संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  1 अगस्त : सरकारी अमले के धार्मिककरण, और साम्प्रदायिकता कौन रोकेंगे?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 1 अगस्त : सरकारी अमले के धार्मिककरण, और साम्प्रदायिकता कौन रोकेंगे?
Date : 01-Aug-2019

उत्तरप्रदेश से खबरें और तस्वीरें आ रही हैं कि किस तरह सावन में मंदिर जाते कांवरियों के पांव धुलाने में आस्थावान पुलिस लगी हुई है, कहीं जिले के एसपी कांवरियों का बदन दबा रहे हैं, कहीं और बड़े अफसर हेलीकॉप्टर से कांवरियों पर फूल बरसा रहे हैं। खुद राज्य सरकार ने एक आदेश निकालकर कांवरियों को यह छूट दी है कि पेट्रोल पंप पर दुपहियों पर पेट्रोल डलाते हुए उन्हें हेलमेट लगाना जरूरी नहीं है। लेकिन ऐसी खबरों के दौरान ही उत्तरप्रदेश से जगह-जगह से ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि कहीं किसी मुस्लिम को जयश्रीराम कहने के लिए मजबूर करते हुए पीटा जा रहा है, तो कहीं और कोई साम्प्रदायिक तनाव खड़ा किया जा रहा है। 

किसी भी राज्य में पुलिस और प्रशासन इन दोनों का धर्मनिरपेक्ष, सम्प्रदायनिरपेक्ष होना जरूरी होता है। भारत के संविधान के मुताबिक यह कानूनी रूप से भी जरूरी है क्योंकि अगर वे अपनी आस्था के चलते हुए जनता के कामों में भेदभाव करने लगेंगे, तो सरकार का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा। उत्तर भारत की पुलिस के बीच हिन्दू धर्म की आस्था का बोलबाला पहले से था, और उत्तर भारत के अधिकतर थानों में या तो बजरंग बली के छोटे मंदिर बना दिए गए थे, या फिर थाने के भीतर दीवारों पर हिन्दू देवी-देवता सजे हुए थे। नतीजा यह था कि पुलिस की सोच पहले से हिन्दू चली आ रही थी, और हाल के बरसों में जब योगी आदित्यनाथ जैसे आक्रामक और साम्प्रदायिक सोच वाले मुख्यमंत्री बने, तो पुलिस के भीतर की यह आस्था सिर चढ़कर बोलने लगी। लेकिन बात सिर्फ उत्तरप्रदेश की नहीं है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार के चलते अफसर इसी तरह का काम करने में लग गए थे। मंडला की एक मुस्लिम महिला कलेक्टर सूफिया फारूकी ने शंकराचार्य की चरणपादुका को सिर पर उठाकर सार्वजनिक रूप से सड़कों पर ले जाने का काम किया था, और कई दूसरे अफसरों ने भी आस्था का, या अपने आस्था से बाहर जाकर इसी तरह का काम किया था। 

आज जब सड़कों पर नमाज पढऩे से लेकर हज यात्रा पर सरकारी सब्सिडी तक पर सवाल उठ रहे हैं, जब सुप्रीम कोर्ट सार्वजनिक जगहों पर धर्मस्थलों के अवैध निर्माण गिराने को लेकर अड़ा हुआ है, तब सार्वजनिक जीवन, और खासकर सरकारी नौकरियों से, अदालत और संसद-विधानसभा से धर्म को हटाना जरूरी है। सत्तारूढ़ पार्टी या नेता की सोच के मुताबिक जब सरकारी कामकाज पर धर्म को हावी किया जाएगा, तो उसका नतीजा एक न सिर्फ साम्प्रदायिक, बल्कि धर्मान्ध और अराजक पुलिस की शक्ल में देखने मिलेगा, उत्तरप्रदेश में देखने मिल रहा है, मध्यप्रदेश में देखने मिल चुका है जहां पर दलितों को कुचलना सवर्णों की धार्मिक आस्था के तहत आता है। लोगों को याद होगा कि किस तरह उमा भारती ने मुख्यमंत्री बनने पर सरकारी मुख्यमंत्री-निवास में एक मंदिर बनवा दिया था, मुख्यमंत्री-दफ्तर की मेज पर मूर्तियां रखकर एक छोटा पूजा घर जैसा सजवा दिया था। अब अगर वहां कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री-आवास में एक मस्जिद बनवा दे, कोई ईसाई मुख्यमंत्री चर्च बनवा दे, कोई सिक्ख मुख्यमंत्री गुरूद्वारा बनवा दे, तो मुख्यमंत्री निवास का क्या हाल रह जाएगा? 

भारत में धर्म का जो आक्रामक रूप आज सार्वजनिक जीवन में, सार्वजनिक जगहों पर हावी हो चुका है, उसे थामने की जरूरत है। यह आक्रामकता बढ़ती चल रही है, और धीरे-धीरे यह बहुसंख्यक तबके, और सत्ता पर बहुमत रखने वाली पार्टी का बुनियादी हक मान लिया गया है। लोकतंत्र एक जनमतसंग्रह नहीं होता जहां सबसे अधिक वोट पाने वाले लोग सब कुछ अपने मन का कर सकें। किसी धर्म से जुड़ी पार्टी का बहुमत पाकर सत्ता पर आना, उसे संविधान की धर्मनिरपेक्षता की शर्त से आजादी पाने की आजादी नहीं देता। देश वैसे भी धर्म के नाम पर बर्बाद हो रहा है, अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है, लोगों की जागरूकता और उनकी तर्कशक्ति धर्म के नाम पर एक साजिश के तहत खत्म की जा चुकी है, लोगों की वैज्ञानिक सोच खत्म की जा चुकी है, इसलिए यह सिलसिला रोकने की जरूरत है। अब सवाल यह उठता है कि जिस देश में हाईकोर्ट का एक जज एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ब्राम्हणों को दूसरी जातियों से बेहतर बताते हुए यह साबित करता है कि ब्राम्हण दो बार जन्म लेते हैं, गैरब्राम्हण एक बार, जिस देश में हाईकोर्ट का एक जज सतीप्रथा का समर्थन करता है, उस देश में सरकारी अमले के धार्मिककरण, और उसकी साम्प्रदायिकता को कौन रोकेंगे? सुप्रीम कोर्ट ?

Related Post

Comments