विचार / लेख

 कांग्रेस की ताकत
कांग्रेस की ताकत
Date : 10-Jul-2019

डॉ. संजय शुक्ला

कांग्रेस की ताकत महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और बाबा साहब भीमराव आंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे लोग रहे हैं। इस पार्टी ने इन महापुरुषों के विचारधारा में चल कर विशाल वट-वृक्ष का स्वरूप अख्तियार कर लिया जिसकी जड़ें देश के अमूमन सभी राज्यों में मजबूती के साथ जम गई। 
कालांतर में इस पार्टी को लाल बहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी का नेतृत्व मिला तब तक यह पार्टी विपक्ष के लिहाज से चुनौतीहीन थी। ऐसा नहीं था कि उस दौर में विपक्ष में चेहरे का आभाव था, उस दौर में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के खिलाफ विचारधारा के पैरोकार या कहें कि देश के विभाजन के मुखालफत करने वाले दक्षिणपंथी विचारधारा के तपे तपाए चेहरा पं दीनदयाल उपाध्याय., श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर धुर समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, जयप्रकाश नारायण, जार्ज फर्नांडीस, कर्पूरी ठाकुर जैसे लोग भी थे लेकिन ये इंदिरा के सामने संख्या बल के लिहाज से चुनौतीहीन ही थे। 
हालांकि उनके विचारों में जमीनी हकीकत थी लेकिन लोकतंत्र में सत्ता का नियंता संख्या बल ही तय करता है। इसके बावजूद इन नेताओं के आवाजों ने संसद से लेकर सडक़ तक हलचल पैदा की थी यह लोकतंत्र का वह दौर था जब वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेहरू से लेकर इंदिरा उन्हें सम्मान देते रहे और उनसे निरंतर संवाद कायम रखा। तबके नेतृत्व यानि इंदिरा जी को चुनौती पार्टी के भीतर से ही मिलती रही चाहे निजलिंगप्पा, नीलम संजीव रेड्डी, देवराज अर्स हों या फिर सिंडिकेट । 
बहरहाल कांग्रेस को विपक्ष की पहली चुनौती 1977 में मिली जब देश ने आपातकाल की घोर काली अमावस्या के बाद संयुक्त विपक्ष के सरकार के रूप में नया सबेरा देखा लेकिन इस मोर्चे के ताश का महल कुछ माह में इंदिरा की आंधी में भरभराकर गिर गया। इसके बाद इंदिरा और राजीव का तिलिस्म कायम रहा। राजीव गांधी के बाद विपक्ष एक बार फिर चुनौती के रूप में उभरा लेकिन यह चुनौती इंडिया शाइनिंग के नारे को निस्तेज कर पुन: सोनिया गांधी को उभार दे गया। 
दस साल तक मनमोहन सिंह के हाथों सत्ता की कमान सौंपने के साथ सोनिया गांधी सत्ता की सुप्रीमो बनी रही। लेकिन राहुल गांधी के दौर में पार्टी आज बुरी तरह से चुनौतियों से जूझ रही है आज पार्टी का ही अस्तित्व संकट में प्रतीत होने लगा है। अहम प्रश्न क्या कांग्रेस मुक्त भारत की ओर देश बढ़ रहा है? जिस पार्टी के मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों को यह भरोसा नहीं रहता था कि कल की सुबह उनके पास कुर्सी रहेगी कि नहीं? उस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष इस्तीफा देकर पंद्रह दिनों बाद यह दुख जाहिर करने के लिए विवश है कि उनके द्वारा इस्तीफे की पेशकश करने के बावजूद पार्टी के किसी ने पद छोडऩे की मंशा जाहिर नहीं की। बहरहाल इस पीड़ा के बाद इस्तीफों की झड़ी लग गई। 
लेकिन अहम बात यह कि इस्तीफा कांग्रेस के संकट का हल नहीं है। फिर से एक बार प्रश्न क्या देश कांग्रेस मुक्त भारत की ओर बढ़ रही है? क्या कांग्रेस के पास अस्तित्व रक्षा का संकट है? नहीं, हरगिज नहीं। न तो देश कांग्रेस मुक्त होगा और न ही कांग्रेस के अस्तित्व पर कोई संकट है। कांग्रेस को इस चुनौती से निबटना होगा अपनी ताकत को सहेजना होगा क्योंकि यह 133साल पुरानी देश की  सबसे बड़ी पार्टी है जिसकी पैठ शहरों से गांवों तक है। भले ही बूढा वट-वृक्ष सूखने के कगार पर हो लेकिन इसकी जड़े गहरी है इन जड़ों में अभी बहुत जान है जरूरत इन जड़ों में खाद और पानी डालने की है।
यकीन मानिए एक दिन इसी दरख्त से नई कोपलें फूटेंगी जरूरत केवल और केवल एकजुटता, संघर्ष, समन्वय और धैर्य की है। कांग्रेस को उन छद्म मालियों से बचने की दरकार है जो रात के अंधेरे में इस बूढ़े दरख्त पर कुल्हाड़ी चलाने के फिराक में हैं।
कांग्रेस को जरूरत अब अपनी उस ताकत को फिर से सहेजने या हासिल करने की है जिसे हालात ने क्षीण कर दिया और इसका जवाबदेह वह स्वयं है। कांग्रेस के ताकत का जिक्र शुरू के लाइनों में है आज अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कांग्रेस के खाते में केवल और केवल पं जवाहरलाल नेहरु ही बच गए हैं जो हर किसी साफ्ट टार्गेट में हैं। बाकी सत्ताधारी पार्टी ने महात्मा गाँधी, सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस से अलग ही कर दिया तो बसपा ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को अपने पाले में डाल लिया। सुनियोजित साम्प्रदायिक वोटों के ध्रुवीकरण के चलते कांग्रेस मौलाना आजाद को भी फ्रेम से बाहर कर चुकी है। 
वाह री कांग्रेस उसके खुद के घर से उनके कीमती धरोहर पार होते रहे और उनके दरबान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। लोकतांत्रिक परंपरा में विचारधारा ही किसी पार्टी की रीढ़ होती है लेकिन कांग्रेस जिन महापुरुषों के विचारधाराओं पर चलती रही उन्हें ही बेदखल कर दिया गया। कमजोर रीढ़ की पार्टी को अपने बलबूते खड़े होने के लिए फिर से आंतरिक बल और आत्मविश्वास की जरूरत है। पार्टी को उन महापुरुषों और विचारधारा को फिर से मुख्यधारा में लाना होगा और इसके लिए पार्टी को चिंतन और प्रशिक्षण शिविर की जरूरत है। इन शिविरों में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर आम सदस्यों को एक ही पंगत में बैठने की दरकार है। 
पार्टी को धारा 370, कश्मीर समस्या, तीन तलाक, राम मंदिर, महिला आरक्षण विधेयक, आतंकवाद, राष्ट्रवाद, नक्सलवाद, आर्थिक नीति, रोजगार और साम्प्रदायिकता पर अपना स्टैंड स्पष्ट करना होगा। पार्टी के पुराने और नए नेताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करते हुए जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को अहमियत देनी होगी। पार्टी में चाटुकारिता पसंद नेताओं और चाटुकारों को हतोत्साहित करना होगा। राजीव जी और राहुल के दौर में पनपे आक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे यूनिवर्सिटी के अंग्रेजीदां थिंक टैंकरों को रूखसत करना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण कांग्रेस के नेताओं और आम कार्यकर्ताओं को भाजपा के धैर्य, अनुशासन, संगठन, निष्ठा और वाक शैली से सीख लेनी होगी।
हालांकि हाल के दिनों में इसमें कुछ गिरावट आई है लेकिन फिर भी नियंत्रण में है वहीं पार्टी को ममता बनर्जी के केवल जुझारूपन को अपनाना चाहिए। और हां कांग्रेस को कुछ गैर जरूरी प्रयोगों जैसे युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के संगठनात्मक चुनावों से भी बचना होगा क्योंकि इन चुनावों में धनबल और बाहुबल का भारी पैमाने पर उपयोग हो रहा है और इससे वंशवाद को भी बढ़ावा मिल रहा है।  कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रादेशिक स्तर पर ऐसे प्रवक्ताओं की नियुक्ति करनी होगी जिनमें पढऩे, लिखने की आदत हो और जिसके पास प्रत्यनुमति बुद्धि और तर्कक्षमता हो। पार्टी में ऐसे लोगों को ढूंढना टेढ़ी खीर नहीं है जरूरत ऐसे लोगों को अंदरखाने से निकालने की है। 
कांग्रेस को अब समझना और मानना होगा कि उसका परंपरागत वोट बैंक या उसकी एक और ताकत दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, गरीब और किसान अब उससे छिटक गए हैं और न ही उनके पार्टी में ऐसा कोई जनाधार वाला नेता बचा है जो मोदी और कथित राष्ट्रवाद की आंधी में अपने खुद की जमीन बचाने का माद्दा रखता हो।आज जरूरत इनका फिर से विश्वास हासिल करने की है। 2018 के विधानसभा चुनावों में तीन राज्यों में कांग्रेस की वापसी कांग्रेस की विजय नहीं अपितु भाजपा की हार थी। क्योंकि 6 माह बाद हुए लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस की करारी हार ने कांग्रेस के गुब्बारे में फिर से छेद कर दिया है।
 आने वाले समय में राजस्थान और मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार को बचाए रखना पार्टी के लिए अहम चुनौती होगी क्योंकि कर्नाटक के बाद लोकतंत्र का चीरहरण इन राज्यों में होना तय है।बहरहाल कांग्रेस को अब भगदड़, किंकर्तव्यविमूढ़ता और अनिश्चितता की स्थिति से बाहर आना ही होगा। अंत में महत्वपूर्ण यह कि कांग्रेस कभी भी नेहरु-गांधी परिवार से अलग नहीं हो सकती क्योंकि इस परिवार ने शहादत भी इसी पार्टी के खातिर दी है। भारत को नेहरू - गांधी परिवार की प्रतिच्छाया वाली कांग्रेस पार्टी चाहिए कि नहीं इसका फैसला देश के करोड़ों लोगों पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में राजनीति और राजनेता के भविष्य तय करने की जिम्मेदारी इसी पर है। 

 

 

 

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