विचार / लेख

 राहुल जैसे हालात सोनिया के  सामने भी एक वक्त थे...
राहुल जैसे हालात सोनिया के सामने भी एक वक्त थे...
Date : 31-May-2019

‘छत्तीसगढ़’ के आपके सुपरिचित लेखक, गांधीवादी विचारक और प्रतिष्ठित सीनियर एडवोकेट कनक तिवारी ने कांग्रेस के हालात पर एक पत्र तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को 21.06.1999 को लिखा था। वह पत्र अंगरेजी में होने के कारण हमारे पाठकों के लिए अनुवाद के जरिए ही पढ़ा जाना बेहतर होगा। इसलिए उस पत्र का हिन्दी अनुवाद ‘छत्तीसगढ़’ अपने पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहा है। कनक तिवारी ने अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस के कई पदों पर जिम्मेदारी का निर्वाह किया है। वे प्रदेश के गिने-चुने बुद्धिजीवियों, लेखकों और वक्ताओं में कांग्रेस के इलाके में मशहूर रहे है। उनका यह पुराना पत्र कांग्रेस की मौजूदा हालत और पार्टी के अध्यक्ष के सामने आई चुनौतियों के संदर्भ में हमें प्रासंगिक लगता है। इसलिए भी हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं। 
-संपादक

आदरणीय सोनियाजी, 

एक खास चलाए गए अभियान के नतीजतन कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोडऩे के आपके फैसले के मद्देनजर मैं आपके प्रति सम्मानसहित यह पत्र दुखी होकर लिख रहा हूं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस घबराहट और पर्याप्त बिखराव का शिकार लग रही है। इसके बावजूद सभी मामले आपके ही नियंत्रण में हैं। इतिहास बमुश्किल भरोसा करेगा कि अपने ऊपर हो सकने वाले सियासी हमलों बल्कि धोखाधड़ी का पूर्व अनुमान आपने नहीं किया होगा? इस आधार पर भी कि आप विदेशी मूल की कही जा रही हैं जब आपने मुकम्मिल तौर पर और ठीक ही इस फैसले को सहमति दी थी कि कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में 1997 में प्राथमिक सदस्यता ले लें। व्यावहारिक राजनीति शराफत के उच्च अर्थ में गंदा खेल ही हो जाती है। सियासत कोई परी कथा नहीं है। कांग्रेस के सूत्रों और सूक्तियों को एक ऐसे परिवार में शामिल होने के कारण, जिसकी आप केन्द्रीय भूमिका में आईं और प्रकारान्तर से जो परिवार भारतीय राजनीति की नसों का केन्द्र रहा है, आपसे ज्यादा कौन जानता है? 
सभी तरह की जम्हूरियत तथा विकेन्द्रीकरण के बावजूद कांग्रेस की अध्यक्षता सबसे मुख्य जिम्मेदारी और कार्यकारी तथा संवैधानिक ताकतों का केन्द्र बिन्दु है। कांग्रेस अध्यक्ष संगठन में पूरी तौर पर व्याप्त और हर मोड़ पर हाजिर रहता है। आपने इस उच्च पद को सुशोभित किया और उसे मर्यादा भी दी जिस पद पर भारत माता के महानतम सपूतों, बेटियों आदि ने उसके संस्थापक ओ. ए. ह्यूम और बाद में डॉ. एनी बेसेन्ट के समय से पदभार सम्हाला है। पहले भी त्यागपत्रों का सिलसिला रहा है। आपके पदेन पूर्वजों के समय भी नेताओं और सहकर्मियों के बीच तेज मतभेदों के चलते ऐसा होता रहा है। पहले कभी भी कांग्रेस अध्यक्ष के पद की जन्मगत और अंतर्निहित योग्यता पर इस तरह हमला नहीं हुआ क्योंकि साथ साथ वह पद प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त भी होता था, जब भी पार्टी को बहुमत मिला। मौजूदा बुरे आरोपों की तर्कहीनता का ठीक से जवाब आपके प्रवक्ताओं और सलाहकारों ने नहीं भी दिया है। आधुनिक राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी कांग्रेस अध्यक्ष के पद का विवेचन राजनीतिक प्रबंधन के एक संगठन के अध्यक्ष के रूप में भी करेंगे। इतिहास और भविष्य दोनों इस बात की ताईद करेंगे कि कांग्रेस इस देश के करोड़ों लोगों का जीवनरक्त, पहचान और साकार होने वाला सपना भी रही है। यह कांग्रेस थी जिसने आजादी हासिल की और देश को उसका संविधान दिया। कांग्रेस अध्यक्ष का पद 1885 से है और उसके अध्यक्ष ने 15 अगस्त 1947 को उसी अर्थ में इतिहास के महत्वपूर्ण दिन प्रधानमंत्री का पद हासिल किया।
 यह संविधान सभा थी जहां विदेश में जन्म लेने वाली किसी नागरिकता के संबंध पर विस्तार से गहराई में विचार विमर्श हुआ था। हमारे संस्थापक पिताओं ने उसे अंतिम रूप से तय किया और उनका ऐलान हर वक्त जांच में अडिग रहा है। हम दुनिया की सबसे बड़ी, उदार और परिपक्व होती जम्हूरियत के रहवासी हैं। यह अलग बात है कि कई खलनायक और दर्शक बने तरह तरह के लोग आजादी की लड़ाई में कमतर भूमिका तक में भी दिखाई नहीं पड़ते। उन्हें संभवतया निकट भविष्य में उखाड़ा भी जा सकेगा, जब पार्टी हमारे प्रिय नेता राजीव गांधी के मुहावरे में इक्कीसवीं सदी में पहुंचेगी। यह कांग्रेस है जिसे किसी भी तरह के घिनौने आरोप, अस्वस्थ आलोचना और सिद्धांतहीन हमलों के मुकाबले अपनी ऐतिहासिक भूमिका अदा करनी है। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में आप पर विदेशी होने की अनावश्यक लगाई जा रही तोहमत और आरोप हैं जो परिस्थितियों की विमुखता के कारण लगाए जा रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में आपको उठ खड़ा होना है और खुद पर विदेशी होने के आरोप को चस्पा किए जाने को पोंछना होगा। 
 राजीव गांधी की दुखद मृत्यु के बाद सभी कांग्रेसजनों की असफलता के भी बाद खंडित होते नेतृत्व को आपने बचाने की कोशिश 1997 में की थी। निष्कासित नेताओं ने यह ठीक अनुमान लगाया होगा कि उन्हें लगता था कि आप ही कांग्रेस की अध्यक्षी संभालेंगीं। कांग्रेस के सभी कार्यकर्ता, पूरी कांग्रेस पार्टी आपके पीछे मजबूती से खड़ी है। नासमझ निष्कासित नेताओं और संघ परिवार के साथ लगभग एकजुट लगते जमावड़े के वृन्दगान को अनुपातहीन तरीके से आपके सहायकों, सलाहकारों और पार्टी मुख्यालय की प्रशासनिक मशीनरी में तरजीह दी गई जिसका परिणाम दुर्भाग्यवश आपके इस्तीफा देने में सामने आया। आपको लिखा गया पत्र साफ साफ बांझ शरारती संकेतों से लकदक था। उसे मुनासिब तर्कों के समुच्चय और संविधान सभा में तयशुदा नागरिकता के सिद्धांतों के सहारे जवाब दिया जा सकता था। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि यह पत्र प्रेस को किसने लीक किया होगा। यह उनसे कैसे उम्मीद की जाएगी जो कम्प्यूटर के जमाने में भी कांग्रेस वेबसाइट के डेटा को समय समय पर संशोधित नहीं करते हैं। एक औसत भारतीय के स्वाभिमान की संस्कृति, बीजगणित और रासायनिकता के कई मायने और कई सतरें होती हैं। यह कांग्रेस कार्यसमिति की समझ के दायरे में होना चाहिए था कि वह ऐसे पत्र का किस माकूलता से जवाब दे ताकि उठाए जा रहे संदेहों का मकडज़ाला साफ किया जा सके। 
देश में हर कोई जानता है कि ये बंदूकें आपकी ओर नहीं और किसी के खिलाफ तनी हैं। कौन हैं ये लोग? क्यों और कैसे इन लोगों ने तथाकथित गर्व और गौरव के साथ कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ तूल दे सकने का नाकाबिल महत्व पा लिया। इस तरह के तत्व तो आपके सभी सियासी पूर्वजों को इर्दगिर्द घेरे रहते थे और ज्यादातर इंदिरा जी और राजीव जी के चारों ओर। नेहरू गांधी परिवार के गौरव और गरिमा के लेखे किस तरह ऐसे तत्व उन्हें खुश करने की महारत में प्रवीण होते चले गए। आपकी ईष्याविहीन तटस्थता और विनम्रता के बार बार सबूत दिए जाने के बावजूद ऐसे लोगों ने जनमानस में ऐसा प्रभाव जमाया है कि मानो वे मौजूदा कांग्रेस अध्यक्षी को लेकर उसके हर तंतु और ताने बाने को समझते हैं। धोखेबाजों, दलबदलुओं, पूर्व नौकरशाहों, खुशामदखोरों, वक्ती मतलबपरस्तों, पांच सितारा नस्लीय दलालों, कांग्रेस इतिहास से वंचित आलिमफाजिलों, मौकापरस्तों, अफवाहबाजों, सामंतियों, जातिवादियों और तरह तरह के लोग हर वक्त पार्टी के रोल और ढांचे पर कब्जा करने की कोशिश करते ही रहते हैं। विधायिकाओं में हमारे योग्य मंत्रियों की जानकारी में कई अपराधिक तत्व घुस जाने में सफल हुए हैं। नौसिखियों और गैरकांग्रेसियों ने पार्टी दफ्तर पर भी कब्जा किया है। कांग्रेस की मूल भाषा एक बीत गए युग की याद की तरह हो गई है। स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों, बुद्धिजीवियों, गांधीवादियों, श्रमिक नेताओं, स्वदेशी समर्थकों, उदार हिन्दुओं, स्वार्थहीन कार्यकर्ताओं और पंथनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं के सियासी वंशजों को क्रमश: इतिहास की गुमनामी की गुुफाओं में धकेला भी जाता रहा है। 
लोकसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं और कांग्रेस के जहाज को बिना कप्तान के बनाये जाने की कोशिशें की जा रही हैं। पार्टी का वरिष्ठ नेतृत्व महत्वाकांक्षी राजनेताओं से युक्त है जो हर तूफानी हवा को अपने पक्ष में कई तरीके से मोड़ भी सकता है जिन तरीकों से भले ही वैसा पहले नहीं किया गया हो। निष्कपटता, प्रतिबद्धता और सत्यनिष्ठा को वाचाल, आसान और पारस्परिक नारे भी बना दिया जाता है। कौन हैं और कितने हैं जिन्होंने विश्व बैंक के सामने कांग्रेसी सत्ता के वक्त नेहरू की महान विरासत को ध्यान में रखा। ऐसे नेताओं के मन में इंदिरा गांधी की कितनी उपयोगिता शेष है और खासतौर पर वे जो विकल्प के रूप में कांग्रेस के आने जाने का उपक्रम करते रहे और उनकी पीठ पर बेशर्मी से छुरा भी मारते रहे। अपने इस सपने को सच करने के लिए कि वे सत्ता के शिखर पर कैसे बैठ पाएं आपकी उदारता का सहारा लेकर? राजीव गांधी के घोषित निंदक, सफलतापूर्वक उनके नजदीकियों को अलग करने में और उन्हें निराश करने में जुटे हुए तो हैं। इनमें से कितने हैं जिन्होंने आपको विदेशी होने का फतवा देने के पहले महान नेता महात्मा गांधी की समाधि पर पिछली बार कब सिर नवाया है? इस तरह की कांग्रेस की यत्नपूर्वक विपरीत मानसिकता बनाई जा रही है जिसे अन्यथा हमारे महान नेताओं के उज्जवल इतिहास ने बनाने की कोशिश की है,भले ही कई बार चुनावों में खंडित सफलता मिली हो। अपनी चुनावी असफलताओं के बावजूद राज्यसभा और राज्यतंत्रों के सदस्यों ने लोकसभा और लोकतंत्र के भविष्य निर्धारण के लिए केंद्रीय जगहों पर कब्जा कर रखा है सिर्फ इसलिए कि वे कांग्रेस मुख्यालय से अनुकूलता पाते रहे हों। 
नेहरू गांधी लोकतांत्रिक वंश (यद्यपि यह लोकतंत्रीय शब्द नहीं है) में निराशा का तत्व नहीं रहा है। वे तो देश के लिए मशाल थामकर चले हैं। लाखों कांग्रेस कार्यकर्ता दुखी हैं और उनमें घबराहट भी है। यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है कि वे कांग्रेस अध्यक्ष से अनुरोध करें कि वे जल्दबाजी में लिए गए अपने फैसले पर पुनर्विचार करें। भले ही इससे उनके विरोधी और आलोचक भी सकते में आ गए हों और उनके समर्थकों में गहरी निराशा फैल गई हो। यदि आप तय करती हैं कि आप अपना इस्तीफा वापस लेंगी तो आप लोकसभा के चुनाव क्षेत्रों के भूगोल को कांग्रेस के पक्ष में जरूर चुस्तदुरुस्त कर पाएंगी। यदि आप पुनर्विचार करने से इन्कार करती हैं तो भी आप इतिहास रचने की संभावना में मानी जाएंगी क्योंकि मौजूदा भ्रष्ट व्यापक राजनीति में कुछ मूल्यों को तो इंजेक्ट कर दिया जाना तो दिखाई देता रहेगा। राष्ट्र आपकी ओर प्रतीक्षारत है। 
सद्भावनाओं सहित
आपका 
कनक तिवारी 

Related Post

Comments