विचार / लेख

  ओडिशा का पेट भरती है, इंद्रावती  बस्तर आ कर मरती है
ओडिशा का पेट भरती है, इंद्रावती बस्तर आ कर मरती है
Date : 09-Jul-2019

राजीव रंजन प्रसाद 

बस्तर पठार को अब मानसून सरोबार करने लगा है। चित्रकोट जलप्रपात अपने उफान पर आ गया है अत: यह भुला दिया गया है कि इंद्रावती नदी विलुप्तीकरण के भयावह खतरे से गुजर रही है। बस्तर का दुर्भाग्य यह है कि इस अंचल का सारा विमर्श नक्सलवाद पर केंद्रित आरंभ होता है और इसी पर समाप्त हो जाता है। इस परिस्थिति का लाभ यह है कि वे बुनियादी सवाल कभी भी राज्य की मुख्यधारा को नहीं कचोटते कि आज भी इस परिक्षेत्र का दो फीसदी से अधिक भाग सिंचित क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आता तथा कमोबेश कालेमेघा पानी दे पर कृषि सम्बद्ध परिस्थितिया निर्भर रहती हैं। इसके साथ यह ध्यान देना होगा कि मानसून में मृदा जो आद्रता समेटती है वह शीतकालीन जलीय आवश्यकताओं तक को पूरा नहीं कर पाती। मार्च का महीना आते-आते शुष्कता की स्थिति मृदा मे निर्मित होने लगती है, यदि समय पर मानसून ने दस्तक नहीं दी तो फिर हालात भयावह हो सकते हैं। ऐसे में बस्तर में जल-संग्रहण से जुड़ी किसी परियोजना पर कोई सोच विकसित क्यों नहीं हुई है? 
इंद्रावती नदी पर बात करनी है तो गोदावरी की चर्चा अवश्यंभावी है। इसका कारण यह है कि बस्तर पठार का लगभग 94.42 फीसदी भाग गोदावरी नदी प्रवाह क्षेत्र के अंतर्गत आता है। तेलांगाना नया निर्मित राज्य है, उसके विकास तथा सिंचन परिक्षेत्र में गोदावरी नदी क्या भूमिका निर्वहित कर रही है इसके लिए हाल की दो परियोजनाओं का विशेष उल्लेख आवश्यक है। पहली है - कालेश्वदरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना जो कि दुनिया की सबसे बड़ी मल्टी-स्टे-ज लिफ्ट सिंचाई परियोजना है। इस परियोजना के तहत गोदावरी नदी का पानी समुद्रतल से 100 मीटर लिफ्ट कर मेडिगड्डा बांध तक पहुंचाया जाएगा। यहां से पानी को 6 स्टेज तक लिफ्ट किया जाएगा और कोंडापोचम्मा सागर पहुंचाया जाएगा, जिसकी ऊंचाई 618 मीटर है। इस परियोजना से लगभग 45 लाख एकड़ जमीन पर दो फसलों के लिए सिंचाई की व्यवस्था होगी।
 इसके साथ ही राज्य में मिशन भागीरथ पेयजल आपूर्ति परियोजना के तहत 40 टीएमसी पानी उपलब्ध कराया जाएगा। तेलांगाना से ही गोदावरी नदी जे जल उपयोग से जुड़ा एक अन्य समाचार यह है कि केंद्र सरकार की पर्यावरण समिति ने गोदावरी नदी पर 2,121 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले बांध को पर्यावरण मंजूरी दे दी है। यह परियोजना तेलंगाना के जयशंकर भुपालापल्ली जिले में बननी है। प्रस्तावित पी.वी. नरसिम्हा राव कनथनपल्ली सुजल श्रवंती परियोजना के तहत गोदावरी नदी पर 23 मीटर ऊंचा और 1,132 मीटर लंबा बांध बनाया जाना है। इससे जयशंकर भुपालापल्ली, नालगोंडा और खम्माम जिलों में रबी के मौसम में सिंचाई सुविधाएं पहुंचाने में मदद मिलेगी। इन दोनो परियोजनाओं की लाभ-हानि पर विचार करने के साथ ही एक बात यह भी ध्यान रखने की है कि गोदावरी नदी को मिल रहे जल का एक बडा भाग इंद्रावती नदी अपने उस जलग्रहण क्षेत्र से प्रदान करती है जो बस्तर पठार का हिस्सा है। छत्तीसगढ को इन परियोजनाओं से क्या मिला? 
बस्तर में तो कोई बृहद सिंचाई अथवा जलविद्युत की परियोजना नहीं है लेकिन क्या ओडिशा ने इंद्रावती नदी के जल का अपके परिक्षेत्र में भरपूर उपयोग नहीं किया है? जिस दौर में बारसूर (दंतेवाड़ा) के निकट बोधघाट परियोजना का निर्माण कार्य आरंभ हुआ, ठीक उसी कालखण्ड में ओडिशा के नवरंगपुर के निकट भी 6 सौ मेगावाट विद्युत उत्पादन तथा सिंचाई परियोजना के लिये इन्द्रावती नदी ही पर बांध का निर्माण किया जा रहा था। इतना ही नहीं इस बीच बिना किसी विरोध और पर्यावरण के लिए हो हल्ले के ओडिशा ने इन्द्रावती के साथ साथ उसकी सहायक नदियों क्रमश: पोड़ागढ़, कपूर, मुरान के सम्पूर्ण जल को भी अपने रिजर्वायर में मिला लिया और बांध के सभी गेट बंद कर लिए। 
आज सूखे बस्तर के सुकमा जिसे से गुजरते हुए मलकानगिरि का रास्ता पकड़ कर ओडिशा का रुख कीजिए, अनेक छोटे -बड़े बांध और सिंचाई परियोजनाएं आपको दिखाई पडेंग़ी। साल भर और कई-कई फसलों को लेने का सिलसिला दिखाई पड़ेगा। ओडिशा राज्य इंद्रावती नदी के जल का बूंद-बूंद इस्तेमाल कर रहा है, परंतु छत्तीसगढ़ में क्या और कहां समस्या है? 
ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि बस्तर के बारसूर में प्रस्तावित तथा विरोध के बाद बंद कर दी गई बोधघाट बांध के समान ही इसी नदी पर बना ओडिशा का अपर इन्द्रावती बांध प्रभावित क्षेत्र भी समान रूप से सघन वनाच्छादित तथा जैव-विविधता से परिपूर्ण था। यह बात समझ से परे है कि एक ही समय की, एक ही नदी पर, एक ही जैसे वातावरण में लगभग एक जितनी ही क्षमता वाली दो परियोजनाओं में से एक का विरोध होता है तो दूसरी आराम से बन कर तैयार हो जाती है? क्या यह अंतर इसलिये था चूंकि वृहद मध्यप्रदेश के लिए तत्कालीन बस्तर पिछड़ा और राजनीति की दृष्टि से कम प्राथमिकता वाला जिला था जबकि ओडिशा सरकार योजनाबद्ध रूप से अपनी परियोजनाओं पर कार्य कर रही थी?
 उस दौर के कतिपय जानकारों का मानना है कि दंतेवाड़ा में निर्मित हो रही परियोजना के विरोध में ओडिशा के नितिनिर्धारकों की भी दूरगमी सोच और हाथ था। एक ही नदी-घाटी के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम में बन रही दो परियोजनाओं के सुचारू रूप से संचालन के लिए वर्ष 1975 से 1979 के मध्य तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री प्रकाशचन्द्र सेठी एवं ओडिशा के मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी के मध्य जल बटवारे पर समझौता हुआ था जिसके तहत इन्द्रावती बांध से बोधघाट परियोजना के लिए 45 टीएमसी पानी छोडऩा आवश्यक था। अब न बोधघाट बांध रहा न ओडिशा सरकार की बाध्यता रही इसलिए कभी आठ टीएमसी पानी तो कभी तीन टीएमसी पानी इंद्रावती में छोड़ा जाता है। इसी कारण गर्मी का मौसम आते ही नदी बरसाती नाला बन कर रह जाती है, यहां तक कि चित्रकोट प्रपात पानी के लिए तरस जाता है। 
इन सवालों को खड़ा करने के पीछे मेरा उद्देश्य न तो बोधघाट परियोजना का समर्थन करना है, न ही विरोध। बड़ा प्रश्न यह है कि दिशा क्या होनी चाहिए? जो नदी ओडिशा और तेलांगाना का पेट भरती है वही बस्तर आ कर कैसे मरती है? ओडिशा और तेलांगाना इंद्रावती नदी जल का भरपूर दोहन करते रहें और बस्तर से केवल जल-जंगल-जमीन के नारे भर लगते रहने चाहिये? 
चलो, यह मान लिया जाए कि बस्तर की सभी जल-संचयन परियोजनाएं अव्यावहारिक हैं तो भी उन कारकों पर कभी बातें नहीं होती जो उनके न निर्मित किए जाने से उत्पन्न हो सकती हैं। उदाहरण के लिए इन्द्रावती नदी बस्तर से बहती हुई जा कर आन्ध्र के गोदावरी में जलवृद्धि करती है। ऐसा क्यों नहीं होता कि जिन वन क्षेत्रों में ‘पर्यावरण और विकास’ की बहसें सिचाई अथवा जल-विद्युत परियोजनाएं नहीं बनने देती वहां अपने संसाधन न इस्तेमाल करने के एवज में मुआवजा मिले? हमने इन्द्रावती को बहने दिया लेकिन गोदावरी अगर रोक ली गयी तो आन्ध्र मुआवजा दे अथवा केन्द्र क्षतिपूर्ति निर्धारित करे? गोदावरी नदी की बात करें तो उसके जलागम का लगभग चालीस हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र बस्तर के जंगलों से अबाध बहती सहायक नदियों के कारण है। 
बस्तर का हक है इस पानी पर और डाउनस्ट्रीम के प्रयोक्ता को इस पर रॉयल्टी क्यों नहीं देनी चाहिए? इसी तरह अपस्ट्रीम में निर्मित हुई परियोजनाओ को भी प्रभावित निचले क्षेत्रों को क्षतिपूर्ति तथा रॉयल्टी देनी ही चाहिए। यह तर्क स्वीकार है कि वृहत भारत के हित में नदियां इन जंगलों से तो अबाध ही बहेंगी, लेकिन बिजली न बना पाने और अपने प्यासे खेतों की क्षुधा न बुझा पाने की क्षतिपूर्ति बस्तर को क्यों न मिले? इस दिशा में भी सोचा जाना आवश्यक है।   

 

 

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