संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 जुलाई : ...तो फिर जुर्म के राज को  कैसे टाला जा सकेगा?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 जुलाई : ...तो फिर जुर्म के राज को कैसे टाला जा सकेगा?
Date : 26-Jul-2019

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने देश की इस सर्वोच्च अदालत में मामलों को रजिस्टर करने वाले अपने दफ्तर के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि वहां बुनियादी रूप से कुछ गड़बड़ी है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि हाईकोर्ट में एक हफ्ते में करीब 6 हजार नए मामले दायर होते हैं, और सभी दर्ज हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक हफ्ते में करीब हजार मामले दायर होते हैं, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री इनका निपटारा नहीं कर पाती है, इन्हें दर्ज नहीं कर पाती है। उन्होंने इस हाल पर तकलीफभरी नाराजगी जाहिर की है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ समय पहले ही अंबानी से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट जजों के आदेश के उल्टे एक आदेश नीचे के बाबुओं ने टाईप करके जारी कर दिया था। इस मामले में कुछ लोगों पर कार्रवाई भी हुई थी। 

यह तो अच्छा है कि देश के मुख्य न्यायाधीश ने देश की सबसे बड़ी अदालत के हाल पर शर्मिंदगी जाहिर की है, वरना देश की जनता तो पीढिय़ों से निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक में जो तकलीफ झेलते आ रही है, उसके चलते उसका भरोसा ही न्यायपालिका पर से खत्म हो चुका है। यह भी एक वजह है कि कहीं भीड़ हत्या कर रही है, कहीं लोग सुपारी देकर कत्ल का ठेका दे रहे हैं, और कहीं खुद आमने-सामने एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं। कई जगहों पर जाति पंचायतों से लेकर इलाके के मवाली तक अपने अंदाज में इंसाफ कर रहे हैं, और कई जगहों पर मुजरिमों की ज्यादती के खिलाफ लोग अदालत तक जाने का हौसला भी नहीं जुटा पाते हैं। यह सब कुछ इसलिए अधिक हो रहा है क्योंकि अदालतों में इंसाफ आसान नहीं रह गया है, वक्त पर नहीं मिल पा रहा है, बहुत महंगा हो गया है, और बहुत खतरनाक भी हो गया है क्योंकि इस देश ने पिछले बरसों में शिकायतकर्ताओं का कत्ल, सड़कों पर गवाहों का कत्ल, और जजों की संदिग्ध मौत तक देखी है, और जैसा कि आए दिन चर्चा में रहता है, जजों को राजनीतिक दबाव या भ्रष्टाचार के तहत फैसले लेते भी देखा जाता है। 

जिन आम लोगों को जिले की अदालतों तक काम पड़ता है, वे जानते हैं कि अदालत में तकरीबन हर मुजरिम से हर पेशी पर रिश्वत ली जाती है, और साथ-साथ शिकायतकर्ता से भी ऐसा ही सुलूक होता है, और हर पेशी पर उसे जज के ठीक सामने बैठे बाबू को टेबिल के ऊपर ही नगदी थमानी पड़ती है, तभी उसकी बारी आती है, तभी उसका दस्तखत करवाकर उसे उस दिन की छुट्टी मिलती है, और तभी उसे अगली तारीख मिलती है। अदालतों का हाल देखें तो आम लोगों का यह तजुर्बा और कहना है कि सरकार का कोई भी विभाग इतना भ्रष्ट नहीं रहता जितनी कि निचली अदालतें रहती हैं। इससे परे हाईकोर्ट की बात करें तो वहां भी तारीखों को जुटाने, या टलवाने के काम में नगदी काम आती है, और अधिकतर हाईकोर्ट के बारे में यह चर्चा रहती है कि वहां बहुत से, और कौन-कौन से, जज नगदी लेकर फैसले देते हैं। 

लोगों को याद होगा कि देश के कानून मंत्री रहे हुए एक बड़े वकील शांतिभूषण, और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ यह खुला आरोप लगाया था कि वहां के एक दर्जन जज भ्रष्ट रहे हैं। इस पर अदालत ने उनके खिलाफ अवमानना का मुकदमा भी चलाया था, उनसे माफी मांगने के लिए जोर के साथ कहा भी गया था, लेकिन वे जेल जाने को तैयार थे, माफी मांगने को नहीं। उसके बाद से शायद यह मामला सबकी सहूलियत के लिए ताक पर धर दिया गया है। अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा था कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज रिटायरमेंट के बाद कोई पुनर्वास पाने के लिए सत्ता की मर्जी के फैसले देने के संदेह से घिरे रहते हैं। हमने यह भी सलाह दी थी कि राज्यों में उसी राज्य के हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों का कोई मनोनयन नहीं होना चाहिए, और इसके लिए दूसरे राज्यों से ही संवैधानिक जरूरत पूरी करनी चाहिए। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों की ही संवैधानिक जरूरत वाली कुर्सियों पर मनोनयन करने के लिए सरकार के एकाधिकार को खत्म करना चाहिए, और ऐसे चयन-मनोनयन के लिए बड़ी संख्या में तटस्थ लोगों की एक कमेटी बनानी चाहिए, और उसमें जजों से खुली बातचीत करके, उनके बारे में खड़े हुए संदेहों पर जवाब मांगकर ही उनका चयन करना चाहिए। 

आज की बात शुरू तो हुई थी सुप्रीम कोर्ट के दफ्तर की गड़बडिय़ों को लेकर जो कि खुद मुख्य न्यायाधीश ने उठाई हैं, लेकिन लगे हाथों न्यायपालिका की दूसरी गड़बडिय़ों पर भी यह चर्चा जरूरी थी क्योंकि जनता का विश्वास सरकार की ईमानदारी पर से एक सीमा तक खत्म हो गया है, संसद की ईमानदारी या उसके असर पर खत्म हो गया है, और अगर अदालत पर से भी जनता का विश्वास उठ जाएगा, जो कि आज भी काफी हद तक उठ चुका है, तो फिर जुर्म के राज को कैसे टाला जा सकेगा?
-सुनील कुमार

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