विशेष रिपोर्ट

कबीरधाम, वन अधिकार से बैगाओं में उम्मीद
कबीरधाम, वन अधिकार से बैगाओं में उम्मीद
Date : 19-Jul-2019

वन अधिकार से बैगाओं में उम्मीद

बाबा मायाराम
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में बैगा आदिवासी जंगल और जमीन का अधिकार लेने की प्रक्रिया में जुटे हुए हैं। वे गांव-गांव में दावा फार्म भर रहे हैं और नजरी नक्शा भी बना रहे हैं। व्यक्तिगत के साथ सामुदायिक वन अधिकार के लिए भी दावा कर रहे हैं। 
हाल ही में पंडरिया विकासखंड के गांवों में जाने का मौका मिला। पहले नवापारा- राजिम के सक्षम केंद्र में नए वन अधिकार कानून ( नुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी ( वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006) पर कार्यशाला थी। इसमें छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों से प्रतिभागी शामिल थे। यहां सामुदायिक अधिकार पर विस्तृत जानकारी दी गई। प्रेरक के रामगुलाम सिन्हा, जुनास दीप आदि ने प्रशिक्षण दिया।

प्रेरक संस्था से जुडक़र काम करने वाले नरेश बुनकर मुझे बैगा आदिवासियों के गांव ले गए। नरेश बुनकर बैगा आदिवासियों के बीच लम्बे समय से काम कर रहे हैं। 4 से 6 फरवरी (2019) के बीच करीब डेढ़ दर्जन गांवों का दौरा किया। इन गांवों में कुछ खुडिय़ा बांध, जो मनियारी नदी पर बना है, की तलहटी में बसे हैं। और कुछ डोंगर ( पहाड़) पर बसे हैं, जो पंडरिया के आगे मैकल पहाडिय़ों में जंगलों के बीच रह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति के अंतर्गत आते हैं। बैगाओं का जीवन प्रकृति पर निर्भर रहा है। वे बेंवर (शिफ्टिंग कल्टीवेशन) खेती करते थे। बेंवर को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जानते हैं। मध्यप्रदेश के सतपुड़ा अंचल में दहिया खेती कहते हैं। कहीं झूम व पेंदा खेती भी कहा जाता है। 

बेंवर खेती में छोटे- पेडों व झाडिय़ों को काटकर बिछाया जाता है। झाडिय़ों के सूखने पर फिर उनमें आग लगाई जाती है। फिर जली राख में कई फसलों के बीजों को एक साथ फेंक दिया जाता है, जो बारिश होने पर ये बीज उग आते हैं और पक जाते हैं। जैसे-जैसे फसलें पक कर तैयार होती जाती हैं, वैसे-वैसे बैगा काटते जाते हैं। तीन साल में इसका स्थान बदल जाते थे,जिससे जमीन फिर से उर्वर बन जाए।  इस कारण इसे स्थानांतरित खेती भी कहते हैं।

बेंवर में बैगा कुटकी, सांवा, कांग, मडिय़ा, मक्का, ज्वार, राहर ( अरहर),उड़द, सिकिया, बदरा ( दाल) , झुंझरू, रवांस, डेंगरा, खीरा, बड़े लांझी आदि बोते थे। अब बैगा बेंवर नहीं करते हैं। लेकिन वे अब भी इन पौष्टिक अनाजों की खेती उनके खेतों में करते हैं।   
जंगल से उन्हें कई तरह के कांदा भी मिलते हैं, जो उनके भूख के दिनों के साथी हैं। इनमें डूनची कांदा, कनिहा कांदा, रबी कांदा, सेंदू कांदा, लोरनी कांदा, गीठ कांदा, कौजारी कांदा, सिडवां कांदा इत्यादि। जंगल से कई प्रकार की हरी पत्तेदार भाजियां भी मिलती हैं। जैसे सिरौती भाजी, पकड़ी भाजी, दौबे भाजी, सिहाड़ भाजी, कचनार, कोयलार, तिनपनिया, करमत्ता, चाटी और तिवड़ भाजी है। जंगल से मिलने वाले फलों में चार, तेंदू, महुआ, कुल्लू लासा (गोंद), हर्रा, बहेड़ा इत्यादि मिलते हैं। इसे गैर खेती भोजन भी कहते हैं। 

पौष्टिक अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के लिए बैगाओं ने बांहपानी गांव में अनाजों की प्रदर्शनी भी लगाई थी। जिसमें जन स्वास्थ्य सहयोग गनियारी के देशी बीजों के जानकार होमप्रकाश साहू, बैगाओं के बीच काम करनेवाले मध्यप्रदेश के नरेश विश्वास आदि शामिल हुए थे। प्रेरक संस्था ने देशी बीजों के संरक्षण व संवर्धन में अनूठा काम किया है। उनके देशी धान की करीब 350 किस्में हैं। इसके अलावा बाड़ी ( किचिन गार्डन) का काम भी कर रही है। प्रेरक संस्था ने जैविक खेती व घरों की बाडिय़ों ( किचिन गार्डन) का काम किया है। 
घमेरी गांव के मानसिंह बैगा कहते हैं कि अब जो चीजें हमें जंगलों से मिलती थी अब उनमें कमी आ रही है। उनका गांव भी बोइरहा डोंगर में था, लेकिन वहां गुजर होना मुश्किल था, इसलिए अब वे खुडिय़ा बांध की तलहटी में आकर बस गए। 
वे आगे बताते हैं कि हमने जमीन की लड़ाई लड़ी और वन अधिकार का पट्टा भी पाया। अब हम सामूहिक सामुदायिक पट्टे के लिए कोशिश कर रहे हैं। कांदावानी और बांहपानी पंचायत में उन्होंने सामुदायिक पट्टा भी हासिल किया है।

गांव बचाओ समिति के नरेश बुनकर ने बताया कि वनाधिकार के लिए बैगाओं को लम्बी लड़ाई लडऩी पड़ी है। पिछले वर्ष 2018 में यहां बैगा आदिवासियों ने टाईगर रिजर्व कोरिडोर के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीती है। गांवों तक यह खबर पहुंची कि अब कान्हा, भोरमदेव और अचानकमार अभयारण्य तक टाईगर रिजर्व कोरिडोर बनेगा। इसलिए बैगाओं की जंगल से निस्तारी पर रोक लगेगी। वन संरक्षण के नाम पर बैगाओं के जीवन पर आए इस संकट से बैगा संगठित हुए और इसके खिलाफ खड़े हो गए। 

वर्ष 2018 के मार्च महीने में तीन दिवसीय पदयात्रा तय हो गई थी। लेकिन पदयात्रा की शुरूआत में वनविभाग और पुलिस दल-बल के साथ यहां पहुंची और उनके ( नरेश बुनकर) समेत 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। यह खबर पाते ही बड़ी संख्या में आदिवासी एकत्र हुए और कुकदर थाना पहुंच गए, जहां उनको (नरेश बुनकर) और उनके साथियों को गिरफ्तार करके रखा गया था। यात्रा की शुरूआत में आदिवासियों की लड़ाई में अग्रणी नरेश बुनकर समेत 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया।  कुछ ही समय में जनदबाव में सभी को छोडऩा पड़ा और लिखकर यह आश्वासन देना पड़ा कि टाईगर रिजर्व कोरिडोर नहीं बनेगा। 

लेकिन इसके बावजूद भी पदयात्रा का कार्यक्रम नहीं रूका और यह पदयात्रा 17 मार्च को बांहपानी से चलकर 19 मार्च को पंडरिया तक गई। वहां गांधी चौक में बैगा सम्मेलन रखा गया जिसमें वनाधिकार और आदिवासियों की समस्याओं पर चर्चा हुई और संबंधित अधिकारियों को समस्याओँ से संबंधित ज्ञापन दिया गया।  कुल मिलाकर, इस पूरी लड़ाई में बैगा आदिवासियों की जीत छोटी जीत हुई और इससे उनमें हिम्मत आई। और बाद में दो पंचायतों बांहपानी और कांदावानी पंचायत को सामुदायिक पट्टा का अधिकार भी मिला।

इसी प्रकार, डोंगर के ऊपर के गांव बांहपानी, भलिन दादर, धुरसी, कांदावानी, कानाखेरू, छीरपानी, ठेंगाटोला, ढपरापानी में भी बैगा इसमें लगे हैं। बैगाओं की जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। उनकी जंगल आधारित खाद्य व भोजन व्यवस्था थी जिसमें अब कमी आ रही है। एक तो जलवायु बदलाव व मौसम बदलाव हो रहा है। जंगल कम हो रहे हैं। पानी के परंपरागत स्रोत भी सूख रहे हैं। कुछ गांवों में दूर से पानी लाना पड़ता है। उनकी जीवनशैली व खेती भी बदल रही है। बैगाओं का जीवन कठिन हो रहा है।     

अब नए वन अधिकार कानून से बैगाओं में आस जगी है। इलाके के और भी गांव वन अधिकार के तहत् उनके अधिकार पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। और नई कांग्रेस की सरकार ने इस दिशा में पहल शुरू की है, खुद सरकारी महकमे ने जगह-जगह कार्यक्रमों के माध्यम से वन अधिकार कानून के दावा फार्म भरने की जानकारी और लोगों को इसके लिए उत्साहित कर रही है। इस सबसे बैगाओं की आंखें भी उम्मीद से चमक रही हैं। वे गांव – गांव से दावा फार्म भर रहे हैं। और प्रेरक संस्था में उनकी मदद कर रही है। जंगल और आदिवासी एक दूसरे के पूरक है। बैगाओं का जीवन जंगल पर है और जंगल के बारे में उनकी जानकारी, मान्यताएं और परंपरागत ज्ञान से जंगल के संरक्षण में भी मदद मिल सकती है। 
 

 

 

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