किया लगता है, तो वह सर्जिकल स्ट्राईक का मुद्दा है। और मजे की बात यह रही कि जिन लोगों ने इस सर्जिकल स्ट्राईक के संदिग्ध पहलुओं और दावों पर मामूली सवाल किए, उन्हें भी पाकिस्तानपरस्त और हिन्दुस्तान के गद्दार साबित करने का एक काम सोशल मीडिया पर बखूबी किया गया। पूरे देश में एक हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद इस तरह देश के स्वाभिमान के लिए जरूरी साबित किया गया, कि किसी भी और पार्टी के लिए उसके मुकाबले कोई जवाब नहीं बचा। यहां तक कि चुनाव में भाजपा के जिन तीन नेताओं ने गोडसेवादी बयान दिए, गांधी को गालियां दीं, जिन्हें भाजपा ने नोटिस भी जारी किए, वे लाखों वोट से जीतते दिख रहे हैं, इससे देश में हवा कैसी थी यह साबित होता है। दूसरी तरफ मोदी सरकार के पांच बरस के गलत फैसलों, देश की खराब आर्थिक हालत, बेरोजगारी, हवा में साम्प्रदायिक तनाव, अल्पसंख्यकों को खतरा जैसे तमाम मुद्दों को चुनावी मोर्चे से हटाने में मोदी-शाह कामयाब रहे, और उनके विरोधी दल इन मुद्दों को उठाने में नाकामयाब रहे। आज सुबह से जितने टीवी चैनलों पर कुछ समझदार विश्लेषकों की बातचीत आ रही है, उनमें सबसे बड़ी एक बात यह है कि कांग्रेस ने हर गरीब परिवार को 72 हजार रूपए सालाना देने की जिस न्याय योजना का वायदा किया था, वह इस पूरे चुनाव अभियान में कहीं खो गई, और खुद कांग्रेस को उसका फायदा उठाने की परवाह नहीं रह गई। 

आज यहां पर यह लिखते हुए भी खबर यह है कि अमेठी से राहुल गांधी लगातार भाजपा की स्मृति ईरानी से पीछे चल रहे हैं। हालांकि वे केरल की वायनाड सीट पर बहुत लंबी लीड से आगे हैं, लेकिन वहां की कोई भी लीड उनको अमेठी के नुकसान से उबार नहीं सकेगी। ऐसा नहीं है कि देश के बड़े नेता कभी चुनाव हारते नहीं हैं, लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद इस पहले आम चुनाव में अपने आपको बेहतर तरीके से स्थापित कर सकते थे अगर वे कांग्रेस और यूपीए की सीटों में इजाफा करने के साथ-साथ अमेठी में हार से बचे होते। खैर, अभी उम्र उनके साथ है, और अगले पांच बरस का संघर्ष सामने है। हो सकता है कि भाजपा की प्रचार की रणनीति, और उसके जनधारणा-प्रबंधन के लोकतांत्रिक हिस्सों में से राहुल कुछ सीख भी पाएं। 

नतीजे पूरे आने के बाद यह अधिक दूर तक समझ आएगा कि किस-किस मोर्चे पर हार और जीत की क्या वजहें रहीं, लेकिन फिलहाल तो इस शानदार और मजबूत जीत के लिए नरेन्द्र मोदी और अमित शाह अपने साथियों के साथ बधाई के हकदार हैं क्योंकि लोकतंत्र में मतदान के नतीजों से अधिक और कुछ साबित नहीं किया जा सकता। अगले पांच बरस के लिए एनडीए, भाजपा, और खासकर मोदी को जिस तरह का मजबूत जनादेश मिला है, वह मोदी के पिछले पांच बरसों को एक बड़ी चुनौती भी है। चुनाव अभियान से परे अगर इन पांच बरसों की गलतियों से उन्होंने कुछ सीखा हो, तो देश के अगले पांच बरस बेहतर हो सकते हैं।

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