संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 31 जुलाई : आजादी के बाद भी आदिवासी इलाके अंडमान की कालापानी की सजा लायक माने जा रहे
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 31 जुलाई : आजादी के बाद भी आदिवासी इलाके अंडमान की कालापानी की सजा लायक माने जा रहे
Date : 31-Jul-2019

मध्यप्रदेश में एक बड़े सीनियर आईएएस अफसर का नाम एक महिला के साथ सेक्स-वीडियो में जुड़ा जो कि पिछले दिनों से चारों तरफ फैल रहा था, तो उस अफसर को एक महत्वपूर्ण विभाग से हटाकर आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान का संचालक बनाया गया है। जाहिर है कि बिना पूरी जांच के, बिना कोई तोहमत साबित हुए सरकार किसी को सजा दे सकती है, तो वह तबादले की किसी किस्म की सजा रहती है जिसे दुनिया सजा मानती है, जो कि हकीकत में सजा रहती है, लेकिन ऐसे तबादले के खिलाफ अफसर किसी अदालत नहीं जा सकते क्योंकि तबादला करना सरकार का विशेषाधिकार रहता है।

अब सोचने की बात यही है कि किसी अफसर का चाल-चलन ऐसा निकला कि उसे सजा देना है, या किनारे करना है, या कम महत्व की जगह पर भेजना है, तो उसे आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान भेज दिया गया। यह देश की सरकारों की मौजूदा सोच का एक सुबूत है कि आदिवासियों से जुड़ी हुई जिम्मेदारियां सजायाफ्ता अफसरों के लायक मानी जाती हैं। यह सिर्फ मध्यप्रदेश में नहीं है, यह छत्तीसगढ़ में भी आए दिन सुनाई पड़ता है जब पिछली सरकार के नेता-अफसर, और मौजूदा सरकार के नेता-अफसर अपने मातहतों को जुबानी धमकी देते हुए यह कहते हैं कि उनका बस्तर तबादला किया जाएगा, तब उन्हें अक्ल आएगी। बस्तर जो कि जाहिर तौर पर सबसे बेबस और सबसे बेजुबान आदिवासियों का इलाका है, जो कि प्रामाणिक तौर पर सबसे पिछड़ा इलाका है, उसे सजायाफ्ता अफसरों और कर्मचारियों के लायक माना जाता है। आजाद हिन्दुस्तान में यह सोच अंग्रेजों की विरासत है जिसमें देश के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से जिनको सबसे कड़ी और बड़ी सजा के लायक माना जाता था, उन्हें कालेपानी की सजा में अंडमान भेजा जाता था जो कि देश में सबसे प्राचीन और सबसे अछूते आदिवासियों का इलाका था, और है। छत्तीसगढ़ में भी बात-बात में नाखुश सीनियर जूनियरों को मानो कालेपानी की सजा पर बस्तर भेजने की बात करते हैं, और हकीकत में भेजते भी हैं, और लोगों को याद होगा कि पिछली रमन सरकार के एक कार्यकाल के सलाहकार केपीएस गिल ने काम पूरा करने के बाद एक इंटरव्यू में कहा था कि बस्तर से बाहर निकलने के लिए पुलिस कर्मचारियों को बड़े अफसरों को लाखों की रिश्वत देनी पड़ती है। 

आदिवासियों के लिए यह नजरिया पूरी दुनिया में शहरी इलाकों में तकरीबन एक सरीखा है। ऑस्ट्रेलिया हो, या अमरीका, या फिर लैटिन अमरीकी देशों के पूरे-पूरे आदिवासी देश, इन सब जगहों को लेकर बाकी शहरी और संपन्न दुनिया का नजरिया ऐसा ही रहता है। आदिवासियों को सजा का हकदार मान लिया जाता है कि उनके इलाकों में सबसे दुष्ट, सबसे भ्रष्ट, सबसे नालायक, सबसे बदनाम, सबसे बदचलन लोगों को भेजा जाएगा। ऐसे में कोई हैरानी नहीं है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर सरीखे आदिवासी इलाकों में अफसरों ने आजादी के बाद से जो खुली लूटपाट की है, उसी का नतीजा है कि वहां पर नक्सलियों को एक उपजाऊ जमीन हाथ लगी। सरकारों के बीच आदिवासी मुद्दों को लेकर किसी किस्म की संवेदना नहीं दिखती है। और तो और सुप्रीम कोर्ट भी आदिवासियों को लाखों की संख्या में जंगल की उनकी जमीन से बेदखल करने की एक मुहिम सी चला रहा है। सरकार हो, संसद हो, या अदालत हो, जहां कहीं आदिवासी पहुंचते भी हैं, वे सत्ता के असर में अपना आदिवासी डीएनए इस रफ्तार खो बैठते हैं कि मानो वे कभी आदिवासी थे ही नहीं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम एक दूसरी बात भी देखते आए हैं। राज्य बनने के बाद से अब तक किसी भी राज्यपाल ने संविधान में आदिवासी इलाकों और आदिवासियों की रक्षा के लिए उन्हें दिए गए विशेष अधिकारों का कभी इस्तेमाल नहीं किया। सत्ता का रूख दबे-कुचले लोगों की भलाई के लिए जुबानी जमाखर्च से परे कुछ भी नहीं रहता। 

जब तक आदिवासी इलाकों को, आदिवासी संस्थानों को, अंडमान की कालेपानी की सजा माना जाता रहेगा, तब तक आदिवासी इलाकों में नक्सली कायम रहेंगे, और आम जनता का भरोसा लोकतंत्र पर नहीं रहेगा। हमारा तो यह साफ मानना है कि आदिवासी इलाकों वाले राज्यों में राज्य सरकारों को आदिवासी समाज और मुद्दों की समझ रखने वाले समाजशास्त्रियों की अनिवार्य रूप से सलाहकार के रूप में नियुक्ति करनी चाहिए, और उनकी काबिलीयत का इस्तेमाल आदिवासी इलाकों के लिए अफसर तय करने में भी होना चाहिए, और वहां पर सरकार के कामकाज पर नजर रखने में भी होना चाहिए। आज की सरकारें शहरी, शिक्षित, संपन्न, और सवर्ण सोच से भरी हुई सरकारें रहती हैं, आदिवासी मुद्दों से बिल्कुल ही नासमझ। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आदिवासी इलाकों के लिए अलग से समर्पित अफसर और कर्मचारी तय होने चाहिए, और किसी भी सेवा में लोगों की नियुक्ति के पहले ऐसे इलाकों के लिए समझ और संवेदनशीलता रखने वालों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मध्यप्रदेश में यह ताजा फैसला शर्मनाक इसलिए है कि आदिवासी मुद्दों से जुड़े संस्थान को सजायाफ्ता के लायक माना गया। 
-सुनील कुमार

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