संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 जुलाई :  पटरी से उतरने से बचने के  लिए नेताओं को चाहिए...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 जुलाई : पटरी से उतरने से बचने के लिए नेताओं को चाहिए...
Date : 21-Jul-2019

नवजोत सिंह सिद्धू इस बात की एक अच्छी मिसाल हैं कि लोगों की जुबान किस तरह उनकी दुश्मन बन जाती है। सार्वजनिक जीवन में, और खासकर निर्वाचित राजनीति में लोगों को बोलते हुए गांधी के नाम से प्रचलित इस बात को याद रखना चाहिए कि सच बोलो, लेकिन कड़वा सच मत बोलो। गांधी खुद तो वैसे खासा कड़वा बोलते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने हो सकता है किसी संदर्भ में यह बात कही हो। और भी बहुत से लोग इस बात की वकालत करते हैं कि कड़वा नहीं कहना चाहिए। लेकिन कड़वे से परे भी कई और किस्म की बातें रहती हैं जो सार्वजनिक जीवन में चुनाव लडऩे वाले लोगों को नुकसानदेह हो सकती हैं। जब पाकिस्तान के खिलाफ हिन्दुस्तानियों की भावनाओं को पेट्रोल के चूल्हे पर उबाला जा रहा था, उस वक्त सिद्धू ने पाकिस्तान के बारे में एक सही बात कह दी, लेकिन वह एक नाजुक राजनीतिक मौके पर कही हुई नुकसानदेह बात साबित हो गई। उनके नाम पर ऐसा बवाल खड़ा किया गया कि उन्हें टीवी के एक कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया, और कांग्रेस पार्टी ने भी कुछ अरसे तक उन्हें चुनाव प्रचार से परे रखा। लोगों को याद होगा कि सिद्धू के पहले लालकृष्ण अडवानी भी पाकिस्तान प्रवास के दौरान जिन्ना के बारे में एक बात कहकर ऐसे बवाल में फंसे कि भाजपा के भीतर वे किनारे लग गए। 

जहां तक सिद्धू की बात है तो पंजाब की राजनीति में भी वे भाजपा से कांग्रेस में आए थे, लेकिन पार्टी के भीतर अपनी जगह धीरे-धीरे बनाने के बजाय वे शायद अपने को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान बैठे जिस पर राजीव गांधी को राजीव कहने का रिश्ता रखने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह काबिज थे। इससे सिद्धू को सुर्खियां तो मिलीं, और मीडिया को यह मसाला मिला कि पंजाब सीएम को एक मुकाबला मिला है, चुनौती मिली है। लेकिन धीरे-धीरे सिद्धू के बयान और उनके काम आत्मघाती साबित होते चले गए, और एक बरस के भीतर ही वे पंजाब केबिनेट से भी बाहर हो गए, और अब सरकारी बंगले से भी, टीवी से तो पहले ही बाहर हो चुके थे। 

राजनीति में मंच, माईक, माला, और महत्व सामने देखकर बड़े-बड़े लोग आपा खोने लगते हैं। ऐसे लोगों को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को याद रखना चाहिए जिन्हें न तो आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में देखा जाता, और न ही मीडिया से बात करते हुए। चुपचाप घर पर रहकर वे ऐसा राज चलाते हैं कि देश भर के राज्यों में सेंध लगाने में कामयाब भाजपा को भी इस राज्य में कामयाबी नहीं मिली, और नवीन पटनायक एक बार फिर शानदार तरीके से सरकार में लौटे हैं। उनकी कही हुई कोई भी बात आज तक उनके खिलाफ नहीं गई है, और अपनी चुप्पी से उन्हें फायदा ही हुआ है। दूसरी तरफ इसी दौरान अपने बयानों की वजह से कई पार्टियों के कई नेता ठिकाने लग गए, उनका राजनीतिक भविष्य खत्म हो गया। 

यह बात कुछ नेताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि चुनावी राजनीति में सक्रिय सारे ही लोगों पर लागू होती है, और लोगों को इससे नसीहत लेना चाहिए। हम छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश समेत देश के बहुत से राज्यों के, कई पार्टियों के कई नेताओं को देखते हैं जो कि बेवक्त बेअक्ल बात करने को अपनी कामयाबी मानते हैं। लालकृष्ण अडवानी और नवजोत सिंह सिद्धू की तस्वीरें सभी नेताओं के अपने टेबिल पर कांच के नीचे लगाकर रखना चाहिए, इससे वे पटरी से उतरने से बच सकते हैं, कुर्सी से उतरने से भी। 
-सुनील कुमार

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