संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 जुलाई :  ऐसे में अदालतें ही किसी  काम की हो सकती हैं...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 जुलाई : ऐसे में अदालतें ही किसी काम की हो सकती हैं...
Date : 11-Jul-2019

कल गुजरात की खबर थी कि एक गैरदलित से शादी करने वाले दलित नौजवान को ससुराल वालों ने पीट-पीटकर मार डाला। कल ही किसी और जगह की खबर थी कि उत्तरप्रदेश भाजपा के एक ब्राम्हण विधायक की बेटी ने एक वीडियो जारी करके बयान दिया है कि उसने एक दलित से शादी की है, और उसे अब पिता की ओर से जान का खतरा लग रहा है। एक तीसरा वीडियो कल से हवा में तैर रहा है कि किस तरह उत्तराखंड में भाजपा का एक निलंबित विधायक दोनों हाथों में बंदूक-पिस्तौल थामे हुए, और मुंह में एक और पिस्तौल दबाए हुए शराब पीते हुए, गालियां देते हुए फिल्मी गाने पर डांस कर रहा है। कुल मिलाकर हिंदुस्तानी समाज की तस्वीर भयानक है जिसमें जगह-जगह प्रेमीजोड़ों को मारा जा रहा है, सामाजिक रीति-रिवाज का पालन न करने पर खाप पंचायतें लोगों पर जुर्माना लगा रही हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है।

हिंदुस्तान सदियों से चली आ रही सती प्रथा से किसी तरह उबरा था। उसके बाद बाल विवाह के खिलाफ बने कानून को लागू करने में आज तक सरकारों की जान निकली जा रही है, लेकिन हर बरस अक्षय तृतीया पर देश भर में हजारों बाल विवाहों की खबरें आती हैं। छुआ-छूत देश में इस बुरी तरह फैला हुआ है कि दलितों को न तो शादी में घोड़ी पर चढऩे मिलता, न बस्ती के कुएं से पानी लेने मिलता, और कहीं किसी मंदिर के गरम तपते पत्थर पर किसी दलित बच्चे को नंगा बिठा दिया जाता है। हैवानियत कही जाने वाली, लेकिन हकीकत में इंसानियत, के चलते जगह-जगह इंसान और इंसान में फर्क इतने दुस्साहस के साथ किया जाता है कि मानो देश में कोई कानून हैं ही नहीं। 

कुछ बातें एक-दूसरे से अलग लगती हैं, लेकिन रहती नहीं हैं। जब देश में धर्मांधता, कट्टरता, रक्तशुद्धता, और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाता है, तो धीरे-धीरे लोगों की सोच तमाम मामलों में अवैज्ञानिक होने लगती हैं। जाति व्यवस्था सिर उठाने लगती है क्योंकि किसी जाति के बेहतर होने, और किसी जाति के बदतर होने की सोच जोर पकडऩे लगती है। आज हिंदुस्तान की घड़ी मानो एक सदी पीछे ले जाई जा रही है, और समाज में जगह-जगह राजनीति से परे के लोग भी चलन से बाहर हो चली कट्टरता को फिर से इस्तेमाल में लाने लगे हैं। देश की सोच से वैज्ञानिकता का खत्म होना बहुत भयानक इसलिए है कि आने वाली पीढिय़ां इसी सोच के साथ बड़ी होंगी, और वे महिला विरोधी होंगी, वे गरीबी और बीमारी को ईश्वर की दी हुई सजा मानेंगी, वे एक जाति के दूसरे से बेहतर होने पर भरोसा करते हुए छुआ-छूत को बढ़ावा देंगी, और कुल मिलाकर दशकों की मेहनत से देश की सोच में आया हुआ सुधार ढहने लगेगा, ढह रहा है।

किसी देश या समाज की सोच को कतरे-कतरे में नहीं सुधारा जा सकता। या तो लोगों को तमाम मामलों में बराबरी से लोकतांत्रिक समझ दी जा सकती है, या फिर वे न्यायसंगत, तर्कसंगत न बनकर अलोकतांत्रिक बन जाते हैं, और उनके लिए संसद या अदालत से अधिक महत्व खाप पंचायतों के अंदाज की जीवनशैली का हो जाता है। इसीलिए हिंदुस्तान में जगह-जगह प्रेमी जोड़े हर दिन आत्महत्या करते हैं, घर और शहर छोड़कर भाग जाने को मजबूर होते हैं, या फिर परिवार वालों के हाथ मार दिए जाते हैं। ऐसा लगता है कि इन मामलों में अदालत को जितनी सक्रियता दिखानी चाहिए, वह नहीं हो रही है। कानून बने हुए हैं, लेकिन उनके खिलाफ काम करने को पारिवारिक और सामाजिक गौरव मान लिया जा रहा है, और उसके मुताबिक हिंसा की जा रही है। जो नेता वोटों के मोहताज होते हैं, उनसे अधिक उम्मीद नहीं की जाती कि वे सामाजिक कट्टरता के खिलाफ खुलकर सामने आएं, ऐसे में अदालतें ही किसी काम की हो सकती हैं।
-सुनील कुमार

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