संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  30 जुलाई, बहाली के बाद वर्षा डोंगरे के उठाए मुद्दों की जांच भी करवानी चाहिए सरकार को
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 जुलाई, बहाली के बाद वर्षा डोंगरे के उठाए मुद्दों की जांच भी करवानी चाहिए सरकार को
Date : 30-Jul-2019

छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा जीतकर आने वाली एक नौजवान अधिकारी वर्षा डोंगरे को दो बरस पहले   भाजपा की राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया था, उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर राज्य सरकार की नक्सल और आदिवासी मामलों में रीति-नीति के खिलाफ बड़े आक्रामक अंदाज में लिखा था, और सरकार के दूसरे आलोचकों ने इसे हाथों-हाथ उठाया था, और चारों तरफ फैला दिया था। इस पोस्ट में यह भी लिखा हुआ था कि उन्होंने एक जेल अधिकारी की हैसियत से काम करते हुए जेल में ऐसी महिलाओं से बातचीत की है जिनके साथ सुरक्षा बलों ने बस्तर में सेक्स-बदसलूकी की थी। यह आरोप राज्य शासन के सुरक्षा कर्मचारियों और केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारियों पर लंबे समय से लगते आ रहा है, और बस्तर के आदिवासियों महिलाओं ने आरोपों को लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक दौड़ लगाई है। राज्य शासन की एक जेल-अधिकारी की ऐसे कथित पोस्ट को लेकर रमन-सरकार की काफी फजीहत हुई थी।

इस निलंबन के बाद रमन-सरकार आलोचना के कटघरे में आई थी कि उसने सच कहने वाली एक अफसर को निलंबित किया था। उस वक्त कांगे्रस पार्टी ने भी इस मामले को उठाया था। कल भूपेश सरकार ने इस महिला अधिकारी का निलंबन खत्म करके उसे बहाल कर दिया है। इन दो बरसों में यह बात खबरों में कहीं नहीं आई कि क्या इस अफसर की फेसबुक पोस्ट पर जांच का कोई नतीजा निकला? अब जब बहाली हो गई है तो एक बात पर कार्रवाई जरूरी हो जाती है। इस महिला अधिकारी ने अपनी नौकरी दांव पर लगाकर, और सरकारी सेवा शर्तों को तोड़कर अपने विभाग और जेल के भीतर की बातों को सरकार के सामने रखने के बजाय जनता के सामने रखा था। उसने तो दो बरस निलंबन झेल लिया, लेकिन उसके उठाए हुए मुद्दों का क्या हुआ? और वे मुद्दे छोटे नहीं थे। वर्षा डोंगरे ने आदिवासियों के हक सरकार और कारोबार द्वारा हड़पने और कुचलने के खिलाफ लिखा था और लिखा था कि जिस तरह देश के रक्षक ही आदिवासियों की बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, फर्जी केसों में चार दीवारी में सडऩे भेज रहे हैं, वे इंसाफ के लिए कहां जाएं? वर्षा ने लिखा था कि उन्होंने खुद बस्तर में चौदह से सोलह बरस की आदिवासी बच्चियों को देखा था जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर करके पूरा नंगा करके प्रताडि़त किया गया था, उनकी कलाईयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था जिन्हें वर्षा ने खुद ने देखा था।

अब छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार खुद होकर भी आदिवासियों के खिलाफ दर्ज फर्जी मामलों की जांच ऊंचे स्तर पर करवा रही है। ऐसे में वर्षा डोंगरे की शक्ल में सरकार को एक ऐसी गवाह मिलती है जिसने सरकार जुल्म और बेइंसाफी को उठाते हुए निलंबन झेला था। सरकार को चाहिए कि इस नौजवान अफसर को ऐसी जांच में गवाह बनाकर तमाम शिकायतों के सुबूत ढूंढे। ऐसे कम ही सरकारी अफसर मिलते हैं जो सरकारी जुल्म के खिलाफ बोलने को तैयार होते हों।
-सुनील कुमार

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