संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  3 जून : दारू के धंधे से ऐसा संगठित भ्रष्टाचार मिटाने की जरूरत
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 जून : दारू के धंधे से ऐसा संगठित भ्रष्टाचार मिटाने की जरूरत
Date : 03-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी शराबबंदी का वायदा करके सत्ता में आई, लेकिन सरकार में आते ही उसने यह कहना शुरू कर दिया कि यह वायदा पांच बरस में पूरा करना है और ऐसे बड़े किसी फैसले पर रातों-रात अमल नहीं हो सकता। कुल मिलाकर जो सिलसिला रमन सरकार में चल रहा था, वही जारी है, शराब की तमाम खरीदी और तमाम बिक्री का जो सरकारीकरण रमन सरकार ने आखिरी दो बरस में किया था, वह जारी है। प्रदेश के तमाम अखबार इन खबरों से भरे पड़े हैं कि सरकारी शराब दुकानों से किस कदर अधिक वसूली करके ही शराब बेची जा रही है, किस कदर कुछ चुनिंदा ब्रांड ही दुकानों में रखे जा रहे हैं। मतलब यह कि शराब के कारोबार में जो भयानक भ्रष्टाचार रमन सरकार में चल रहा था, वह अभी भी जारी है। 

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को देखें तो यहां शराब या बीयर बनाने के लिए कारखाने का लायसेंस सरकार देती है। किसी भी दूसरे कारखाने को शुरू करने का ऐसा कोई लायसेंस नहीं लगता, लेकिन शराब पर राजनीति और सरकार का मजबूत शिकंजा नेताओं और अफसरों को माकूल बैठता है क्योंकि उससे मोटी उगाही की गुंजाइश रहती है। चूंकि शराब पीने वाले समाज में बुरी नजरों से देखे जाते हैं, इसलिए उनकी किसी तकलीफ या उनके किसी नुकसान पर किसी चर्चा की जरूरत भी नहीं समझी जाती। शराब न पीने वाले लोग यह मानकर खुश हो लेते हैं कि दारू महंगी होगी तो लोगों का पीना कम होगा, और समाज में गंदगी कम होगी। लेकिन ऐसा होता नहीं है जिसे जितनी शराब पीनी रहती है वे अपने घर की दूसरी कटौतियां करके भी उतनी शराब पी ही लेते हैं। ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि शराब के धंधे में ऐसी क्या खूबी है कि सरकार उसके किसी भी पहलू को अपने शिकंजे से जरा भी फिसलने देना नहीं चाहती? 

प्रदेश में खाने-पीने के सामान बनाने वाले बहुत से कारखाने हैं, दूध की डेयरियां हैं, आईस्क्रीम बनाने के कारखाने हैं, लेकिन किसी को भी सरकार इस तरह बांधकर नहीं रखती जिस तरह शराब कारखानों को कब्जे में रखती है। रमन सरकार के पिछले पन्द्रह बरसों में भी लगातार यह बात सामने आई कि सरकार के पसंदीदा दारू कारखानेदार कौन से हैं जिन्हें तमाम किस्म की छूट मिलती हैं, और सरकार के निशाने पर कौन हैं जिनके सबसे अच्छे दारू कारखानों को भी बार-बार बंद करवा दिया जाता था। और यह बात किसी रहस्य की तरह नहीं थी, राजनीति और मीडिया, सरकार और कारोबार के तमाम लोगों को यह पता होता था कि सरकार के चहेते दारूवाले कौन से हैं। तकरीबन वही सिलसिला इस सरकार में भी जारी है, और चेहरे जरूर बदल गए हैं, लेकिन सरकार से नफा या नुकसान होना उसी तरह जारी है।

इसके बाद सरकार ने पूरे प्रदेश के लिए दारू की खरीदी अपने हाथ में ले ली है। यह सिलसिला रमन सरकार के समय चला, और यह एक बहुत बड़े संगठित भ्रष्टाचार का जरिया बन गया। लोगों को यह मालूम है कि शराब कंपनियां सरकार के ब्रेवरेजेस कॉर्पोरेशन में अपने ब्रांड रजिस्टर करवाने से लेकर दुकानों में अपने ब्रांड पहुंचाने तक किस तरह रिश्वत देकर ही काम करवा सकते हैं। रमन सरकार के कार्यकाल में ब्रेवरेजेस कॉर्पोरेशन सैकड़ों-हजारों करोड़ रूपए साल के भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका था, और वह अब भी जारी है। शराब परोसने वाले बार को लेकर सरकार ने नियमों का ऐसा जाल बिछा रखा है कि जब जिस बार मालिक से नाराजगी हो, उसका टेंटुआ दबाया जा सकता है, और जिसे छूट देनी हो, उसे भरपूर कमाई का मौका भी दिया जा सकता है। अब रमन सरकार ने आखिरी के दो बरस में शराब की चिल्हर बिक्री का सरकारीकरण कर दिया, तो सरकार एक संगठित अपराधी की तरह इस धंधे के हर हिस्से पर पूरी तरह काबिज हो गई, और लोग आज अपनी मर्जी का कोई ब्रांड पाने का हक भी नहीं रखते क्योंकि किस कंपनी से कितना माल खरीदना है, इसे सरकार अपनी रहस्यमय मर्जी से तय करती है। इस पूरे भ्रष्टाचार का एक भी पहलू ऐसा नहीं है जो कि मौजूदा कांग्रेस सरकार ने शुरू किया हो, यह सारा संगठित भ्रष्टाचार रमन सरकार के दौरान शोषण के एक फौलादी ढांचे की तरह कायम हो चुका था, और वह पटरी पर दौड़ती हुई ट्रेन की तरह अभी भी चले आ रहा है।

दुनिया के किसी भी सभ्य लोकतंत्र में शराब को कानूनों से ऐसे बांधकर नहीं रखा जाता जो कि सिर्फ भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं। आज पूरे प्रदेश में लोग साधारण तरीके से शराब की दुकानें खोल लें, जिस तरह साबुन-तेल के ब्रांड दुकानदार ग्राहक की मर्जी से रखते हैं, उसी तरह शराब ग्राहक की मर्जी से रखें, आज दुकानों पर सारे वक्त जिस तरह मारपीट की नौबत रहती है, जिस तरह अतिरिक्त दाम वसूल करके ही शराब बेची जाती है, वह सारा सिलसिला पल भर में खत्म किया जा सकता है। सरकार घोषित रूप से शराब के धंधे से जितना टैक्स वसूल करती है, वह पूरा का पूरा शराब की बिक्री पर लादा जा सकता है, और घोषित टैक्स तो उतने का उतना वसूल किया जा सकता है, अघोषित टैक्स खत्म हो जाएगा, और शराब के दाम भी शायद आधे रह जाएंगे, या टैक्स दुगुना वसूल हो सकेगा। राजनीतिक दल भारी बदनामी झेलते हुए भी जिस तरह शराब की काली कमाई का मोह छोड़ नहीं पाते वह बहुत तकलीफदेह बात है। लोकतंत्र में ऐसे संगठित भ्रष्टाचार को खत्म करना जरूरी है। देश में ही कई ऐसे राज्य हैं जहां पर शराब को लेकर राज्य सरकार की नीति और नियम आसान हैं, और वहां ग्राहकों को इस तरह लूटा नहीं जाता, सड़कों पर ऐसी बदअमनी नहीं दिखती। छत्तीसगढ़ सरकार को शराबबंदी लागू होने तक, या न करना हो तो अपने वायदे को भूलकर भी, शराब के कारोबार से संगठित भ्रष्टाचार खत्म करना चाहिए, उससे सरकार का टैक्स बढ़ेगा, लोगों को मर्जी की शराब पाने का बुनियादी हक मिलेगा, और दाम घटेंगे। इतना बड़ा संगठित राजनीतिक भ्रष्टाचार लोकतंत्र के लिए भी ठीक नहीं है। पिछली रमन सरकार में भी यही बात सामने आई थी, और उसके लगभग पूरे कार्यकाल में जो अफसर इस पूरी आपराधिक साजिश पर अमल करवा रहा था, वह आज भी इस नई सरकार की जांच एजेंसियों से फरार है। अगर दारू के धंधे में पिछली सरकार के ही सारे के सारे तौर-तरीके अभी भी जारी हैं, तो फर्क क्या हुआ? 
-सुनील कुमार

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