संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 16 जुलाई : कवासी लखमा का मंत्रीपद खुद उन्हीं के लिए असुविधा और कानूनी परेशानी है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 16 जुलाई : कवासी लखमा का मंत्रीपद खुद उन्हीं के लिए असुविधा और कानूनी परेशानी है...
Date : 16-Jul-2019

छत्तीसगढ़ के बस्तर के लगातार जीतने वाले एक कामयाब आदिवासी विधायक कवासी लखमा को राज्य की भूपेश बघेल सरकार ने जब मंत्रिमंडल की पहली लिस्ट में ही रखा, तो उस समय भी यह सवाल उठा था कि वे लिखना-पढऩा नहीं जानते हैं, और ऐसे में मंत्री की जिम्मेदारियां किस तरह पूरी कर पाएंगे? इसके बाद से विधानसभा की कार्रवाई उनके विभागों से जुड़े सवालों पर दूसरे मंत्री जवाब देते आए हैं। कवासी लखमा की समझ, उनका तजुर्बा, और उनकी राजनीतिक क्षमता पर किसी को शक नहीं है, लेकिन मंत्री के पद से जुड़ी हुई कुछ ऐसी जिम्मेदारियां होती हैं जो कि फाईलों और कागजों से होते हुए विधानसभा या अदालत में जवाब देने तक खड़ी रहती हैं। ऐसे में यह सवाल उठाना नाजायज नहीं होगा कि क्या सत्तारूढ़ पार्टी उनके लिए कोई ऐसी भूमिका तय नहीं कर सकती थी कि जिससे वे अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए आज की तरह असुविधा से नहीं गुजरते?

किसी जननेता का अकेला सम्मान मंत्रीपद नहीं होता, उसे महत्व देने के लिए सत्ता और संगठन में कई किस्म के काम हो सकते हैं। कुछ मामलों में मंत्रिमंडल में बिना विभागों वाले मंत्री भी रखे जाते हैं, जिनकी क्षमता का इस्तेमाल फाईलों से परे भी किया जाता है। आज कवासी लखमा को आबकारी विभाग देखना होता है जो कि राज्य में सबसे बड़ी कमाई वाला विभाग है, जो परंपरागत रूप से सबसे अधिक भ्रष्ट भी रहते आया है, और जिस विभाग से जुड़े दारू कारोबारी राज्य की राजनीति में अपनी थैलियों से सबसे अधिक दखल भी रखते हैं। जाहिर है कि ऐसे विभाग को चलाते हुए सिर्फ एक मजबूत समझ काफी नहीं हो सकती, उसके लिए फाईलों को पढऩा, उनको समझना, उन पर लिखना भी जरूरी होता है। कल को अगर इस विभाग की फाईलों को किसी अदालत में खड़ा होना पड़े, तो यह बात एक मुद्दा बन सकती है कि मंत्री ने जब पढ़कर समझा नहीं है, तो उन्होंने उस पर दस्तखत कैसे किए? और यह बात अदालत में सरकार के खिलाफ जा सकती है। कवासी लखमा को वाणिज्य और उद्योग जैसे विभाग भी दिए गए हैं जो कि कारोबारियों से, उद्योगपतियों से, और पूंजीनिवेशकों से जुड़े रहते हैं। वैसे तो किस मंत्री को क्या विभाग दिए जाएं, यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन इन विभागों को कवासी लखमा को देने से एक ऐसी छवि भी बनती है कि इनको अफसरों के मार्फत ही चलाया जा रहा है। यह नौबत ठीक नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल भी नहीं है कि निर्वाचित नेता अफसरों के किए हुए पर महज दस्तखत करें या अंगूठा लगाएं।

कवासी लखमा जितनी बार मुश्किल बस्तर के आदिवासी इलाके से जीतकर आए हैं, उन्हें सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार में एक बड़ा महत्व मिलना जायज और जरूरी है। लेकिन यह महत्व मंत्रीपद के मौजूदा ढांचे में फिट नहीं बैठ रहा है। मुख्यमंत्री चाहें तो उन्हें अपने बंगले पर लगने वाली जनचौपाल का प्रभारी बना सकते हैं जहां वे लोगों की बातें सुनकर अधिकारियों को जुबानी निर्देश दे सकते हैं, और किसी फाईल पर दस्तखत करने की मजबूरी भी नहीं रहेगी। हम किसी भी तरह से समझ को ज्ञान के नीचे नहीं मान रहे, लेकिन मंत्रीपद की कुछ जिम्मेदारियां पढ़े-लिखे बिना पूरी नहीं हो सकतीं। राज्य सरकार ने मंत्री स्तर का दर्जा देने के कई प्रावधान हैं और उनका इस्तेमाल करके कवासी लखमा का सम्मान बरकरार रखा जा सकता है, और सरकार शासकीय कामकाज को नियमों के मुताबिक करने की अपनी जिम्मेदारी भी निभा सकती है। आज जिस तरह से उनसे काम लिया जा रहा है यह किसी दिन उन्हीं के खिलाफ कानूनी दिक्कत खड़ी कर सकता है। ऐसी नौबत से सबको बचना चाहिए, और किसी के पढऩे-लिखने की कमी को मजाक या कानूनी परेशानी का मुद्दा नहीं बनने देना चाहिए। सत्तारूढ़ पार्टी अपने संगठन में, या सरकार में कवासी लखमा की क्षमता के अनुरूप कोई दूसरी जिम्मेदारी ढूंढे।
-सुनील कुमार

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