संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 अगस्त : कश्मीर पर इतिहास का सबसे बड़ा फैसला, कोई विशेष कानून नहीं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 अगस्त : कश्मीर पर इतिहास का सबसे बड़ा फैसला, कोई विशेष कानून नहीं
Date : 05-Aug-2019

कश्मीर पर इतिहास का सबसे बड़ा फैसला, कोई विशेष कानून नहीं

कश्मीर को लेकर भारत सरकार कोई बड़ा फैसला लेने जा रही थी, यह तो हफ्ते भर से जाहिर था ही, और यह फैसला क्या हो सकता है, इसे लेकर भी अटकलें इसलिए आसान थीं कि भारतीय जनता पार्टी ने जनसंघ के जमाने से कश्मीर को लेकर जो नारा लगाया हुआ था, या अधिक सही यह कहना होगा कि जो नारे लगाए हुए थे, उनसे परे कुछ करना उसके लिए पीछे हटने सरीखा होता, इसलिए मोदी सरकार ने आज कश्मीर से धारा 370 खत्म करते हुए दो कदम और आगे का काम किया है। संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने इसके साथ-साथ घोषणा की कि जम्मू-कश्मीर को केन्द्र प्रशासित राज्य का दर्जा दिया जा रहा है। कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म हो गया है, और वह एक किस्म से केन्द्र सरकार के मातहत राज्य हो गया है जिसकी विधानसभा तो रहेगी, लेकिन वहां कोई भी विशेष कानून नहीं बच जाएगा। इस फैसले में लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाया है। 

किसी भी केन्द्र सरकार के फैसले के स्तर पर यह एक बड़ा फैसला है, और इससे कश्मीर के भविष्य पर एक अभूतपूर्व और बड़ा असर होने जा रहा है। यह फैसला एक ऐसे समय आया है जब एक तरफ तो अफगानिस्तान से अमरीकी फौजों की वापिसी को लेकर, उसमें अमरीका को पाकिस्तान की जरूरत है। दूसरी तरफ यह फैसला ऐसे वक्त भी आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान लगातार अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से कश्मीर के मुद्दे पर मध्यस्थता करने की अपील कर रहे हैं, और अमरीकी राष्ट्रपति भी इस दुस्साहसी न्यौते का मजा लेते दिख रहे हैं। ऐसे वक्त पर इस फैसले का कुछ अंतरराष्ट्रीय असर भी, कम से कम भारत और पाकिस्तान के बीच तो होगा ही। कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष की कुछ पार्टियां भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के इस फैसले का विरोध कर रही है कि कश्मीर के खास हालात को अनदेखा करते हुए, भारत के नक्शे में कश्मीर की एक सरहदी जगह को अनदेखा करते हुए यह फैसला लिया गया है। कश्मीर में प्रदेश के बाहर के लोगों के जमीन-जायदाद खरीदने, वहां कारोबार करने पर जो भी रोक अब तक लगी हुई थी, वह इस फैसले के साथ खत्म हो जाएगी, और इससे कश्मीर में लोगों की मिल्कियत पर भी बड़ा असर पड़ेगा, और बाकी देश के साथ कश्मीर के रिश्ते पर भी। आज विपक्षी पार्टियां इसे भाजपा और एनडीए के संसदीय बाहुबल से लिया गया एक मनमाना फैसला कह रही हैं, और कश्मीर के स्थानीय नेताओं का यह भी कहना है कि यह फैसला देश के संविधान के खिलाफ है जिसे सरकार ले ही नहीं सकती थी। दूसरी ओर सरकार के इस फैसले के हिमायती लोगों का कहना है कि आज का सारा फेरबदल आधी सदी के पहले राष्ट्रपति के एक आदेश को बदलकर, आज राष्ट्रपति के जारी किए गए एक नए आदेश का है, और इसमें कोई संवैधानिक दिक्कत नहीं है। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी जरूर दी जाएगी, और कुछ लोगों का यह मानना है कि वह चुनौती अधिक खड़ी नहीं रह पाएगी। 

इस फैसले से जम्मू-कश्मीर की स्थानीय राजनीति में भाजपा या एनडीए, कांग्रेस या कश्मीरी पार्टियों के चुनावी भविष्य पर जो असर पड़ेगा, वह तो अलग ही रहा, लेकिन इस फैसले से बाकी हिन्दुस्तान में भाजपा-एनडीए को एक हौसलामंद पार्टी-गठबंधन की साख मिलते दिख रही है जो कि जो कहती है वह करती है। भाजपा जनसंघ के जमाने से जो नारे लगाते आ रही थी, उन नारों को आज जमीन पर उतारकर उसने अपने पुराने वायदे को ही पूरा किया है। देश में एक तबके का यह मानना है कि भारतीय गणराज्य में शामिल होते समय कश्मीर ने जो शर्तें रखी थीं, उन शर्तों को आज तोड़ दिया गया है। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा के एक बड़े पूर्व केन्द्रीय मंत्री, और एक बड़े वकील अरूण जेटली में यह ट्वीट किया है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में एकीकरण 1947 में हुआ। अनुच्छेद 370 इसके बरसों बाद 1952 में लागू हुआ, और अनुच्छेदद 35-ए 1954 में लागू हुआ। इसका साफ मतलब है कि ये दोनों अनुच्छेद भारत में विलय की शर्त थे ही नहीं। 

आज भाजपा और मोदी के कटु आलोचक दल और नेताओं में से कई केन्द्र के इस फैसले साथ हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसका समर्थन किया है, और मायावती की बसपा ने भी। एनडीए के बाहर की कुछ और पार्टियां भी इस फैसले के साथ हैं। और यह फैसला कश्मीर की पिछली आधी सदी की पृष्ठभूमि में लिया गया फैसला है जो कि बताता है कि कश्मीर में लगातार चल रही राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा, और वहां के अलगाववाद के चलते भारत का एक बड़ा हिस्सा यह मानता था कि कश्मीर में भारत विरोधी, आजादी के हिमायती, या पाकिस्तान परस्त लोगों को काबू में रखने के लिए कोई बड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। कश्मीर के बाहर के हिन्दुस्तान का एक बड़ा हिस्सा, या आबादी का एक बड़ा तबका केन्द्र के इस फैसले के साथ रहेगा ऐसा माहौल दिख रहा है। लोगों का यह भी मानना है कि बहुत सी पार्टियों और गठबंधनों वाली केन्द्र और कश्मीर सरकारों ने अलग-अलग किस्म की नीति-रणनीति इस्तेमाल करके देख ली थीं, लेकिन उनमें से किसी ने कोई सकारात्मक नतीजे नहीं दिए थे। ऐसे में आज का मोदी सरकार का फैसला एक अकेले विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है, और कुछ लोगों ने यह कहा भी है कि यह कश्मीर को देश से काटने के लिए नहीं, देश से जोडऩे के लिए लिया गया फैसला है। यह बात खटकने वाली जरूर है कि आधी सदी से अधिक पुरानी कश्मीर-समस्या का यह समाधान संसद में बिना किसी बहस के इस तरह लागू किया जा रहा है। इसके पहले कश्मीर में जितनी बड़ी चौकसी का इंतजाम किया जा चुका था, उसके बाद संसद में कम से कम कुछ अधिक और काफी बहस की जानी थी, और हो सकता है कि वह बहस मोदी सरकार की हिमायती अधिक साबित होती। कश्मीर की जटिलता के अधिक जानकार और सामरिक-राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले के नतीजों को अधिक बारीकी से सामने रखेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत देखने में हो सकता है कि कुछ दशक लग जाएं।

-सुनील कुमार

 

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