संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  30 मई : बारह बरस में संन्यास का फैसला क्या सचमुच सही?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 मई : बारह बरस में संन्यास का फैसला क्या सचमुच सही?
Date : 30-May-2019

गुजरात का सूरत अभी-अभी एक कोचिंग सेंटर में लगी आग से करीब 25 छात्र-छात्राओं की मौत को लेकर खबरों में था। और अभी कल एक दूसरी खबर इस शहर को खबरों में लाई, यहां की एक बारह बरस की जैन परिवार की छात्रा ने सांसारिकता छोड़कर दीक्षा ली, और साध्वी हो गई। इस मौके पर संपन्न जैन समाज की धार्मिक परंपराओं के अनुसार बहुत बड़ा जलसा हुआ जिसमें शहर के और आसपास के समाज के लोग शामिल हुए, बहुत बड़ी शोभायात्रा निकली, और समाज के साधु-संत जुटे। परिवार में माता-पिता ने भी इस बात पर खुशी जाहिर की कि उनकी बेटी संन्यास की राह अपनाकर परिवार का गौरव बढ़ा रही है, और कहा कि यह पूर्वजन्म के संस्कारों का नतीजा है। 

ऐसा पहले भी कई बार हुआ है जब कम उम्र के बच्चे संन्यास लेकर जैन साधु या साध्वी बनें, और समाज में यह बहस हो कि क्या बालिग हुए बिना, दुनिया को और देखे बिना क्या इतना बड़ा फैसला किसी बच्चे को लेने देना चाहिए? अभी जब यह खबर आई तो एक बार फिर मीडिया और सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि जिस उम्र में शादी की इजाजत नहीं है, वोट देने का हक नहीं है, अपनी जिंदगी के बाकी फैसले लेने का हक नहीं है, तब जिंदगी का इतना बड़ा और कठिन फैसला लेने का हक किसी बच्चे को कैसे दिया जाना चाहिए? यह बात न तो जैन धर्म के खिलाफ है, और न ही धर्म के तहत संन्यास लेने के खिलाफ है, यह बात महज उन बच्चों के हक में है जो कि उम्र और समझ के हिसाब से, परिपक्वता और शारीरिक जरूरतों के हिसाब से इतने बड़े नहीं हुए हैं कि बाकी पूरी जिंदगी के लिए शायद जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे कड़ा फैसला ले सकें। 

बहुत से धर्मों में, या कि अधिकतर धर्मों में धर्म के संगठन की अपनी व्यवस्था के लिए संन्यास का प्रावधान रहता है। कहीं लोग पादरी बनते हैं, कहीं नन बनती हैं, और कहीं बौद्धभिक्षु। लेकिन बारह बरस की उम्र में किसी बच्ची को बाकी पूरी जिंदगी के लिए संन्यास की कठिन राह का पूरा अहसास हो सकता हो, ऐसा लगता नहीं है। इंसान के तन-मन की परिपक्वता का एक सिलसिला रहता है, और दुनिया के अधिकतर देशों में 18 बरस के आसपास की उम्र को स्वतंत्र फैसले लेने के लिए सही माना गया है। गाड़ी चलाने का लाइसेंस हो, वोट डालने का हक हो, या मर्जी से शादी करने का  मामला हो, हिन्दुस्तान में भी लड़कियों के लिए 18 बरस, और लड़कों के लिए कुछ मामलों में 18 बरस, और कुछ में 21 बरस की न्यूनतम उम्र तय की गई है। अब सूरत की इस बच्ची की खबर को अगर बारीकी से देखें, तो उसके मां-बाप इसे अपनी बेटी का पक्का इरादा बताते हुए उसकी इच्छा पूरी करने की बात कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्ची बचपन से ही संन्यास देखते आई है, और साध्वियों के साथ उसने लंबा पैदल सफर भी किया है। इसलिए वह इस कड़ी जिंदगी से वाकिफ है। लेकिन दूसरी तरफ जब खुशी नाम की इस बच्ची का इंटरव्यू देखें तो वह साफ-साफ कहती दिखाई पड़ती है कि जब वह तीन माह की थी तब उसके परिवार में चार दीक्षाएं हो चुकी हैं, और तब से उसकी आत्मा में यह बीज रोपा जा चुका है, और बाद में माता-पिता ने, महाराज साहब ने इस बीज को अच्छे से उगाया, और अच्छे से खिलाया। वह यह भी कहती है कि वह चार बरस लेट हो चुकी है, महाराज साहब ने कहा था कि 8 बरस की उम्र में ही दीक्षा लेनी चाहिए। इससे जाहिर है कि बच्ची के मन में परिवार और धर्म प्रमुखों ने ऐसी बात डाली है कि 8 बरस की उम्र में ही दीक्षा ले लेनी चाहिए थी। 

जैन समाज को अपने बच्चों के भले के लिए, और धर्म के लिए भी इस बात पर सोचना चाहिए कि क्या इतनी कम उम्र में किसी को संन्यास दिलाना चाहिए? जिन सांसारिक सुखों को, सांसारिकता को त्याग करके संन्यास लेने की भावना ऐसे बच्चों में रहती है, क्या उन बच्चों ने अब तक तमाम सांसारिक सुखों को, सांसारिकता को देखा भी है? जो देखा ही नहीं, पाया ही नहीं, भोगा ही नहीं, उसे त्याग करना क्या एक अपरिपक्व फैसला नहीं है? क्या धर्म को खुद ही ऐसा नियम लागू नहीं करना चाहिए कि बच्चे बालिग होने के बाद ही इस बारे में कोई फैसला लें? आज भारत का कानून बच्चों को बालिग होने के पहले तमाम किस्म के बड़े फैसले लेने से रोकता है, और उनके मां-बाप ही उनके लिए फैसले ले सकते हैं। ऐसे में क्या यह फैसला मां-बाप का लिया हुआ नहीं माना जाएगा, या नहीं होना चाहिए? बारह बरस की उम्र की एक बच्ची को ऐसी कड़ी और कठोर बाकी तमाम जिंदगी तय करने का फैसला उस बच्ची के ही हित में नहीं लगता है। इस बारे में जैन समाज के भीतर ही गंभीर सोच-विचार होना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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