संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 20 जुलाई :  जमीनों के सरकारी रेट में कमी एक बहुत समझदारी का फैसला, पर कुछ और समझदारी जरूरी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 20 जुलाई : जमीनों के सरकारी रेट में कमी एक बहुत समझदारी का फैसला, पर कुछ और समझदारी जरूरी
Date : 20-Jul-2019

छत्तीसगढ़ सरकार ने कल एक बड़ा फैसला लिया है, और राज्य में जमीनों के सरकारी रेट में तीस फीसदी की कमी कर दी है। इससे लोगों को रजिस्ट्री ऑफिस में लगने वाले सरकारी टैक्स में कमी आएगी, लेकिन इसकी भरपाई सरकार रजिस्ट्री का रेट बढ़ाकर कर ले रही है। दूसरी तरफ जमीन-जायदाद की बिक्री पर होने वाली कमाई पर आयकर विभाग जो कैपिटल गेन टैक्स लेता है उसमें भी लोगों को राहत मिलेगी। आज होता यह है कि कई इलाकों में सरकारी रेट बाजार भाव से खासा अधिक तय कर दिया गया है। सरकार रजिस्ट्री शुल्क तो सरकारी रेट के आधार पर लेती ही है, आयकर विभाग भी सरकारी रजिस्ट्री रेट के हिसाब से कैपिटल गेन गिनता है, और राजधानी रायपुर के कई इलाके ऐसे हो गए हैं जहां जमीन बेचने पर लोगों को अपनी जेब से आयकर को भुगतान करना होगा, उनके घर कुछ भी नहीं आएगा। 

पिछले कुछ बरसों में छत्तीसगढ़ के जमीन-जायदाद के बाजार ने सबसे ही बुरा दौर देखा है। बाजार ठप्प हो गया है, जिनको अपनी जमीन बेचने की मजबूरी है, उनको बाजार भाव से आधे भाव पर बेचना पड़ रहा है। ऊपर से सरकार कलेक्टर के तय किए हुए रेट से रजिस्ट्री शुल्क ले रही है, और कैपिटल गेन टैक्स पटाने के बाद लोगों के पास बहुत कम पैसा बच रहा है। यह सिलसिला खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने तमिलनाडू की एक मिसाल इस्तेमाल की है जहां पर सरकारी रेट को गिराने से जमीनों का कारोबार बढ़ा था, लोग एक नंबर के पैसे से रजिस्ट्री करवाने लगे थे, और राज्य सरकार को कुल मिलाकर बढ़े हुए शुल्क और बढ़े हुए कारोबार से कमाई बढ़ गई थी। आज हालत यह है कि एक बिल्कुल ही झूठे सरकारी रेट के चलते बाजार ठप्प पड़ा है, लोग बिना रजिस्ट्री मुख्तियारनामे से काम चला रहे हैं, और आयकर विभाग लोगों के पीछे लाठी लेकर पड़ा हुआ है। राज्य सरकार का यह फैसला सभी लोगों के फायदे का है, और इससे जमीन-जायदाद के धंधे से दो नंबर की रकम भी काफी कम होगी, और ऐसा लगता है कि कारोबार बढऩे से आयकर विभाग को भी भरपाई हो ही जाएगी। आज राज्य में सबसे बड़ा नुकसान यह था कि राज्य सरकार बिना कुछ कमाए अपने नागरिकों पर आयकर विभाग का अंधाधुंध बोझ डालकर केन्द्र सरकार की कमाई बढ़ा रही थी, और राज्य का कारोबार ठप्प हो गया था। 

राज्य सरकार के इसी रूख के अनुरूप कुछ फैसले और लिए जाने चाहिए। जमीनों का किस इलाका में कैसा उपयोग हो इसे नया रायपुर के इलाके में राज्य सरकार ने पिछले बरसों में एक तानाशाह के अंदाज में काबू कर रखा है जिससे वहां की जमीनें बिक नहीं पा रही हैं, लोगों को दाम नहीं मिल रहा है, जिनकी जमीनें हैं वे अपने मकान तक नहीं बना पा रहे हैं। नया रायपुर में सरकारी मकानों को बेचने, और सरकारी प्लाट बेचने के लिए सरकार ने निजी जमीनों पर प्रतिबंधों की एक पूरी फेहरिस्त ही लाद दी थी। जब तक किसी के पास कई हेक्टेयर जमीन न हों, वे वहां पर अपना खुद का मकान भी नहीं बना सकते। रमन सरकार के समय भी हमने इसी कॉलम में कई बार इस मनमानी के खिलाफ लिखा था, और भूपेश सरकार को इस तरफ गौर करना चाहिए। संविधान में अपनी संपत्ति के उपयोग का जो बुनियादी हक दिया गया है, उसके भी खिलाफ जाकर नया रायपुर विकास प्राधिकरण ने ऐसे नियम बनाए थे कि कई हेक्टेयर जमीन के मालिक भी वहां अपना घर भी नहीं बना सकते। आज नया रायपुर का पूरा इलाका मरघटी-सन्नाटे से घिरे रहता है, और इस नौबत को अगर बदलना है, सरकार को सिर्फ अपने खर्च से परे, नागरिकों को भी नया रायपुर में बसाना है, तो उसे अपने तानाशाह प्रतिबंधों को खत्म करना होगा, और शहरी विकास की योजनाओं के बुनियादी नियमों तक अपनी मनमर्जी को सीमित रखना होगा। इस शहर और इस प्रदेश के विकास में जमीन-जायदाद और मकान-दुकान की खरीद-बिक्री के कारोबार का बड़ा योगदान रहा है, और उसके खिलाफ नियमों का जाल बिछाकर सरकार कुछ हासिल नहीं कर पा रही है। बाजार व्यवस्था के ठीक खिलाफ जाकर सरकार क्या हासिल करती है यह देखना हो तो हाऊसिंग बोर्ड को देखना चाहिए जो सरकार की खुद की एजेंसी है, और सरकार से मुफ्त में मिली जमीन के बावजूद आज उसके हजारों करोड़ के निर्माण खंडहर होते जा रहे हैं। सरकार ने नया रायपुर के इलाके में सरकारी मकान-जमीन की बिक्री बढ़ाने के लिए निजी निर्माण और निजी उपयोग पर रोक लगा दी, न निजी निर्माण हुआ, और न ही सरकार का निर्माण बिका। छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले बरसों में नया रायपुर को एक नियंत्रित टापू बना लिया था, और बाकी जनता, बाकी दुनिया से उसे काट दिया था। इस तरह कोई भी कारोबार नहीं चलता, चाहे वह निजी हो, चाहे सरकारी। इसलिए राज्य सरकार को अगर नया रायपुर नाम के मरघट को बसाना है, तो उसे वहां के घोषित हजारों एकड़ के इलाके पर लादे गए अपने निहायत-नाजायज नियमों को खत्म करना होगा। 
-सुनील कुमार

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