संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  29 जुलाई : गवाहों, वकीलों, और शिकायत  करने वालों के कत्ल के  सिलसिले देख होती है दहशत
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 जुलाई : गवाहों, वकीलों, और शिकायत करने वालों के कत्ल के सिलसिले देख होती है दहशत
Date : 29-Jul-2019

उत्तरप्रदेश के उन्नाव के भाजपा विधायक पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक युवती कल अपनी मां और अपने वकील के साथ जेल में बंद अपने चाचा से मिलने जा रही थी कि उनकी कार को एक ट्रक ने टक्कर मारी जिसमें चाची, मौसी और ड्राईवर मर गए, और यह युवती और उसके वकील बुरी तरह जख्मी होकर अस्पताल में हैं। खबरें बताती हैं कि रेप की रिपोर्ट लिखाने के बाद उसके चाचा पर आनन-फानन आधा दर्जन फर्जी मुकदमे दर्ज कर लिए गए थे। इसके पहले रिपोर्ट लिखाने के बाद इसके पिता को पुलिस हिरासत में पीट-पीटकर मार डाला गया था, मामले के एक या  अधिक गवाह मार डाले गए थे। भाजपा विधायक जेल में है जिससे मिलकर भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने चुनाव में सहयोग के लिए धन्यवाद दिया था। पूरे देश का मीडिया और सोशल मीडिया इस बात पर उबल रहा है कि एक ताकतवर के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने वाला परिवार किस तरह कुचल दिया गया है। पुलिस ने माना है कि इस परिवार की हिफाजत के लिए तैनात पुलिस सुरक्षा कर्मचारी इस वक्त उनके साथ नहीं थे, और क्यों नहीं थे इसकी जांच की जा रही है। खबर बताती है कि टक्कर मारने वाली ट्रक के आगे और पीछे, दोनों नंबर प्लेट पर कालिख पोती गई थी ताकि नंबर देखा न जा सके। 

लोगों को कुछ इसी किस्म का सिलसिला एक दूसरे मामले में भी याद होगा, बापू कहा जाने वाला आसाराम जब बलात्कार के मामले में गिरफ्तार हुआ, और अदालती सुनवाई चल रही थी, तब इस मामले के गवाह एक-एक कर मार डाले गए थे। ऐसे ही एक और मामले को याद रखने की जरूरत है कि मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाले में, उसमें शामिल, और उसके गवाह लोगों की मौतों का सिलसिला ऐसा चला कि शायद 40 से अधिक लोग सुनवाई के दौरान ही बेमौत मारे गए। 

यह पूरा सिलसिला देखें तो अभी पौन सदी पहले तक अमरीका में जब संगठित माफिया के खिलाफ कोई गवाह रहते थे, तो वे इसी तरह एक-एक कर मार डाले जाते थे। कुछ ऐसा ही इटली में सिसिली के माफिया के खिलाफ सिर उठाने वाले लोगों के साथ होता था। हिन्दुस्तान में अधिक मामलों में ऐसा याद नहीं पड़ता, लेकिन यह तो तय है कि गवाहों की हत्या या शिकायतकर्ता के परिवार के लोगें की हत्या से कुछ कम दर्जे का दबाव अनगिनत मामलों में बनता होगा जब गवाहों को एक-एक कर खरीद लिया जाता है, या सुबूतों को एक-एक कर तबाह किया जाता है, अदालतों में सरकारी वकीलों को प्रभावित किया जाता है, और कई मामलों में जजों को रिश्वत देने की चर्चा रहती है। कुल मिलाकर लगता यह है कि अदालत से सजा पाने वाले लोग वे ही रहते हैं जो शिकायतकर्ता को खत्म नहीं कर पाते, उसके परिवार को, गवाहों को, वकीलों को खत्म नहीं कर पाते, और न्यायप्रक्रिया के अलग-अलग हिस्सों को खरीद या बर्बाद नहीं कर पाते। आज ही एक दूसरी खबर है कि पंजाब के जालंधर कें जिस ईसाई बिशप पर बलात्कार का मामला केरल में चल रहा था, उसमें पुलिस ने जब अदालत में डीवीडी सरीखे डिजिटल सुबूतों को पेश किया, तो उनकी फोरेंसिक जांच रिपोर्ट बताती है कि उनके साथ छेडख़ानी की गई है। बलात्कार की शिकार एक नन के साथ ईसाई समुदाय की हजारों नन्स खड़ी हैं, महिला अधिकार और मानव अधिकार के लिए लडऩे वाले खड़े हैं, लेकिन ऐसा शक है कि चर्च के दबाव में, चर्च को बचाने के लिए सरकार इस मामले को शुरू से कुचल रही है। 

ताकतवर लोगों के खिलाफ हिन्दुस्तान का कानून किस तरह लुंजपुंज हो जाता है, वह देखने लायक है। गरीबों को बेदखल करना हो, उन्हें कैद काट लेने के बाद भी जेल में सड़ते पड़े रहने देना हो, उन्हें संभावित सजा से अधिक वक्त तक विचाराधीन कैदी बनाकर जेल में पड़े रहने देना हो, इन सब मामलों में हिन्दुस्तानी अदालतें एक पेशेवर मुजरिम के अंदाज में काम करती हैं, और इंसाफ की किसी भी संभावना को कुचलती जाती हैं। दो और मामले इसी से जुड़े हुए गिनाना ठीक होगा, राजस्थान हाईकोर्ट से अभी कुछ कश्मीरी आदमियों को बेकसूर करार देकर रिहा किया गया है, उन पर आतंकी हमले में शामिल होने का मामला 24 बरस से चल रहा था, वे जब जेल में डाले गए थे तब छोकरे थे, और अब अधेड़ हो चुके हैं, उससे अधिक उम्र के हो चुके हैं, और अब वे बाहर निकलकर क्या करेंगे, यह उन्हें खुद ही नहीं मालूम है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट में अभी कुछ दिन पहले जिला सहकारी बैंक के एक मर चुके कर्मचारी को बेकसूर मानते हुए बैंक को हुक्म दिया है कि वह उसके सारे बकाया भुगतान करे। दिक्कत यही है कि इस भुगतान को लेने के लिए वह जिंदा नहीं है। यह मामला 28 बरस तक चला, और इस बीच ही वह कबका मर-खप गया, और  अब उसे शायद ही यह पता चले कि वह जीत गया है। 

ऐसे कई मामलों को देखें तो हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था को लेकर एक घोर निराशा होती है। हिन्दुस्तान में कानून के राज को देखकर घोर निराशा होती है, और ताकतवर तबके की हिंसक ताकत को देखकर एक दहशत होती है। शायद कुछ लोगों को अब तक इस बात पर हैरानी होना जाहिर हो कि किस तरह इस भाजपा विधायक पर लगे बलात्कार के आरोपों से लेकर, उसकी गिरफ्तारी तक, और उसके खिलाफ शिकायत करने वाली लड़की के पूरे कुनबे की हत्या तक, वकील की हत्या तक पर किसी बड़े नेता को कुछ भी नहीं कहना है, न राज्य की सरकार को, न केन्द्र की सरकार को, न उस विधायक की भाजपा को। 
-सुनील कुमार

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