संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 8 जुलाई : पुलिस के खाली पदों से बचत नहीं, समाज पर पड़ रहा एक बड़ा बोझ
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 8 जुलाई : पुलिस के खाली पदों से बचत नहीं, समाज पर पड़ रहा एक बड़ा बोझ
Date : 08-Jul-2019

केन्द्र सरकार के बताए आंकड़ों के मुताबिक अलग-अलग राज्यों में पुलिस के लाखों पद खाली पड़े हुए हैं। एक तरफ तो देश मेें बेरोजगारी के आंकड़े आसमान पर हैं, दूसरी तरफ साइबर अपराधों के चलते पुलिस और बाकी जांच एजेंसियों पर काम का बोझ अंधाधुंध बढ़ते चल रहा है। इसके अलावा सामाजिक तनाव के बढऩे से पारिवारिक हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं, लोगों के सही या गलत किस्म के प्रेम और सेक्स-संबंधों के मामले पुलिस और अदालत तक पहुंच रहे हैं, और हर किस्म के अपराधी पहले के मुकाबले अधिक साधन-संपन्न भी होते जा रहे हैं। ऐसे में पुलिस की कमी से मौजूदा पुलिस पर दबाव इतना बढ़ता जा रहा है कि जिन मामलों में सत्ता पर बैठे लोगों की दिलचस्पी होती है, या जो खबरों में अधिक बने रहते हैं, बस उन्हीं की जांच तेजी से हो पाती है, बाकी आम लोगों के आम मामले पड़े रह जाते हैं। 

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में एक चौथाई से अधिक पुलिस-पद खाली हैं, बिहार में यह हाल और खराब है। नए बने राज्य तेलंगाना में करीब 40 फीसदी वर्दियां खाली हैं, और नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में 71606 पदों में से 11916 पद खाली हैं। देश का महज एक छोटा सा राज्य, उत्तर-पूर्व का नागालैंड ऐसा है जहां स्वीकृत पदों से करीब 10 फीसदी अधिक पुलिस है। लेकिन इन आंकड़ों में कोई नई बात नहीं है, और पिछले कुछ बरसों से सुप्रीम कोर्ट भी लगातार राज्यों से जानकारी ले रहा है, हलफनामे ले रहा है कि वे कब तक भर्तियां कर लेंगे, लेकिन यह काम बड़ी धीमी रफ्तार से चल रहा है। पुलिस विभाग के जानकार बड़े अफसरों का एक तर्क यह भी है कि एकमुश्त इतनी भर्तियां करने से आवेदन करने वाले लोगों में से सबसे अच्छे उम्मीदवारों को लेने के बाद बहुत से औसत उम्मीदवारों को भी ले लेना पड़ेगा जो कि ठीक नहीं होगा। इसके अलावा भर्ती के बाद के प्रशिक्षण का इंतजाम भी उतने लोगों का एक साथ नहीं हो सकता, इसलिए पुलिस विभाग के बाहर बैठे लोगों को इस काम में लापरवाही लग सकती है, लेकिन पुलिस के अपने तर्क हैं।
 
दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में पिछले डेढ़-दो बरस में राज्य के पुलिस-परिवारों का एक आंदोलन देखा जिसे कुचलने के लिए उस वक्त की रमन सरकार का पूरा पुलिस महकमा जुट गया था, और किसी तरह बागी तेवरों को काबू में किया गया था। उसके बाद पुलिस जागी थी, और एक कमेटी बनाकर पुलिस कर्मचारियों को साप्ताहिक अवकाश देने सहित कई किस्म की मांगों को मंजूर करने की बात की गई थी, अभी यह साफ नहीं है कि उनमें से कितनी बातों पर अमल हुआ है, और उससे पुलिस की दिक्कतें कितनी दूर हुई हैं। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों जगहों पर पुलिस को साप्ताहिक अवकाश देने को अपनी चुनावी घोषणा में शामिल किया था, और उसकी जरूरत चारों तरफ महसूस की जा रही थी। 

हम इसी जगह पर कई बार लिखते हैं कि पुलिस कर्मचारियों को मंत्रियों और अफसरों के घर-दफ्तर पर जिस तरह अर्दली बनाकर चपरासियों जैसा काम लिया जाता है, वह बंद होना चाहिए। यह टैक्स देने वाली जनता पर एक बोझ भी है, और इससे प्रशिक्षित पुलिस कर्मचारियों का स्वाभिमान भी खत्म होता है, उनका मनोबल भी टूटता है। आज किसी भी राज्य में पुलिस की कमी की एक वजह यह भी है कि उन्हें गैरपुलिसिया काम में झोंककर रखा जाता है, कहीं वे बच्चे खिलाते हैं, कहीं वे कुत्ते घुमाते हैं। इसे करने के साथ-साथ राज्यों को पुलिस की खाली कुर्सियों को इसलिए भरना चाहिए कि जांच और कार्रवाई में देर होने से पेशेवर हो चुके अपराधी लोगों को तरह-तरह से लूट रहे हैं, ठग रहे हैं, और अपनी तकनीकी जानकारी में वे पुलिस से सौ कदम आगे चलते हुए तरह-तरह के साइबर-जुर्म कर रहे हैं। हाल के बरसों में चिटफंड से लेकर दूसरे कई तरह के आर्थिक अपराध बढ़ते गए हैं, और उन सब पर कार्रवाई करने के लिए पुलिस बहुत ही कम है। अभी तो बात पुलिस के स्वीकृत पदों की ही रही है जिनके लिए बजट में इंतजाम है, लेकिन इससे परे भी जाकर पुलिस को अगर अधिक चौकस नहीं बनाया गया, उसकी क्षमता नहीं बढ़ाई गई, तो जनता का बड़ा नुकसान होते रहेगा, और मुजरिमों से उसकी बहुत ही कम जब्ती हो पाती है। 

पुलिस की कमी से जो मौजूदा लोग हैं उन पर काम का अंधाधुंध बोझ रहता है, और उनके परिवार उपेक्षित होकर बड़ा नुकसान झेलते हैं, छोटे पुलिस कर्मियों के बच्चे जुर्म में शामिल होने लगते हैं। इस नौबत को दूर करने के लिए पुलिस के खाली पदों पर तेजी से भर्ती करनी चाहिए, और इस बात की तैयारी जरूरत सिर पर आ जाने के बाद करने के बजाय पहले से करनी चाहिए। ऐसा न करना योजना और तैयारी की एक बड़ी कमी है, जो कि राज्यों को महंगी भी पड़ रही है। 
-सुनील कुमार

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