विचार / लेख

 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन
Date : 25-May-2019

डॉ. लखन चौधरी

हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद, और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दों के कारण भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस से 9.76: अधिक वोट शेयर लेकर छत्तीसगढ़ में फिर एक बार 11 में से 9 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही। 2004, 2009 एवं 2014 की तुलना में भाजपा को मात्र एक सीट गंवानी पड़ी। उल्लेखनीय है कि नवम्बर-दिसम्बर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दो-तिहाई से भी अधिक 90 में से 68 सीटें मिली थीं। उसके बाद से यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, भाजपा को कड़ी टक्कर देगी और 4-6 सीट तक जीत सकती है, लेकिन उम्मीद से बहुत कम, बहुत कमजोर प्रदर्शन करते हुए मात्र एक सीट की बढ़त के साथ बस्तर और कोरबा की 2 सीट पर ही कांग्रेस को जीत मिली।
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 43: एवं भाजपा का 33: था, यानि कांग्रेस को लगभग 10 लाख (10:) अधिक वोट मिले थे। 4-5 महिने बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस लगभग 13 लाख वोट (9.76:) से पिछड़ गई। लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस का वोट शेयर घटकर 40.94: रह गया, जबकि भाजपा का वोट शेयर बढक़र 50.7 फीसदी हो गया। इस प्रकार लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को 9.76 फीसदी  वोट शेयर बढऩे का फायदा 11 में से 9 सीट जीतने में मिला, जबकि कांग्रेस को मात्र 2 फीसदी  वोट शेयर की कमी का नुकसान हुआ। 
यह अलग बात है कि इस लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 9.76 फीसदी  बढऩे के बावजूद एक सीट का नुकसान और कांग्रेस को 2 फीसदी  वोट शेयर की कमी के बावजूद एक सीट का फायदा हुआ है। इधर राज्य में पिछली लोकसभाओं के चुनाव के वोट शेयर (तालिका 01) से स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव 2014 की तुलना में 2019 में कांग्रेस को 1.94 फीसदी  (39>40.94) वोट शेयर अधिक मिला एवं राज्य में भाजपा का वोट शेयर मात्र 0.70 (50>50.70) अधिक बढ़ा।
पिछले विधानसभा चुनाव में दो-तिहाई से भी अधिक 68 सीटों पर भारी जीत के बावजूद लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस उम्मीद से बहुत कम प्रदर्शन कर पाई। विधानसभा चुनाव के बाद से ही कांग्रेस ही नहीं बल्कि प्रदेश के सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक भी यह मानकर चल रहे थे कि इस बार कांग्रेस को 4-6 सीटें मिलेंगी या मिल सकती हैं। इधर भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से अपने सभी 10 सांसदों के टिकट काटकर नये चेहरों को मैदान में उतारा था, इससे भी लग रहा था कि स्थानीय भाजपा नेताओं की अंदरूनी नाराजगी के कारण भी भाजपा को नुकसान एवं कांग्रेस को फायदा मिल सकता है, लेकिन ‘हिन्दुत्व’, ‘राष्ट्रीयता’, ‘राष्ट्रवाद’, ’राष्ट्रीय सुरक्षा’ जैसे विस्फोटक मुद्दों की लहर के बीच कांग्रेस को मात्र एक सीट का फायदा हुआ, और भाजपा 11 में से 9 सीट जीतने में सफल रही।
लोकसभा चुनाव 2019 में छत्तीसगढ़ के कुल 1,89,99,251 वोट में से 1,36,14,553 वोट पड़े, जिसमें भाजपा को 50.70 फीसदी, कांग्रेस को 40.94फीसदी, बसपा को 2.30 फीसदी, नोटा को 1.44 फीसदी और अन्य पार्टियों को 4.62 फीसदी, वोट पड़े या मिले हैं। पिछले दिनों 22 से 30 अप्रैल के बीच कराये गये लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वे के अनुसार कांग्रेस को 43फीसदी, भाजपा को 41 फीसदी और बसपा सहित अन्य पार्टियों को 16: वोट मिलने का अनुमान लगाया गया था। इसका अर्थ है कि कांग्रेस के 2 फीसदी और अन्य के 8 फीसदी कुल लगभग 10: वोट भाजपा के खाते में गये जो भाजपा की जीत के बहुत बड़े कारण बने। इस प्रकार भाजपा अन्य के 8 फीसदी वोट की सेंधमारी कर मात्र एक सीट खोकर राज्य में इस बार भी बहुत बड़ी जीत बनाये रखने में सफल रही।  
इस लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत का स्पष्ट कारण ‘हिन्दुत्व’, ‘राष्ट्रीयता’, ‘राष्ट्रवाद’, ’राष्ट्रीय सुरक्षा’ जैसे ज्वलंत विस्फोटक मुद्दों की लहर के साथ मोदी मैजिक रहा, वहीं राज्य की विधानसभा में भारी बहुमत के बावजूद कांग्रेस का अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाने के लिए राज्य के स्थानीय नेताओं का अति आत्मविश्वास मुख्य कारण है। इसी अति आत्मविश्वास के कारण कांकेर सीट कांग्रेस के हाथ से गई, जहां जीत-हार का अंतर एक प्रतिशत से भी कम मात्र 0.59 फीसदी (भाजपा-47.12 फीसदी एवं कांग्रेस-46.53 फीसदी) वोट शेयर रहा। बस्तर में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की नक्सलियों द्वारा ठीक चुनाव के पहले नृशंस हत्या कर देने से भाजपा नेताओं एवं कार्यकत्र्ताओं में डर फैलने का लाभ शायद कांग्रेस को मिला, अन्यथा बस्तर सीट भी कांग्रेस के हाथ से निकल जाती ? इधर कोरबा सीट चरणदास महंत की व्यक्तिगत छवि एवं पूर्व केन्द्रिय मंत्री रहते उनके द्वारा किये गए कार्यों के कारण कांग्रेस के खाते में गई। कुल मिलाकर कांग्रेस पिछले 4-6 महिने के कार्यकाल में अपने किए गए कार्यों को भी ठीक से नहीं भुना पाई। बड़े पैमाने पर किये गए किसानों की कर्जमाफी, धान की कीमत में भारी बढ़ोत्तरी, बिजली बिल आधा करने जैसे ठोस कामों के बावजूद लोकसभा चुनाव में जनता का विश्वास हासिल करने में नाकाम रही। हांलाकि यह चुनाव विशुद्ध तौर पर राष्ट्रीय मुद्दों पर केन्द्रित था, भाजपा की जीत केवल राष्ट्रीय-मोदी लहर का परिणाम है, इसके बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन निसन्देह कमतर एवं कमजोर ही माना जायेगा।
लोकनीति-सीएसडीएस पोस्ट-पोल सर्वेक्षण एवं वास्तविक नतीजे
22 से 30 अप्रैल के बीच राज्य में कराये गये लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वेक्षण के आंकड़ों की समीक्षा-विश्लेषण के अनुसार राज्य में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में बहुमत के पर्याप्त संकेत हैं, जो कि नीचे तालिका क्रमांक 03 से स्पष्ट है। 

लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वेक्षण के अनुसार राज्य के आयु के आधार पर 18 से 25 वर्ष के 54 फीसदी युवाओं और 56 वर्ष से अधिक के 61 फीसदी बुजुर्गों ने भाजपा को वोट देना स्वीकार किया था। लिंग के आधार पर 55 फीसदी महिलाओं ने भाजपा को वोट देना स्वीकार किया था। 
शिक्षा के आधार पर कॉलेज एवं उससे उपर उच्च शिक्षा प्राप्त में से 64 फीसदी उत्तरदाताओं ने और जाति के आधार पर सामान्य वर्ग के 74 फीसदी उत्तरदाताओं ने भाजपा को वोट देना स्वीकार किया था। 
स्थानीयता के आधार पर 69 फीसदी उत्तरदाताओं तथा आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर मध्यम वर्ग के 54 फीसदी एवं उच्च वर्ग के 66 फीसदी उत्तरदाताओं ने भाजपा को वोट देना स्वीकार किया था।
लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वेक्षण के जनांकिकीय, सामाजिक एवं आर्थिक आंकड़ों से स्पष्ट है कि प्रदेश के लगभग आधे मतदाताओं ने 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में भारी बहुमत से वोटिंग करने के बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी वोटिंग की जिसका नतीजा भाजपा के पक्ष में रहा। 
स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में भाजपा के जीतने के ठोस कारण पहले से मौजूद थे, जो लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वे के आंकड़ों से साफ है। तात्पर्य यह है कि छत्तीसगढ़ में लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वेक्षण के आंकड़ें, वास्तविकता के निकट जाकर लोकसभा चुनाव के वास्तविक परिणाम से मेल खाते हैं, और संस्था की विश्वसनीयता की सार्थकता की पुष्टि भी सिद्ध करते हैं।
(लेखक वरिष्ठ प्राध्यापक एवं लोकनीति-सीएसडीएस नई-दिल्ली के छत्तीसगढ़ राज्य समन्वयक हैं)
 

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