विचार / लेख

  नव्य-ब्राह्मणवाद और मोदी विजय
नव्य-ब्राह्मणवाद और मोदी विजय
Date : 03-Jun-2019

जगदीश्वर चतुर्वेदी

जो लोग कहते हैं कि भारत में जाति का आधार खत्म हो गया वे यह भूल जाते हैं कि जाति का क्षय मध्यवर्ग के बहुत छोटे से हिस्से में हुआ । भारत में पूंजीवादी विकास का जो मॉडल लागू किया गया वह जातिप्रथा और उसकी सामाजिक संरचनाओं को तोडऩे में पूरी तरह असफल रहा है। आमतौर पर यह माना जाता है कि पूंजीवाद के विकास के साथ वर्गीय संरचनाएं जन्म लेती हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ। काशीराम फिनोमिना ने वर्गीय संगठनों और उनकी राजनीति को भी अस्त-व्यस्त किया। 

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को सन् 2019 में प्रचंड बहुमत मिला,साथ ही उसके मतों में इजाफा हुआ। यह सब ऐसी अवस्था में हुआ जबकि नोटबंदी,जीएसटी आदि ने समूची अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त किया। भारत में बेरोजगारी अपने चरम पर है और सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोध मुखर हैं, इसके बावजूद भाजपा को सफलता मिली। मोदी की जीत में जाति के नए उभार और नए समीकरणों की केन्द्रीय भूमिका है। इस जीत ने जाति और जातिवाद से जुड़ी बहस को फिर से केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है। 
यह सच है जातियों का समाज में अस्तित्व है,उनके अपने संस्कार,रिवाज, परंपराएं और आदतें भी हैं,उनके पास स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक का नेतृत्व है। उनकी इन संरचनाओं का विभिन्न गैर- वाम विचारधाराएं दोहन करती रही हैं। सन 1974-75 से जातियों के उभार का नया दौर आरंभ होता है, यही वह समय है जब समूचे देश में कांग्रेस विरोधी आंदोलन उठे। जनतांत्रिक आंदोलन के समय ही समानान्तर जाति के उभार ने अनेक नई चुनौतियों को जन्म दिया। जाति के नाम पर विभिन्न किस्म के संगठनों का तेजी से 1975-76 में हिन्दी भाषी राज्यों में उदय हुआ। 
इस जातिगत उभार की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसने नए ढ़ंग से अ-सवर्ण जातियों को छोटे-छोटे समूहों में एकजुट किया, इसके लिए हर स्तर छोटे-छोटे मंदिर, बाबा और संतों का उदय हुआ। छोटे कस्बों से लेकर गांवों तक अ-सवर्ण जातियों के संतों-बाबाओं का नैटवर्क बड़े पैमाने पर सामने आया, इसके समानांतर सवर्ण संतों की नई पीढ़ी भी सामने आई,इन संतों और बाबाओं ने निचले स्तर पर जातिवाद के लिए परंपरागत वैचारिक रसायन तैयार किया। इसके समानांतर जाति की राजनीति का उदय हुआ। काशीराम फिनोमिना उसका एक उदाहरण मात्र है।
जो लोग कहते हैं कि भारत में जाति का आधार खत्म हो गया वे यह भूल जाते हैं कि जाति का क्षय मध्यवर्ग के बहुत छोटे से हिस्से में हुआ । भारत में पूंजीवादी विकास का जो मॉडल लागू किया गया वह जातिप्रथा और उसकी सामाजिक संरचनाओं को तोडऩे में पूरी तरह असफल रहा है। आमतौर पर यह माना जाता है कि पूंजीवाद के विकास के साथ वर्गीय संरचनाएं जन्म लेती हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ। काशीराम फिनोमिना ने वर्गीय संगठनों और उनकी राजनीति को भी अस्त-व्यस्त किया। यह वो परिप्रेक्ष्य है जिसकी रोशनी में जाति के नाम पर पैदा हुए उभार और उसके साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा किए गए इस्तेमाल के सवालों पर विचार करने की जरूरत है। 
इण्डियन एक्सप्रेस ( 25 मई2019) में क्रिस्टोफर जेफरलोट और गिली वर्नियर का इन हिंदी हार्टलैंड,अपर कास्ट्स डोमिनेट न्यू हाउस शीर्षक से लोकसभा चुनाव विश्लेषण छपा है। यह विश्लेषण मूलत: हिंदी भाषी क्षेत्र तक सीमित है। इस विश्लेषण में जिस तथ्य की ओर ध्यान खींचा गया है वह है जातिवार संसद में प्रतिनिधित्व। जातिवार संसद में प्रतिनिधित्व के आधार पर लेखकद्वय ने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि संसद में सवर्णों का वर्चस्व बढ़ा है। खासकर भाजपा के सवर्ण सांसदों की संख्या में इजाफा हुआ है। 
भाजपा में ब्राह्मण सांसदों की संख्या सन् 2009 में 30 फीसदी थी जो सन 2014 में बढक़र 38.5 फीसदी हो गई। उच्च जातियों में राजपूत सांसदों का प्रतिनिधित्व इस दौर में कम हुआ। इस कमी का प्रधान कारण है भाजपा द्वारा राजपूतों की टिकट संख्या में कटौती। हिन्दी भाषी क्षेत्र में भाजपा ने अपने 199 उम्मीदवारों में 37 ब्राह्मण और 30 राजपूतों को टिकट दिए , इनमें 33 ब्राह्मण और 27 राजपूत विजयी रहे।
इसी तरह अदर ओबीसी जातियों में भाजपा के सांसदों की संख्या 23 फीसदी से बढक़र 31 फीसदी हो गई। वहीं दूसरी ओर ओबीसी जातियों में भाजपा सांसदों का प्रतिशत सन 2009 में 29 फीसदी था जो 2019 में गिरकर 16 फीसदी रह गया। आंकड़े बताते हैं कि भाजपा के हिंदी क्षेत्र में खड़े किए 199 उम्मीदवारों में सिर्फ 7 यादव थे जिनमें 6जीते,42 ओबीसी उम्मीदवारों में कुर्मियों की संख्या ज्यादा थी,इस केटेगरी में 8 उम्मीदवार खड़े किए गए जिनमें से 7जीते हैं। दलित जातियों में भाजपा ने 35 उम्मीदवार खड़े किए, इनमें 3 जाटव थे, पांच पासी, (इनमें चार जीते), इसके विपरीत महागठबंधन ने 78 उम्मीदवारों में 10 जाटव और इतने ही यादव उम्मीदवार खड़े किए । जाट सांसदों की संख्या पहले जैसी थी इसबार भी वही बनी रही, सन् 2014 में 15 जाट खड़े हुए उनमें 14 जीते थे। ये सभी भाजपा टिकट पर जीते थे। 
भाजपा ने सन 2019 के लोकसभा चुनाव में 436 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, इनमें 303 सीटों पर उसके उम्मीदवारों को औसतन 6 लाख 35 हजार वोट मिले। यूपी में भाजपा ने 80 में 78 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, इनमें उसने 62 सीटें जीतीं, बाकी 16 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही। यूपी में महागठबंधन के मुकाबले चालीस से अधिक सीटों पर पचास फीसदी से अधिक वोट मिले, इसने एसपी-बीएसपी के जाति समीकरण की गणित को धराशायी कर दिया। इसबार के चुनाव में भाजपा को उसके द्वारा लड़ी गयी हरेक 4 में से तीन सीटों पर पचास फीसदी से अधिक वोट मिले हैं। 
आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि भाजपा ने उच्च जातियों 139 उम्मीदवार खड़े किए जिनमें से 105 जीते,उसी तरह मध्यवर्ती जातियों के 63 उम्मीदवार खड़े किए जिनमें से 46जीते। ओबीसी के 75 उम्मीदवार खड़े किए जिनमें से 56 जीते, अनुसूचित जाति के 69 उम्मीदवार खड़े किए जिनमें से 51 जीते, अनुसूचित जनजाति के 50 उम्मीदवार खड़े किए और उनमें से 37 जीते,आठ मुसलिम खड़े किए उनमें से 2 जीते,अन्य जातियों के 5 उम्मीदवार खड़े किए उनमें से2 जीते।जिन उम्मीदवारों की जाति की पहचान न हो सकी, वैसे उम्मीदवारों की संख्या 26 है , उनमें से मात्र तीन उम्मीदवार लोकसभा का चुनाव जीते। इस समूचे विश्लेषण के आधार पर क्रिस्टोफर वर्नियर ने रेखांकित किया है कि सन 2019 के चुनाव में सवर्ण जातियों के वर्चस्व बरकरार रहा, यह वर्चस्व सन् 1989 से चला आ रहा है। 
सन 1989 से 2019 तक के आंकड़े एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान खींचते हैं। सन् 1989 में भाजपा को उच्चजातियों में 50.8 फीसदी सीटें मिली थीं, जो सन 2014 में घटकर 45.5 फीसदी ,सन 2019 में 44.9 फीसदी रह गईं। इसी तरह सन 1989 में मध्यवर्ती जातियों में 3.2फीसदी सीटें मिलीं जो सन् 2019 में बढक़र 7.9 फीसदी हो गईं।  भाजपा को ओबीसी की सन् 1989 में15.9 फीसदी सीटें मिलीं जो सन् 2019 में बढक़र 19.7 फीसदी हो गईं, सन् 1989 में अनुसूचित जाति की 15.9 फीसदी सीटें मिली थीं जो सन् 2019 में बढक़र 18.5 फीसदी हो गईं, अनुसूचित जनजाति की सन् 1989 में 11.1 फीसदी सीटें मिली थीं जो सन् 2019 में घटकर 8.4 फीसदी रह गयीं, सन् 1989 में भाजपा को मुसलमानों की 1.6 फीसदी सीटें मिली थीं जो सन् 2019 में घटकर 0.6 फीसदी रह गयीं। इस विश्लेषण का समग्र स्वरूप तब सामने आता है जब क्षेत्रीय दलों की जातिवार स्थिति पर नजर डाली जाय। 
क्षेत्रीय दलों को उच्च जातियों की सन् 1989 में 30.9 फीसदी सीटें मिली थीं जो सन् 2019 में घटकर 17.5 फीसद रह गईं, सन् 1989 में उनको मध्यवर्ती जातियों में 12.2 फीसद सीटें मिलीं , जो सन् 2019 में घटकर 0.0 फीसदी रह गयीं,सन् 1989 में क्षेत्रीय दलों की ओबीसी सीटों का फीसदी 26.0 फीसद था जो सन्  2019 में बढक़र 40.0 फीसदी हो गया। 
अनुसूचित जातियों की सन् 1989 में 18.7 फीसदी सीटें क्षेत्रीयदलों ने जीतीं,जबकि सन् 2019 में यह आंकड़ा बढक़र 20.0 फीसदी हो गया। इसी तरह क्षेत्रीय दलों द्वारा जीती अनुसूचित जनजाति की सीटों का आंकड़ा सन् 1989 में 3.3 फीसदी थी जो सन् 2019 में घटकर 2.5 फीसदी रह गया। क्षेत्रीय दलों को सन् 1989 में 8.1 फीसदी सीटें मिलीं,यह समख्या 2019 में बढक़र 17.5 फीसदी हो गई।
समग्रता में सन् 1989 से लेकर 2019 के बीच में संसद की स्थिति देखें तो जातिवार स्थिति कुछ इस तरह उभरकर सामने आई है। सन् 1989 में उच्च जातियों के उम्मीदवारों ने हिंदी क्षेत्र से 86 सीटें जीतीं,सन् 2019 में यह संख्या बढक़र 88 हो गई।  मध्यवर्ती जातियों ने सन् 1989 में 19 सीटें जीती थीं जो सन् 2019 में घटकर 14 रह गई, ओबीसी के सन् 1989 में 46 सांसद थे जो सन् 2019 में बढक़र 53 हो गए। अनुसूचित जाति के सन् 1989 में 41 सांसद थे जो 2019 में 41 ही रहे,अनुसूचित जनजाति के सन् 1989 में 18 सांसद थे जो सन् 2019 में 18 ही रहे। मुसलमानों के पास सन् 1989 में 14 सीटें थीं जो 2019 में घटकर 9 रह गईं। एक सीट अन्य को मिली और दो की जाति को पहचान नहीं पाए। यह आंकड़े समग्रता में भारत के लोकतंत्र में जातियों की सक्रिय भागीदारी का आख्यान बनाते हैं।इस आख्यान की विभिन्न राज्यों में अलग-अलग लघु कथाएं हैं। 
असल में उपरोक्त समूचा आख्यान नव्य-ब्राह्मणवाद के आगमन की सूचना दे रहा है। यह पुराने ब्राह्मणवाद से बुनियादी तौर पर भिन्न है। नव्य-ब्राह्मणवाद का विगत बीस सालों में साम्प्रदायिकता के साथ सहमेल विकसित हुआ है, उसने नए किस्म की वैचारिक खुराक जुगाड की है। इसमें जहां एक ओर सवर्ण वर्चस्व है,वहीं दूसरी ओर फंडामेंटलिज्म और पृथकतावादी वैचारिक संरचनाएं सक्रिय हैं। ये सारी चीजें मिलकर एक नए डिजिटल, सामाजिक, राजनीतिक विमर्श को निर्मित कर रही हैं।इस विमर्श का बुनियादी लक्ष्य है समाज के प्रासंगिक सवालों से आम जनता को विरत करना, देश और राजनीति को वायवीय बनाना, फलत: लोकतंत्र,लोकतांत्रिक अधिकार और लोकतांत्रिक चेतना में तेजी से गिरावट आई है।  लोकतंत्र के प्रति आलोचनात्मक संबंध की बजाय संवेदनात्मक संबंध बना है,इस संबंध को अंत में इंस्टिंक्ट के साथ जोड़ दिया गया,अब राजनीति में विवेक और तथ्य महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि सहजजात संवेदना की महत्वपूर्ण भूमिका हो गई है। यही वजह है लोकतंत्र का पर्याय सहमति और भावनाएं हो गई हैं, जबकि लोकतंत्र का पर्याय विवेक और असहमति हुआ करता था।

 

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