संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 02 जून : उनको अगले चुनाव में भी  कोई नहीं बचा सकेगा...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 02 जून : उनको अगले चुनाव में भी कोई नहीं बचा सकेगा...
Date : 02-Jun-2019

जो लोग पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के वीडियो देखते हैं, वे इस बात पर हैरान होते हैं कि उन्हें इतना गुस्सा आखिर आता किस बात का है? पहले वे कांग्रेस में थीं, और वहां से छोड़कर निकलीं, नई पार्टी बनाई, तो कांग्रेस से एक वक्त उनका गुस्सा जायज था, और उसके बाद तो वे कांग्रेस से आमने-सामने चुनावी मैदान में रहती हैं। फिर पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में उनका मुकाबला वामपंथियों से था, और विधानसभा चुनाव में वामपंथ की 33 बरस चली सरकार को हराकर वे सत्ता में आईं, और तब से अब तक 9 बरस से मुख्यमंत्री हैं। इसके बाद उनका मुकाबला भाजपा से शुरू हुआ जो कि बड़ी उम्मीदों के साथ बंगाल के लोकसभा चुनाव में उतरी, और खासी सीटें छीनकर ले गई। ममता का झगड़ा सुप्रीम कोर्ट से भी चलता है, हाईकोर्ट से भी, और सीबीआई से भी। उनका झगड़ा अब बढ़ते-बढ़ते सार्वजनिक जगहों पर उन्हें चिढ़ाने के लिए जयश्रीराम के नारे लगाने वालों से भी शुरू हो गया है, और उनकी कमजोरी अच्छी तरह जान-समझकर लोग उन्हें भड़काते और उकसाते हैं, और वे ठीक उसी तरह नाराजगी में लात मारने लगती हैं, जिस तरह एक वक्त प्रणब मुखर्जी ने बंगाल के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मारी थीं, और तस्वीरों में कैद भी हुए थे। 

बंगाल में भाजपा को उम्मीद से अधिक लोकसभा सीटें मिलने के पीछे ममता का मिजाज भी एक वजह रहा, और बिना मोदी के प्रशंसक हुए भी ममता का बदमिजाज देखकर लोगों ने मोदी को वोट दिया। लेकिन दूसरे भी अलग-अलग राज्य हैं, जहां भाजपा, नरेन्द्र मोदी, या एनडीए से हारने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों को यह सोचने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ, जो कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के कांग्रेसी-पंजाब में नहीं हुआ? हर राज्य की अलग-अलग बातें रहीं, और न सिर्फ कांग्रेस को बल्कि एनडीए-विरोधी तमाम बाकी पार्टियों, और क्षेत्रीय दलों को भी यह सोचने की जरूरत है कि क्या मोदी को कोसने से उनका कुछ भला होने जा रहा है, या फिर वे अपनी कमजोरियों को भी देखने का हौसला जुटा पाएंगे? बिहार को देखें, तो कांग्रेस और लालू की पार्टी राजद के बीच वहां एक मजबूत गठबंधन था। कांग्रेस को तो पूरे देश में कहीं भी अधिक समर्थन नहीं मिला, लेकिन नीतीश-सरकार के खिलाफ बिहार में लगातार अभियान चलाने वाले तेजस्वी यादव को जनता का साथ क्यों नहीं मिला? भ्रष्टाचार की कैद काट रहे लालू यादव को कायदे से तो जनता की हमदर्दी मिलनी चाहिए थी कि बुढ़ापे में और खराब सेहत में वे जेल में हैं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क्या तेजस्वी को यह भी सोचना चाहिए कि भाईयों के बीच का झगड़ा जिस तरह सतह पर कचरे की तरह तैरते रहा, क्या उससे भी कोई नुकसान हुआ? या टिकटें देने में गलत फैसले हुए? ऐसी कई बातें उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा को भी सोचनी चाहिए, और कांग्रेस को भी जिसने कि वहां इस गठबंधन से कोई भी तालमेल नहीं रखा। कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर तो आत्ममंथन करना ही है, आत्मविश्लेषण करना ही है, अलग-अलग राज्यों में उसे यह भी सोचना चाहिए कि स्थानीय समीकरणों में कहां क्या गड़बड़ी रह गई, या हो गई? जिन तीन राज्यों, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने के बाद इस रफ्तार से अलोकप्रिय हुई कि छत्तीसगढ़ में वह तकरीबन पिछले लोकसभा नतीजों तक पहुंच गई, मध्यप्रदेश में पिछले से बुरी हालत में आ गई, और राजस्थान में वह शून्य की शून्य रही। क्या कांग्रेस को इन तीनों राज्यों में खास गौर करने की जरूरत नहीं है? या फिर नाकामयाबी का घड़ा फोडऩे के लिए चूंकि राहुल गांधी ने अपना सिर पेश कर दिया है, इसलिए इन तीनों राज्यों की कांग्रेस जवाबदेही से अपने को परे मान ले? 

ऐसी हालत बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियों की बहुत से राज्यों में है। आन्ध्र में चन्द्राबाबू नायडू जिस अंदाज में पूरे देश में गैरएनडीए, गैरकांग्रेस सरकार बनाने की एक महत्वाकांक्षी मुहिम चला रहे थे, वह अंदाज धरे का धरा रह गया, और वे राज्य के चुनाव को भी खो बैठे, सरकार से चले गए, और दिल्ली में सरकार बनाने के लिए उनकी पहल की कोई जरूरत भी नहीं पड़ी। उनको भी बहुत बारीकी से अपनी असफलता की वजहें ढूंढनी चाहिए। और ऐसा महज एनडीए-विरोधियों के लिए जरूरी नहीं है, पंजाब में एनडीए के लिए भी जरूरी है कि मोदी नाम की सुनामी पंजाब की सरहदों पर पहुंचकर सहम क्यों गई? जो लोग राष्ट्रवादी उन्माद और मोदी के राष्ट्रपतीय चुनावी अंदाज को तोहमत देकर अपने आपको नाकामयाबी के दाग से बचाने में लगे हैं, उनको अगले चुनाव में भी कोई नहीं बचा सकेगा।
-सुनील कुमार

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