संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 मई : उत्तेजना के पलों में मजबूर होने के पहले सोच रखें...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 मई : उत्तेजना के पलों में मजबूर होने के पहले सोच रखें...
Date : 28-May-2019

एक वक्त फिल्मों और व्यंग्य लेखों के लिए पति-पत्नी और वो, ऐसे प्रेम त्रिकोण की कहानी सोची जाती थी, और खाए गोरी का यार, बलम तरसे मन बरसे जैसे गाने शूट किए जाते थे। अब असल जिंदगी में यह प्रेम त्रिकोण सीधे-सीधे सेक्स त्रिकोण में बदल गया है और इसके नतीजे अखबारों में खबरों के पन्नों पर भरे पड़े हैं। रोजाना कई खबरें ऐसी आ रही हैं कि शादीशुदा जिंदगी में एक या दोनों भागीदार शादी से बाहर के प्रेम या महज सेक्स संबंधों में ऐसे उलझते हैं कि जिनका नतीजा हत्या और आत्महत्या में दिखता है। बहुत से ऐसे सेक्स-जुर्म सामने आ रहे हैं जिनमें दो लोगों के बीच प्रेम या सेक्स संबंध चलते हुए तस्वीरें ली गईं, वीडियो रिकॉर्डिंग की गईं, और फिर रिश्ते अच्छे न रहने पर उनकी बिना पर ब्लैकमेलिंग की गई, और कुछ मामलों में ऐसी ब्लैकमेलिंग से थककर भूतपूर्व प्रेमी ने भूतपूर्व प्रेमिका की हत्या कर दी, या इसका उल्टा भी देखने में आ रहा है।

जुर्म की ऐसी बहुत सी खबरों को पढ़कर जो कुछ बातें दिमाग में आती हैं उनकी शुरूआत करें तो पहली बात यह है कि प्रेम या सेक्स संबंधों के चलते लापरवाही से ऐसे सुबूत तैयार करते न चलें जो कि किसी तीसरे के हाथ लगकर ब्लैकमेलिंग का सामान बनें, या किसी चूक की वजह से सोशल मीडिया पर फैलकर खुदकुशी को मजबूर करें। दूसरी बात यह कि प्रेम संबंधों को सेक्स की उस हद तक ले जाने के पहले याद रखें कि शादी के पहले किसी भी जोड़ीदार का इरादा बदल सकता है, और उस दिन यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि शादी का वायदा करके, झांसा देकर रेप किया। अब कुछ बड़ी अदालतों ने भी ऐसे फैसलों में यह मानना शुरू किया है कि ऐसे सेक्स संबंधों को बलात्कार करार देना जायज नहीं है। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि आपसी रिश्तों में बेवफाई करके बाहर जब कोई त्रिकोण खड़ा किया जाता है, तो वह जिंदगी के लिए एक किस्म का बरमूडा त्रिकोण भी बन जाता है जिसमें जिंदगी के जहाज का डूबना महज वक्त की बात होती है, आशंका की नहीं। 

जिंदगी में थोड़ा सा आगे बढ़ें तो यह समझने की जरूरत है कि इंसानी चूक प्रेम या सेक्स में हो गई, तो हो सकता है कि बिना बड़े नुकसान के उससे उबरना भी हो जाए। लेकिन दूसरी तरफ अगर ऐसी चूक फोन, ईमेल, कम्प्यूटर, फोन जैसे किसी सुबूत को पैदा कर जाती है, तो देश में कानून बड़ा कड़ा है, और उससे बाकी जिंदगी के बर्बाद होने का एक बड़ा खतरा खड़ा हो जाता है। फिर अगर ऐसे सुबूतों की वजह से या उनके बिना भी अगर लोग सीधे-सीधे किसी किस्म का हिंसक जुर्म कर बैठते हैं, तो आज के वक्त डिजिटल सुबूतों की वजह से तकरीबन सभी मुजरिम पकड़ा जाते हैं, और ऐसे नौसिखिए मुजरिमों के पकड़े जाने की तो गारंटी सी होती है। रोज की खबरों को ही देख लें तो ऐसे अधिकतर मुजरिम दो-चार दिनों के भीतर ही गिरफ्तार होते हैं।

इसलिए प्रेम और सेक्स के त्रिकोण में, या ब्लैकमेलिंग के खतरे में फंसने के पहले, और फंसाने के पहले ऐसे जुर्म के अंत के बारे में जरूर सोच लेना चाहिए जिसमें शिकार को सामाजिक बदनामी मिलती है, रिश्ते खत्म होते हैं, कई मामलों में मौत भी मिलती है, और मुजरिम को लगभग शर्तिया सजा और कैद मिलती ही है। इसलिए ऐसे संबंधों के तमाम पहलुओं पर उत्तेजना के पलों में मजबूर होने के पहले ही जरूर सोचकर रखें, क्योंकि उत्तेजना के पलों में बदन का दिमाग वाला हिस्सा काम नहीं करता है, पे्रम की उत्तेजना, सेक्स की उत्तेजना, या हिंसा की उत्तेजना, जिसका भी पल हो।
-सुनील कुमार

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