संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 मई : दो चुनाव, और दो पार्टियां,  छत्तीसगढ़ को एक बड़े आत्ममंथन की जरूरत..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 मई : दो चुनाव, और दो पार्टियां, छत्तीसगढ़ को एक बड़े आत्ममंथन की जरूरत..
Date : 24-May-2019

लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर देश भर की तस्वीर पर कल इसी जगह हमने लिखा था, लेकिन उसमें छत्तीसगढ़ अकेले पर कुछ अधिक लिखने की गुंजाइश नहीं थी, लेकिन जरूरत तो थी ही। छत्तीसगढ़ में पिछले तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस महज एक सीट पा सकी थी, और दस सीटें भाजपा को मिलते आई थीं। इस बार कांग्रेस को इससे ठीक उल्टी उम्मीद थी क्योंकि कुछ महीने पहले के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस दस लोकसभा क्षेत्रों में नंबर वन थी, और कुल एक लोकसभा सीट  के विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा कांग्रेस से आगे थी। प्रदेश में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में जमकर मेहनत की थी, एक बहुत लुभावना चुनाव घोषणा पत्र बनाया था, कर्जमाफी, अधिक समर्थन मूल्य, और धान बोनस की घोषणा की थी, और भाजपा से करीब दस फीसदी वोट अधिक पाकर 90 में से 68 सीटें पाई थीं। राज्य में सरकार बनने के तुरंत बाद इन तीनों वायदों को सरकार ने तकरीबन पूरा भी किया था, और इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तकरीबन हर दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर किसी न किसी तरह का राजनीतिक और चुनावी हमला भी किया था। वे देश के कांग्रेस मुख्यमंत्रियों में सबसे मुखर थे, और शायद अपने आपको अपनी पार्टी के मुखिया के सामने एक अलग तरह से स्थापित भी कर रहे थे। लेकिन चुनावी नतीजे मुख्यमंत्री, जो कि प्रदेश अध्यक्ष भी हैं, को एक बड़ा सदमा देने वाले निकले। हो सकता है कि दिल के बहलाने को कुछ लोग यह तर्क ढूंढ लाएं कि पूरे देश में ही जब कांग्रेस इस बुरी तरह हारी है, तब छत्तीसगढ़ में भी ऐसा हाल तो होना ही था। लेकिन कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री ने पंजाब में पार्टी की इज्जत बचाने का काम किया है, और एक मिसाल पेश की है। इसलिए कांग्रेस को बैठकर यह देखना होगा कि कुछ महीने पहले जीता गया तकरीबन पूरा प्रदेश, आज तकरीबन पूरा का पूरा हाथ से कैसे निकल गया? कैसे छत्तीसगढ़ के लगभग हर मंत्री की सीटों पर कांग्रेस हारी है, सिवाय दो मंत्रियों के। कैसे सबसे अधिक मंत्रियों वाले, खुद मुख्यमंत्री के गृह जिले में कांग्रेस हारी है? कैसे मुख्यमंत्री पद के तीनों दावेदार रहे लोगों के प्रभाव क्षेत्र में कांग्रेस हारी है? प्रदेश के जिस अनपढ़-आदिवासी मंत्री कवासी लखमा का बड़ा मजाक बनाया जाता है, महज उसी के जिले में कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती है, और विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत की पत्नी श्रीमती ज्योत्सना महंत ने प्रदेश में कांग्रेस को दूसरी जीत दिलाई है। 

लेकिन जितना कांग्रेस के सोचने को है, उससे जरा भी कम भाजपा के सोचने को नहीं है। पूरे देश में जब भाजपा की टिकटें तय हो रही थीं, तो छत्तीसगढ़ अकेला प्रदेश था जहां 15 बरस से अकेले मुख्यमंत्री चले आ रहे डॉ. रमन सिंह, और इन तमाम बरसों में उनकी पसंद के बनते आ रहे प्रदेश अध्यक्षों की बनाई हुई लिस्ट को अमित शाह ने पूरी तरह खारिज कर दिया था, और कुछ असंभव से लगते पैमाने लागू किए थे कि किसी भी सांसद को, किसी भी विधायक को, किसी भी हारे हुए सांसद-प्रत्याशी को, किसी भी हारे हुए विधायक-प्रत्याशी को, या उनके रिश्तेदारों को टिकट नहीं दी जाएगी। ऐसे में लगता था कि राज्य में कोई ढंग का उम्मीदवार ही नहीं मिलेगा। लेकिन अमित शाह ने तमाम 11 नए लोगों को मैदान में उतारा, और उनमें से 9 ने चुनाव जीता, और इनमें से अधिकतर लाख-लाख वोटों से अधिक से जीते। लोगों को याद होगा कि जब यह लिस्ट आई थी तब हमने इसी जगह लिखा था कि अगर राज्य भाजपा की लिस्ट को पूरी तरह खारिज करके दिल्ली की बनाई हुई लिस्ट अगर कामयाब होती है, तो उससे छत्तीसगढ़ का भाजपा संगठन, यहां के नेता बेअसर और अप्रासंगिक साबित हो जाएंगे कि मोदी-शाह जिसे चाहें उसे जिता सकते हैं। और हुआ भी वही, 11 में से 9 का जीतना एक असंभव सी लगती बात थी, और राज्य के किसी अतिरिक्त योगदान के बिना मोदी-शाह के असर ने बाकी देश की तरह छत्तीसगढ़ को भी जीतकर दिखा दिया, और तमाम ऐसे सांसद बनाए जो कि उनकी सीधी पसंद के हैं। राज्य में भाजपा के पास इस जीत को लेकर खुशी मनाने के तर्क तो हैं क्योंकि सीटों के अलावा देश में उनका प्रधानमंत्री फिर लौट रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नतीजे राज्य की भाजपा की अहमियत किसी भी तरह से बढ़ा रहे हैं, या फिर महज यह साबित कर रहे हैं कि मोदी-शाह दिल्ली में बैठे देश भर में जिसे जहां चाहे जिता सकते थे, और उन्होंने जिता लिया? 

छत्तीसगढ़ में कुछ महीनों बाद म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में पार्षद और पंच का फैसला ईकाई-दहाई के वोटों से हो जाता है। ऐसे में सत्तारूढ़ कांग्रेस, और हाल ही में दिल्ली की सत्ता तक पहुंची, और राज्य में भारी कामयाब साबित हुई भाजपा दोनों के सामने यह एक बड़ी चुनौती रहेगी कि वे कैसे इन चुनावों में कामयाब होते हैं? दिल्ली को इतनी फुर्सत नहीं रहेगी कि वे गली-मुहल्ले के चुनाव के बारे में देखें। और ऐसे में राज्य के ही नेताओं पर यह चुनौती रहने जा रही है। इन दोनों ही पार्टियों की अपनी बहुत सी बुनियादी दिक्कतें इस प्रदेश में हैं। उन सबकी यहां पर चर्चा मुमकिन नहीं है। लेकिन यह तय है कि आज से लेकर स्थानीय संस्थाओं के चुनावों तक जो पार्टी ढंग से तैयारी करेगी, पक्ष या विपक्ष का अपना जिम्मा ठीक से निभाएगी, उसे जीत हासिल होगी। विधानसभा कांग्रेस के हिस्से गई, और लोकसभा भाजपा के हिस्से। अब स्थानीय चुनाव इन दोनों के बीच एक बड़ी अहमियत वाला मुकाबला रहेंगे। लेकिन इसकी तैयारी के लिए यह भी जरूरी होगा कि इन दोनों पिछले चुनावों के नतीजों को देखकर अपनी-अपनी कमजोरियों को येे पार्टियां समझें, मानें, और उनको दूर करने की कोशिश करें। देश और प्रदेश दोनों में मजबूत सरकारें जारी रहने वाली हैं, लेकिन स्थानीय संस्थाओं के चुनाव के मुद्दे और गंभीर, और बारीक रहने वाले हैं, जो कि और बड़ी चुनौती भी रहेंगे। 
-सुनील कुमार

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