संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  26 मई : राजनीतिक भविष्यवाणी और  वायदों का भांडाफोड़ जरूरी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 मई : राजनीतिक भविष्यवाणी और वायदों का भांडाफोड़ जरूरी
Date : 26-May-2019

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भोपाल में दिग्विजय सिंह के लिए यज्ञ करने वाले एक किसी बाबा ने साढ़े पांच क्विंटल मिर्च जलाकर यज्ञ किया था, और फिर यह मुनादी भी की थी कि अगर दिग्विजय नहीं जीतेंगे तो वे यज्ञ की जगह पर ही समाधि ले लेंगे। अब सोशल मीडिया पर एक टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग तैर रही है जिसमें कोई आदमी इस बाबा से फोन पर बात कर रहा है, और पूछ रहा है कि समाधि कब ले रहे हैं, देर क्यों कर रहे हैं, और बाबा है कि झल्लाए जा रहा है। एक दूसरा कॉर्टून एक विख्यात कॉर्टूनिस्ट सुधीर दर ने पोस्ट किया है जिसमें किसी भविष्यवक्ता के दरवाजे पर एक नेता चप्पल लेकर पहुंचा हुआ है। देश भर में ऐसी कई और घोषणाएं हुई थीं जिनमें कई भविष्यवक्ताओं ने अलग-अलग नेताओं और पार्टियों की जीत बताई थी, जो कि एक-दूसरे से अलग भी थीं, और नतीजों के पहले भी यह तो जाहिर था ही कि उनमें से कोई एक तो गलत होगी ही। 

चूंकि हिन्दुस्तान में हर पांच बरस में आम चुनाव होते हैं, और हर कुछ महीनों में कुछ प्रदेशों के चुनाव होते हैं, या उपचुनाव होते हैं। ऐसे में लोकतंत्र के लिए यह जरूरी हो गया है कि भविष्यवाणी करने वाले सभी पेशेवर ज्योतिषियों की कतरनों को सम्हालकर रखा जाए, और नतीजे आने के बाद नतीजों के साथ मिलाकर उनका भांडाफोड़ किया जाए। ऐसा जरूरी इसलिए भी है कि इनमें से कई ज्योतिषी नतीजे आने के बाद कम्प्यूटर और फोटोशॉप की मेहरबानी से पिछली तारीखों की कतरनें गढ़वा लेते हैं जिनमें उनकी भविष्यवाणी आए हुए नतीजों से मेल खाते दिखती हैं, और वे इसे दिखाकर लोगों को आगे बेवकूफ बनाना जारी रखते हैं। लोगों को ऐसे पाखंड से बचाने के लिए समझदार लोगों की यह सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है कि अंधविश्वास का पर्दाफाश किया जाए। 

चुनावी नतीजे हिन्दुस्तान में किसी भी दूसरे नतीजे के मुकाबले अधिक बड़े सट्टे का सामान रहते हैं। शेयर बाजार भी चुनावी नतीजों पर नजर रखता है, और उनसे प्रभावित होता है। फिर देश में अंधविश्वास में डूबी हुई आबादी का अनुपात खासा बड़ा है, इसलिए उन पर भी ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की बातों पर असर होता है, और किसी नेता या पार्टी के वोट घटते हैं, किसी दूसरे नेता या पार्टी के वोट बढ़ते हैं। लोकतंत्र में जनता के फैसले को अंधविश्वास से प्रभावित करने की ऐसी हरकत को भी उजागर करना चाहिए। आज जब इक्कीसवीं सदी में भी बहुत से अखबारों में रोजाना का भविष्यफल छापा जाता है, और जिस दिन ज्योतिषी के पास मैटर नहीं आता, अखबार का कोई सबएडिटर ही राशियों और लाईनों की अदला-बदली करके भविष्यवाणी तैयार कर लेता है, तो ऐसे में आज देश में एक वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति को फिर से जिंदा करने की जरूरत है। अभी पिछले दो महीनों में ही देश के हर बड़े भविष्यवक्ता ने चुनावी भविष्यवाणी की हैं, और इनका एक विश्लेषण कई झूठ उजागर कर सकता है। 

इससे परे जो नेता या उनके समर्थक बड़े-बड़े दावे करते हैं, उनके सिर, उनकी मूंछें मुंडवाने पर भी जोर डालना चाहिए, और उनकी कतरनों को अगले चुनाव के लिए भी सम्हालकर रखना चाहिए। जागरूक मतदाता कैसा कर सकते हैं इसकी एक वीडियो मिसाल कुछ हफ्ते पहले चंडीगढ़ से आई थी। वहां भाजपा प्रत्याशी किरण खेर के प्रचार के लिए पहुंचे उनके पति अनुपम खेर जब बाजार में एक दुकान पर पहुंचे तो दुकानदार ने पांच बरस पहले के भाजपा के चुनावी घोषणापत्र को दिखाते हुए पूछा कि इन पुराने वायदों का क्या हुआ? बेजवाब अनुपम खेर तुरंत वहां से निकलकर आगे बढ़ लिए। ऐसा कई जगहों पर कई पार्टियों और कई नेताओं के साथ हुआ होगा, और अगर वोटर ऐसे ही चौकन्ने हो जाएं, तो नेताओं के वायदे, उनकी भविष्यवाणियां, इन सब पर लगाम लग जाएगी। 

ठीक ऐसा ही टीवी और अखबारों के एक्जिट पोल या ओपिनियन पोल के साथ होना चाहिए, और उन्हें करने वाली एजेंसियों के साथ भी। जिस तरह आज भारत में एडीआर नाम का एक एनजीओ उम्मीदवारों की दौलत, उनके जुर्म, और उनकी बाकी बातों का विश्लेषण करके लगातार जनता के सामने रखता है, ठीक उसी तरह चुनाव नतीजों के बाद कोई ऐसा संगठन रहना चाहिए जो कि किसी भी किस्म की, या हर किस्म की भविष्यवाणी, वायदे, चुनौती को लेकर बैठे, और नतीजों के साथ उनका मिलान करके जनता के सामने रखे। वोटों और सीटों को लेकर पार्टियों और नेताओं के दावों को नतीजों के बाद उजागर करना भी जरूरी है, और जब अगले किसी चुनाव में वे यही काम फिर से करें, तो उन्हें उनका इतिहास याद दिलाना भी जरूरी है। चूंकि आम जनता अपनी समझदारी के इस्तेमाल के लिए बहुत गंभीर नहीं रहती, इसलिए उसके सामने ऐसे विश्लेषण को पकाकर तश्तरी में पेश करना जरूरी है, और कुछ लोगों को यह काम करना चाहिए। आज समाचारों की कुछ वेबसाइटें ऐसी हैं जो कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर झूठ और फेक का पर्दाफाश करने के एक जिम्मेदार काम में लगी हुई हैं, इसलिए इसी तरह का काम भविष्यवाणियों और दावों के साथ भी होना चाहिए, अधूरे वायदों के साथ भी होना चाहिए।

-सुनील कुमार

Related Post

Comments