संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  05 जून : पर्यावरण पर कतरा-कतरा दो-चार जरूरी बातें...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 05 जून : पर्यावरण पर कतरा-कतरा दो-चार जरूरी बातें...
Date : 05-Jun-2019

आज विश्व पर्यावरण दिवस पर सोशल मीडिया लोगों की पोस्ट से भरा हुआ है, और सरकारों की ओर से भी जगह-जगह कुछ आयोजन होंगे, कुछ भाषण होंगे। यह एक दिन आ चुका है, और कुछ घंटों के बाद चला भी जाएगा, लेकिन जिन मुद्दों पर ध्यान जाना चाहिए, वे नारों में जगह पाकर ही चल बसते हैं। छत्तीसगढ़ के अखबार ऐसी तस्वीरों और खबरों से भरे पड़े हैं कि पेड़ लगाने के नाम पर सरकार और स्थानीय संस्थाओं ने पैसों की जो बर्बादी की है, उसके सुबूत सड़कों के बीच और सड़कों के किनारे सूखकर खड़े हुए हैं। यह तो बात शहरों के बीच की हुई, लेकिन दूसरी तरफ जहां घने जंगल रहते हैं, जहां से पेड़ काटे जाते हैं, जिनकी जगह पेड़ और जंगल लगाने की कानूनी बंदिश सुप्रीम कोर्ट ने लादी है, उसका भी बुरा हाल है। कहने के लिए तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पेड़ कटाई के लिए वसूला गया मुआवजा खर्च किया जाता है ताकि कई गुना पेड़ लग सकें, लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पिछले बरसों में आए ऐसे सैकड़ों करोड़ रूपए का कैम्पा नाम का फंड सरकार ने अपने जेब खर्च की तरह इस्तेमाल किया, और मंत्री-मुख्यमंत्री, बड़े अफसरों ने पेड़ लगाने के बजाय इस मद से तमाम दूसरे किस्म के खर्च किए। जांच को बड़ी अहमियत देने वाली छत्तीसगढ़ की मौजूदा कांग्रेस सरकार को चाहिए कि पिछले बरसों के कैम्पा फंड के खर्च की जांच करा ले, तो नतीजों से सुप्रीम कोर्ट भी हक्का-बक्का रह जाएगा कि वह पेड़ कटाई की जगह किस तरह के कामों पर खर्च के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए दे रहा है। 

लेकिन पर्यावरण अकेले सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, और समाज के लोगों को भी इसके बारे में सोचना चाहिए। आज ही किसी ने सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि एक जोड़ी कपड़े प्रेस करने के लिए कितनी बिजली खर्च होती है। और बिजली तो पर्यावरण को सीधे-सीधे नुकसान पहुंचाकर ही बनती है। इसलिए लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि बिल पटाने की ताकत रहते हुए भी किस तरह बिजली इस्तेमाल में किफायत बरती जा सकती है, गाडिय़ों के इस्तेमाल में किफायत बरती जा सकती है। लोग यह भी सोच सकते हैं कि रोज के इस्तेमाल के साबुन-शैम्पू, टूथपेस्ट या दूसरे रसायन के इस्तेमाल में कैसे थोड़ी-थोड़ी सी कटौती हो सकती है जो कि कुल मिलाकर धरती को बचा सके। आम और खास लोगों के सोचने की एक बात यह भी हो सकती है कि प्रकृति से भिड़ते हुए कुछ खास किस्म के पेड़-पौधे और घास लगाना क्या सचमुच समझदारी है? लोग घास सींचने के लिए भारी पानी खर्च करते हैं, और उससे धरती को, पर्यावरण को कुछ भी हासिल नहीं होता। लोग छतों पर पौधे लगाते हैं, और उन्हें बचाने के लिए भारी संघर्ष करते हैं, और उससे पर्यावरण को कुछ नहीं मिलता। दूसरी तरफ निजी और सार्वजनिक सभी किस्म की जगहों पर स्थानीय मिजाज के देशी पेड़ों को लगाकर शुरू के कुछ बरस बचा दिया जाए, तो वे सौ-पचास बरस तक पर्यावरण का ख्याल रखते हैं, और इंसान की जिंदगी आरामदेह बनाते हैं। 

सरकार में पर्यावरण दिवस मनाने का हक महज उन्हें रहना चाहिए जो कि जनता के पैसों से अंधाधुंध बड़े घर-दफ्तर का इस्तेमाल न करके, बिजली और बाकी सामानों की बचत करते हैं। आज भी छत्तीसगढ़ की राजधानी में सैकड़ों करोड़ रूपए की लागत से मंत्रियों के बंगले बनने जा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस सरकार ने पिछली सरकार के किए गए फिजूलखर्ची के इस फैसले पर दुबारा नहीं सोचा है कि कैसे किफायत से छोटे मकान बनाए जाएं, और उस जनता पर बोझ न डाला जाए जो कि रियायती चावल की वजह से दो वक्त का खा पा रही है। ऐसे बड़े मकान पहले तो बनने में भी पर्यावरण बर्बाद करते हैं, और फिर रख-रखाव में भारी बिजली-पानी खर्च होता है जो कि कुल मिलाकर जनता की जेब से ही जाता है। मौजूदा सरकार इस प्रदेश की जिंदगी में शायद आखिरी सरकार होगी जो कि आज डिजाइन के स्तर पर ही इस फिजूलखर्ची को रोक सके। गांधी की कही जाने वाली इस पार्टी को सरकारी शान-शौकत खत्म करने के इस मौके को नहीं छोडऩा चाहिए। 

लगे हाथों एक और पहलू पर एक बात हो जाए, शहरी म्युनिसिपल जहां-जहां हैं, उनके पास कचरे को संगठित रूप से घरों से ही अलग करवाकर इक_ा करने, और फिर पूरे कचरे के निपटारे की एक संभावना है। इसी देश में दक्षिण के कुछ शहरों ने बड़ी कामयाबी से ऐसा कर दिखाया है, और शहरी कचरे से कमाई भी की है। खुद छत्तीसगढ़ में अंबिकापुर जिला मुख्यालय में बड़ी कामयाबी से महिलाओं को जोड़कर कचरे का ऐसा निपटारा साबित कर दिखाया गया है जिससे धरती पर बोझ नहीं बढ़ रहा। इस प्रदेश और बाकी देश के म्युनिसिपलों को कचरे के महंगे निपटारे का सिलसिला खत्म करना चाहिए, हालांकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश वाला यह काम खत्म करना नेताओं और अफसरों को पसंद नहीं आएगा। लोगों को कचरे के निपटारे की जिम्मेदारी इस हद तक मुक्त नहीं कर देना चाहिए कि शहर सैकड़ों करोड़ रूपए साल खर्च करने और बोझ बढ़ाने का काम करें। जनभागीदारी से कचरे की घर पर ही छंटाई, और उसके पूरी तरह निपटारे के कामयाब मॉडल इसी देश में मौजूद हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहरों की म्युनिसिपल की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। 

शहरीकरण, बिजली, पंप, और सहूलियत की वजह से इंसानों में पानी की खपत इतनी बढ़ती जा रही है कि धरती के भीतर का पानी खत्म होने की कगार पर है। हम बरसों से इसी जगह यह सलाह देते आए हैं कि बारिश में नदियों तक पहुंचने वाले पानी को जगह-जगह रोककर धरती के भीतर पानी की री-चार्जिंग को तेजी से बढ़ाना चाहिए जिससे बाढ़ भी रूकेगी, समंदर का जलस्तर भी बढऩे से रूकेगा, और धरती के भीतर गिरता हुआ जलस्तर सम्हलेगा। आज दिक्कत यह है कि सरकार जब भी कोई तालाब खुदवाने की बात करती है, तो उसके सामने गांव के इंसानों और जानवरों की निस्तारी की जरूरत रहना जरूरी रहता है, और दूसरी तरफ ऐसी खुदाई से इंसानों को रोजगार मिलना भी जरूरी रहता है। इन दोनों प्राथमिकताओं के चलते धरती कहीं भी प्राथमिकता में नहीं रह गई है। होना तो यह चाहिए कि तेजी से खुदाई करने वाली मशीनों से ऐसी जगहों पर भी तालाब खोदे जाएं जो चाहे आबादी से दूर हों, इंसानों के काम के न हों, लेकिन जो नदियों तक जाने वाले बारिश के अतिरिक्त-पानी से भरे जा सकें, और जिससे धरती के जलभंडार भर सकें। धरती की जरूरत को आज इसलिए अनदेखा किया जाता है कि धरती वोटर नहीं है, और इंसान वोटर हैं। बड़े पैमाने पर भूजल बढ़ाने के लिए रोजगार से परे बड़ी मशीनों से बड़े-बड़े तालाब अगर नहीं बनाए जाएंगे, तो बाढ़ में जाने वाले पानी को बचाना नहीं हो पाएगा। 

पर्यावरण को बचाना एक फर्जी नारा है, इंसान पर्यावरण नहीं बचाते, पर्यावरण इंसानों को बचाता है। इसलिए लोगों को अपनी आत्मरक्षा के लिए अपने इर्द-गिर्द किफायत, सुधार, और बेहतरी की कोशिश करनी चाहिए, और लापरवाह सरकारों, लापरवाह म्युनिसिपलों से सार्वजनिक मंचों पर सवाल करने चाहिए।
-सुनील कुमार

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