संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 9 जुलाई : गटर-शहीदों के बारे में सोचें,  ऐसी शहादत रोकना चाहिए
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 9 जुलाई : गटर-शहीदों के बारे में सोचें, ऐसी शहादत रोकना चाहिए
Date : 09-Jul-2019

देश भर में गटर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए मरने वाले लोग खबर नहीं बन रहे हैं, और यह बेरूखी खबर बन भी रही है। कुल मिलाकर ऐसी मौतें आंकड़ों की शक्ल में आती हैं, और अगले दिन तक खबरों में उनकी तेरहवीं भी हो जाती है। लेकिन कुछ लोगों ने इन्हें सरकारी हत्या करार देना शुरू किया है, और कम से कम एक सरकार ऐसी है जिसने इन मौतों की रोकथाम के लिए कोशिश शुरू की है, और ऐसी अमानवीय जिंदगी जीने वाले सफाई कर्मचारियों की बेहतरी के लिए कुछ कोशिश की है। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार केन्द्र सरकार से लगातार टकराव झेलने के बाद अब अपने बूते जो कर पा रही है, उसमें लगी हुई है। उसने वहां पर ऐसे सफाई रोबो खरीदने की तैयारी शुरू की है जो गटर और नालों में उतरकर रिमोट कंट्रोल से सफाई करेंगे, और इंसानों को इस काम में झोंकना घटेगा, और शायद धीरे-धीरे बंद भी हो सकेगा। 

कल ही छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार की एक खबर थी कि शासन ने प्रदेश की म्युनिसिपलों से इस किस्म के काम में होने वाली मौतों की जानकारी मांगी थी, और अधिकतर म्युनिसिपलों ने जानकारी नहीं भेजी है, इसलिए उन्हें नोटिस जारी किया गया है। देश में ऐसा अंधाधुंध शहरीकरण तो हो गया है जिसके चलते शहरी सड़कों और इमारतों के नीचे नाले दब गए हैं। इस देश में ऐसी संपन्नता भी आ गई है कि शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजाना अंधाधुंध कचरा पैदा करता है। लेकिन लोगों में यह जागरूकता नहीं आई है कि अपने पैदा किए हुए कचरे को कैसे ठिकाने लगाएं। नतीजा यह होता है कि जो कचरा अलग-अलग करके म्युनिसिपल के हवाले करना चाहिए, वह एक जैसा मिलाकर, उसमें इमारतों की तोडफ़ोड़ का मलबा और जोड़कर कचरा गाड़ी के लिए ढेर तैयार रखा जाता है। ऐसे में एक बार इन सबके मिल जाने पर इनको अलग करना नामुमकिन रहता है, और म्युनिसिपल अंधाधुंध खर्च करके भी कचरे के इन छोटे-छोटे टीलों को शहर के बाहर पहाड़ भर बना सकती है, उनका निपटारा नहीं कर सकती। और इसी बीच ढेर सा कचरा नालियों और नालों को बंद कर देता है, जिसे साफ करते हुए ऐसी मौतें होती हैं। जितना बड़ा और जितना संपन्न शहर होगा, उसमें सफाई कर्मचारियों की उतनी ही अधिक मौतें होंगी। और मौत तो फिर भी आंकड़ों की शक्ल में एक छोटी खबर बन जाती है, उससे परे जिस बुरे हाल में सफाई कर्मचारी गटर में डूबकर उसकी सफाई करते हैं, वह कचरा पैदा करके उसे गलत जगह, गलत तरीके से फेंकने वाले लोगों के लिए शर्म से डूब मरने की बात रहती है। 

आज की चर्चा का मकसद यह है कि सरकारों को संवेदनशील होना चाहिए, और आज महज मजबूरी में सफाई कर्मचारी ऐसे जानलेवा और अमानवीय, सेहत के लिए भयानक खतरनाक काम करने को अगर उपलब्ध हैं, तो उसे एक स्थाई व्यवस्था मान लेना बहुत ही अलोकतांत्रिक ज्यादती है। अधिक से अधिक सरकारों को अपना शहरी ढांचा ऐसा बनाना चाहिए कि उसमें मरने के लिए इंसानों को गटर में न उतारना पड़े। जो लोग शहरों में करोड़ों का घर बनाकर रहते हैं, उन्हें गटर की सफाई के लिए टैक्स देने पर भी मजबूर करना चाहिए। दिल्ली की सरकार ने गरीबों के लिए शानदार मुहल्ला क्लिनिक बनाकर एक मिसाल पेश की है, और वहां की सरकारी स्कूलें भी देश की सबसे अच्छी सरकारी स्कूलें बन गई है। ऐसे में जब केजरीवाल सरकार गटर साफ करने के लिए रोबो खरीदने की तैयारी कर रही है, तो इससे भी देश के बाकी प्रदेशों की सरकारों को, और केन्द्र सरकार को भी एक सबक लेना चाहिए। अगर इस देश में न्यूनतम मानवीय अधिकार की गारंटी देनी है, तो वह सफाई कर्मचारियों की जिंदगी बेहतर बनाए बिना नहीं हो सकती। एक लोकतंत्र को अपने देश के सबसे बदहाल लोगों के बारे में सबसे अधिक फिक्र करनी चाहिए, और ऐसे में गटर-शहीदों के बारे में जरूर सोचना चाहिए, ऐसी शहादत रोकना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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