संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 09 जून : मरीजों को डॉक्टर नसीब नहीं, और फाईलों पर डॉक्टर तैनात
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 09 जून : मरीजों को डॉक्टर नसीब नहीं, और फाईलों पर डॉक्टर तैनात
Date : 09-Jun-2019

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने कहा है कि सरकारी अस्पतालों का मैनेजमेंट सम्हालने के लिए अलग से मैनेजर या सीपीओ रखे जाएंगे। अभी सभी किस्म के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों का गैरमेडिकल मैनेजमेंट भी डॉक्टर ही देखते हैं, और उनकी डॉक्टरी धरी रह जाती है। इतना ही नहीं बहुत से दूसरे दफ्तरों में भी फाईलों का काम निपटाने के लिए डॉक्टरों को जिम्मा दिया जाता है जिसमें उनका मेडिकल हुनर किसी काम का नहीं रहता। इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं, और अस्पतालों के साथ-साथ सरकारी कॉलेजों का यही हाल है जिनमें वरिष्ठ प्राध्यापक को प्राचार्य बनाने की परंपरा है, और कॉलेज का गैरशिक्षकीय मैनेजमेंट उन्हें देखना पड़ता है। पुलिस के छोटे-बड़े कई किस्म के कर्मचारियों-अधिकारियों को भी गैरपुलिसिया काम में लगाया जाता है, और यह सिलसिला तुरंत खत्म भी होना चाहिए। 

छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल, राजधानी रायपुर के मेकाहारा में हर दिन हजारों मरीज पहुंचते हैं, और यह प्रदेश का सबसे बड़ा कैंसर अस्पताल भी है। कैंसर के बड़े नामी-गिरामी वरिष्ठ चिकित्सक इस अस्पताल के अधीक्षक भी हैं, और उनके सिर पर लिफ्ट बनवाने से लेकर एसी सुधरवाने तक, धोबी और गार्ड का ठेका देने से लेकर दवा खरीदने तक, रंग-पेंट करवाने से लेकर पार्किंग के झगड़े निपटाने तक सौ किस्म के काम रहते हैं। हर महीने दसियों करोड़ रूपए के खर्च और बजट वाला यह अस्पताल चलाना प्रदेश के सबसे बड़े कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर पर एक अतिरिक्त बोझ है। जहां कैंसर मरीजों के लिए डॉक्टर ही काफी नहीं हैं, और मरीजों को लंबी कतार में लगकर इलाज और मौत दोनों का साथ-साथ इंतजार करना पड़ता है, वहां पर उनका विशेषज्ञ डॉक्टर एक ऐसे मैनेजमेंट में लगे रहता है जो कि कोई दूसरा प्रशासकीय अफसर बेहतर तरीके से कर सकता है, और किसी एक अफसर के लिए वह एक फुलटाईम काम से भी अधिक काम रहेगा। 

प्रदेश के तमाम बड़े अस्पतालों और जिला अस्पतालों के लिए अलग से एक प्रशासनिक ढांचा रहना चाहिए। आज सरकारी चिकित्सा सेवा में गांव-गांव तक डॉक्टरों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और जगह-जगह डॉक्टर गैरडॉक्टरी केकाम में लगे हैं। उसी तरह बड़े सरकारी कॉलेजों के लिए प्राध्यापकों से परे का एक मैनेजमेंट होना चाहिए। अगर कोई प्राध्यापक शिक्षा-मैनेजमेंट में जाना चाहते हैं, तो उन्हें आईआईएम जैसे किसी संस्थान से साल-छह महीने का कोई कोर्स करवाना चाहिए, और उसके बाद फिर उन्हें शिक्षा से अलग करके सिर्फ मैनेजमेंट में डालना चाहिए। छत्तीसगढ़ नया राज्य बनने के बाद हालत यह थी कि सरकारी कॉलेजों में जिन विषयों को पढ़ाने वाले बहुत सीमित थे, उनको भी उठाकर मंत्रालय या शिक्षा संचालनालय में रख दिया गया था। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए। 

आज कोई मुख्यमंत्री के बंगले पर पहुंचे, तो वहां रजिस्टर में मुलाकातियों का नाम लिखने का काम भी वर्दीधारी पुलिस करती है। जबकि इस काम में पुलिस का कोई इस्तेमाल नहीं है, और कोई साधारण टाइपिस्ट इस काम को बेहतर तरीके से कर सकते हैं। आन्ध्र में आज से दस-पन्द्रह बरस पहले बड़े शहरों के थानों में कम्प्यूटर पर पुलिस-रिपोर्ट लिखने के लिए पुलिस सेवा से बाहर के टाइपिस्ट रखे गए थे, जो अधिक तेजी से, बेहतर तरीके से कम्प्यूटर पर टाईप कर सकते थे। जिस काम में पुलिस के प्रशिक्षण की जरूरत न हो, वहां पर दूसरे हुनर के लोगों को रखा गया था। छत्तीसगढ़ में हम देखते हैं कि पुलिस अफसरों के घर-दफ्तर में चाय पिलाने का काम भी सिपाही करते हैं, दूसरी सौ किस्म की बेगारी भी सिपाही करते हैं। इनमें से किसी भी काम के लिए पुलिस के प्रशिक्षण, और इतनी तनख्वाह वाले कर्मचारियों की जरूरत नहीं रहती है। आम अर्दली जिस काम को कर सकते हैं, उसका पद शायद न रहने पर  उस काम में प्रशिक्षित पुलिस को झोंक दिया जाता है जो कि सरकारी साधन और क्षमता का निहायत बेजा इस्तेमाल है। 

भारत के अधिकतर राज्यों में सरकारी कामकाज पुराने ढर्रे पर चले आ रहा है, और लोग लीक से हटकर नए फैसले लेने की सोचते भी नहीं हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए और सरकार में ऊपर से नीचे तक तमाम कामों के बारे में देखना चाहिए कि लोग अपने बुनियादी काम, अपने बुनियादी हुनर से परे के किसी काम में अगर लगाए गए हैं, किसी काम में अगर उनकी लगातार तैनाती हो रही है, तो उसके लिए तुरंत एक बेहतर ढांचा तैयार करना चाहिए। एक तरफ तो प्रदेश के मरीज इलाज नहीं पा रहे, दूसरी तरफ डॉक्टरों से बाबूगिरी करवाई जा रही है। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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