संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 2 अगस्त : शिमला समझौता आधी सदी  बाद भी क्या एक धार्मिक ग्रंथ  की तरह मानने लायक है?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 2 अगस्त : शिमला समझौता आधी सदी बाद भी क्या एक धार्मिक ग्रंथ की तरह मानने लायक है?
Date : 02-Aug-2019

कुछ बातें कभी-कभी महज दिमागी जुगाली के लिए भी करना चाहिए ताकि दिमाग का काम करना एकदम बंद न हो जाए, उस पर चर्बी न चढ़ जाए। दूसरी बात अंग्रेजी में कही गई एक लोकप्रिय बात है कि लोगों को कभी-कभी आऊट ऑफ बॉक्स भी सोचना-विचारना चाहिए। इसका मतलब होता है कि बंधी-बंधाई लीक से हटकर भी कुछ सोचना आना चाहिए। दुनिया का इतिहास और कुदरत भी इस बात के हिमायती हैं क्योंकि अगर हर कोई पहले से रौंदी जा चुकी सड़क पर चलते होते, तो फिर नई पगडंडियां तो कभी बनी ही नहीं होतीं। इसलिए कभी-कभी बंधी-बंधाई बातों से परे भी कुछ सोचना चाहिए, और ऐसा एक मौका अभी सामने आया है। 

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कुछ दिनों से ठंडे पड़े हुए एक विवाद के बाद आज फिर एक दूसरा पत्थर मधुमक्खी के छत्ते पर मारा है, और कहा है कि भारत और पाकिस्तान दोनों अगर चाहेंगे तो वे उनके बीच मध्यस्थता करने को तैयार हैं। पिछले दिनों जब उन्होंने यह कह दिया था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों एक मुलाकात में उनसे कहा था कि वे कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करें। यह बात भारत की विदेश नीति की पुरानी स्थापित बात से एकदम अलग थी, और इसे लेकर भारत में संसद के भीतर और बाहर बवाल भी हुआ था कि अमरीका यह साफ करे कि मोदी ने ऐसा कब कहा। भारत सरकार ने पूरी तरह से इस बात का खंडन किया था कि मोदी ने ट्रंप से ऐसा कुछ कहा था। लेकिन अब ट्रंप ने बिना मोदी का नाम लिए उसी बात को दुहराकर अपनी तरफ से एक पहल की है, एक प्रस्ताव रखा है, और सभ्य दुनिया में पुराने फैसलों से परे ऐसे नए प्रस्ताव कई बार आते हैं, और कई मौकों पर पुरानी बातों से परे कुछ नए कदम बढ़ते हैं। 

हिन्दुस्तान में अगर देखें तो इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच 1972 में दस्तखत हुए एक समझौते में यह तय किया गया था कि ये दोनों देश अपने सारे मतभेद विपक्षी शांतिपूर्ण बातचीत से हल करेंगे। और भारत लगातार किसी समझौते का हवाला देते हुए पाकिस्तान के साथ किसी संभावित बातचीत में किसी तीसरे की भागीदारी या मध्यस्थता के खिलाफ रहा है। लेकिन पाकिस्तान में इस लगभग आधी सदी में कुछ ऐसे मौके आए हैं जब वहां के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने किसी तीसरे पक्ष की जरूरत बताई है। आज हिन्दुस्तान में भी, और हिन्दुस्तान को भी ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि क्या 1972 के शिमला समझौते को एक धार्मिक किताब की तरह अनंतकाल तक पवित्र विदेश नीति मानकर चलने से उसे कुछ हासिल हो रहा है, या किसी मध्यस्थता से कुछ बेहतर हो सकता है? आज इन दोनों देशों के बीच सरहद पर शक की बर्फ इतनी मोटी जमी हुई है कि उस पर बैठकर कोई बातचीत करने की गुंजाइश नहीं दिखती है। दोनों देशों के बीच इस पूरे दौर में परमाणु हथियारों का मुकाबला चलते रहा, जंग भी हो गई, एक-दूसरे पर आतंकी हमलों की तोहमतें भी लगती रहीं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में ही अचानक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के घर बिना बुलाए जाकर भारत की विदेश नीति में एक तूफान खड़ा कर दिया था, और जब यह थमा तो सरहद पर लाशों से परे और कुछ नहीं दिखा। 

ऐसे में भारत को दुनिया के कुछ दूसरे मामलों से भी सबक लेकर कम से कम अपने घर के भीतर सोचना-विचारना चाहिए। दूसरे देशों की मध्यस्थता हमेशा बुरी ही रहती हो ऐसा भी जरूरी नहीं है। और हर बार ऐसी मध्यस्थता कामयाब होती हो, ऐसा तो बिल्कुल भी जरूरी नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच खुद होकर तो कामयाबी के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। ऐसे में एक मिसाल याद पड़ती है कि ग्रेट ब्रिटेन का एक हिस्सा रहे उत्तरी आयरलैंड के साथ लंदन की ब्रिटिश हुकूमत का हथियारबंद टकराव चलते रहता था। इसका बहुत पुराना इतिहास रहा है जिसकी अधिक चर्चा यहां जरूरी नहीं है। लेकिन इस मामले को इसलिए छेड़ा जा रहा है कि ऐसे तनाव के चलते हुए इस सदी की शुरुआत में ही उस वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने लंदन और उत्तरी आयरलैंड के बीच मध्यस्थ का काम किया था, और एक देश के भीतर ही राष्ट्रीय सरकार और प्रादेशिक सरकार, प्रादेशिक हथियारबंद आंदोलन के बीच एक समझौता करवाया था, हथियार डलवाए थे, और अमन कायम करवाया था। यह एक मिसाल यह सोचने का हौसला देती है कि क्या भारत और पाकिस्तान को परस्पर सहमति के आधार पर किसी मध्यस्थ के साथ बैठकर अपनी विवाद निपटाने की एक कोशिश करनी चाहिए? ऐसी कोशिश बिना किसी शर्त के हो सकती है, और हो सकता है कि उससे संबंधों में जमी हुई यह बर्फ पिघलने में मदद मिल सके। इतिहास की परस्पर थोपी गई एक बंदिश क्या आज एक संभावना की राह में रोड़ा बनकर नहीं खड़ी है? क्या शिमला समझौते से आगे भी निकलने की, बढऩे की, सोचने की जरूरत है? कम से कम सोचने-विचारने के स्तर पर इस बहस में क्या बुरा है कि क्या भारत शिमला समझौते को एक धार्मिक ग्रंथ की कट्टरता से मानने के बजाय तब से अब तक बदल चुकी अंतरराष्ट्रीय हकीकत को सोचते हुए दोनों देशों की भलाई के लिए एक नई संभावना पर भी सोचे, बिना कुछ दांव में लगाए हुए। ऐतिहासिक दस्तावेजों का ऐतिहासिक महत्व तो ठीक है, लेकिन उन्हें वर्तमान की राह में ऐसा रोड़ा भी नहीं बनने देना चाहिए कि उससे भविष्य की संभावना खत्म हो जाए। हम अगर अपनी खुद की सोच कहें, तो वह भारत और पाकिस्तान के बीच किसी मध्यस्थ पर आपसी सहमति स्थापित करके बात शुरू करने की है, और दूसरे लोगों को भी इस सैद्धांतिक बात पर सोचना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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