संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 22 जुलाई : उत्कृष्ट शिक्षा के टापुओं में छात्र-छात्राओं की खुदकुशी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 22 जुलाई : उत्कृष्ट शिक्षा के टापुओं में छात्र-छात्राओं की खुदकुशी
Date : 22-Jul-2019

छत्तीसगढ़ से लगे हुए, मध्यप्रदेश के डिंडौरी में आवासीय नवोदय विद्यालय में छठवीं की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली। उसने लिख छोड़ा है कि उसे स्कूल नर्क जैसा लग रहा था, और पहली खबर में स्कूल प्रबंधन ने अपनी गलती मानी है। दरअसल नवोदय एक बिल्कुल अलग किस्म की सोच पर बना हुआ स्कूल है, और देश भर में इसका कई किस्म का बड़ा योगदान है। इसकी वजह से गांव के बच्चे, अनुसूचित जाति-जनजाति के बच्चे, गरीब बच्चे, इन सबको समाज के बाकी तबकों के बच्चों के साथ सबसे अच्छी सरकारी तालीम पाने का एक मौका मिलता है। इसमें दाखिले का इम्तिहान पारदर्शी होता है, और इसकी वजह से देश में धर्म और जाति से परे की एक अलग किस्म की समानता विकसित हो रही है। यह एक अलग बात है कि शिक्षा के मुद्दे पर गंभीर बात करने वाले कुछ लोगों का यह भी मानना है कि देश भर में विपन्न सरकारी स्कूलों के बीच एक संपन्न ढांचे वाले नवोदय की सोच अपने आपमें सामाजिक असमानता की है, और इससे संतुष्ट केन्द्र सरकार बाकी स्कूलों की बहुत मामूली जरूरतों को भी अनदेखा करती है। नवोदय में दाखिले के तरीके को जानने वाले यह कह सकते हैं कि वह एक पारदर्शी व्यवस्था है जिसमें शहरी और ग्रामीण का अनुपात भी है, और आरक्षित वर्गों के लिए भी उनका अनुपात सुरक्षित है। जिन लोगों को नवोदय की अधिक जानकारी नहीं है उनके लिए यह जानना काम का हो सकता है कि छत्तीसगढ़ के एक जिले में नवोदय की 80 सीटों के लिए 40 हजार से अधिक बच्चे दाखिला-इम्तिहान में बैठे थे। लेकिन आज की यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि देश भर के नवोदय स्कूलों में बहुत से बच्चों ने अलग-अलग समय पर आत्महत्या की है जो कि बहुत फिक्र की बात है। 

दरअसल कड़े दाखिले इम्तिहान के बाद बच्चे जहां भी पहुंचते हैं, वहां उनमें से बहुत से ऐसे रहते हैं जिनका तनाव आगे की मेहनत में बढ़ जाता है। जो बच्चे आईआईटी पहुंच जाते हैं, लेकिन वहां की पढ़ाई का बोझ नहीं झेल पाते, उनमें से भी बहुत से आत्महत्या कर बैठते हैं। कुछ ऐसा ही हाल नवोदय मेें हो रहा है जहां दाखिले के समय जो बच्चे सही जवाब दे देते हैं लेकिन बाद में पढ़ाई के ऊंचे स्तर में जो कदम मिलाकर नहीं चल पाते, दूसरे बच्चों के साथ हॉस्टल की जिंदगी जिनको माकूल नहीं बैठती, वहां ऐसे बच्चे एक तनाव में रहते हैं। इस हालत का कोई आसान इलाज भी हमको नहीं सूझ रहा है, लेकिन इसके बारे में सोचना जरूर चाहिए क्योंकि आत्महत्या तो खबरों और आंकड़ों में आ जाती है, और दिखती है, लेकिन जो बच्चे आत्महत्या करने के पहले तक के तनाव में जिंदा हैं, उनके बारे में किसी को पता नहीं चलता। राष्ट्रीय स्तर पर समानता की सोच के साथ शुरू किया गया नवोदय विद्यालय पढ़ाई के लिए और राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत अच्छा है, लेकिन वहां सबसे गरीब तबके के, सामाजिक हिसाब से निचले तबके के जो बच्चे पहुंचते हैं, उनको बाकी बच्चों की बराबरी तक लाने के लिए पढ़ाई से परे भी कुछ जरूरत रहती है, और स्कूलों में परामर्शदाता का अनिवार्य रूप से इंतजाम करना चाहिए। चूंकि ये स्कूल केन्द्र सरकार की संपन्नता से सुविधा संपन्न रहते हैं, इसलिए वहां पर परामर्शदाता की सलाह कोई महंगी सलाह नहीं है। दूसरी बात यह कि जब छठवीं क्लास से बच्चों को ऐसी असमानता से आकर एक अलग किस्म की समानता के बीच आगे बढऩा रहता है, तो उन्हें परामर्शदाता की मदद भी मिलनी चाहिए। 

दरअसल इस बात की शुरुआत तो हम नवोदय से कर रहे हैं, लेकिन आईआईटी जैसे उत्कृष्ट शिक्षा के संस्थान भी छात्रों की आत्महत्या बड़ी संख्या में झेल रहे हैं। वहां भी अनिवार्य रूप से परामर्शदाता रहने चाहिए, और नवोदय के मामले खबरों में आने के बाद आईआईटी भी इस बारे में गौर कर सकती है। 

Related Post

Comments